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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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आर्थिक टूटन की कहानियाँ : विवस्त्रा
अमरीक सिंह दीप

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जब से अपने मुल्क में आर्थिक उदारवाद की बयार बही है और विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने इस देश को मुक्त बाजार और देशवासियों को एक जिन्स में बदलने का शडयन्त्र रचा है, तब से इस देश के लोगों के जीवनमूल्यों, आदर्शों और मानवीय संबंधों में भारी गिरावट आयी है। इस अवमूल्यन को सत्ता-प्रतिष्ठान देश की तरक्की मान रहा है और घोषित भी कर रहा है। लेकिन साहित्य इसे मानवीय संवेदना का क्षरण और इन्सान में पशुपन का उदय मान रहा है। ’विवस्त्र‘ युवा कथाकार प्रताप दीक्षित का पहला कहानी  संग्रह है। इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ मानवीय संबंधों में आयी शुष्कता और मानवीय संवेदना में तेजी से हुए क्षरण की कहानियाँ हैं।
संग्रह में छोटी-बडी कुल डेढ दर्जन कहानियाँ हैं। ’गुमशुदा‘ पहली कहानी है। आर्थिक तंगदस्ती का निदान एक गुमशुदा बूढे की तलाश में नजर आता है। आर्थिक विवशता के मकडजाल में फँसे लोगों की ही कहानियाँ ’तमाचा‘, ’निर्वासित‘ व ’फटारवेल‘ भी हैं। ये कहानियाँ शायद लेखक के प्रारंभिक दौर की कहानियाँ हैं, जो न मन को गहरे तक छूती हैं, न प्रभावित करती हैं।
’विवस्त्र‘ हालाँकि इस संग्रह की शीर्षक कहानी है और यह भी अर्थ की मार से  विवस्त्र होते इन्सानी रिश्तों की ही कहानी है। महीने भर की उपेक्षा के बाद पहली तारीख्ा को कैसे, अपने हों या पराये, सब का व्यवहार आत्मीय हो जाता है-पत्नी चाय ले आयी थी। उसके दोनों हाथों में चाय के कप थे, जैसे पुजारी के हाथों में दीपक। वह अपनी भी चाय साथ ही ले आयी थी। (पृ. ५४) यह कहानी भी साधारण श्रेणी की ही कहानी है। पता नहीं लेखक ने इस कहानी के नाम पर संग्रह का नाम क्यों रखा ?
लेखक की परिपक्व कहानियाँ है-’उस शहर में आखिरी शाम‘, ’अनुत्तरित‘ व ’गंधमादन पर एक दिन‘। ’अनुत्तरित‘ आर्थिक स्वार्थों के चलते गिद्ध हो गये पारिवारिक रिश्तों की मार्मिक कहानी है। पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा से घर के रिश्तेदार उसकी सम्पत्ति हथियाने के लिए कैसे गिद्धपन पर उतर आये हैं, इसका सटीक उत्तर है-’अनुत्तरित‘ कहानी।
’उस शहर में आखिरी शाम‘ कहानी नहीं एक उदास कहानी है। कहानी स्त्री-पुरुष के बीच की दोस्ती के मध्य उनकी मानसिक आसक्ति और दैहिक अनासक्ति को बडे उदात्त ढंग से सामने लाती है। ’उस दिन वह काफी देर तक रुका था। चलते समय वह भावुक हो गई थी, ’माइ लव ! तुमने मुझे जिन्दा रखा है। जब कभी लौटना, इधर जरूर आना। शहर के इस कोने में ’मैं‘ तुम्हारा इन्तजार करूँगी।‘ (पृ. ५०)
पत्नी को उसने सब कुछ बता दिया था। पत्नी उससे मिलने को उत्सुक थी। सिमी तुम्हें देख जैसे पागल हो गई थी-’’तुम्हारी नयी शादी हुई है। अभी मधुमास चल रहा है। मैं दूसरा कमरा तुम्हारी मधुयामिनी के लिए सजाये दे रही हूँ। यह रात तुम यहीं बिताओ।‘ (पृ. ५०)
’गंधमादन पर एक दिन‘ स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताओं की कहानी है। कहानी का मूलाधार प्रेम है और प्रेम का मूलाधार देह नहीं, आत्मा होती है। अगर आत्मा निष्कलुष हो, तो स्त्री-देह के साथ पराये मर्द द्वारा किया गया छल भी प्रेम के सामने प्रभावहीन रहता है। एक पौराणिक कथा है.... ’कंस की माता पवनरेखा के साथ दुर्मिल नाम का एक छोटा राजा, कंस के पिता अग्रसेन का रूप धारण कर देह-संबंध स्थापित कर लेता है। दुर्मिल के अंश से उत्पन्न कंस अपनी माँ की उपेक्षा सहन नहीं कर पाता और एक कुण्ठित व्यक्ति हो कर रह जाता है।‘ ’गंध मादन पर एक दिन‘ कहानी नायक की उदात्तता के कारण नायिका की संतान को कंस होने से बचाती है। एक अच्छी कहानी है।
’रेबाक के जूते‘ और ’डबल बेड‘ दोनो ही आर्थिक विवशता की कहानियाँ हैं। एक कहानी अगर कामगार वर्ग की आर्थिक विवशता की कहानी है, तो दूसरी निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार में आर्थिक विवशता के चलते की गयी चालाकियों की दास्तान है।
’निन्नी कब मरी थी‘ व ’अब क्षमा-याचना नहीं‘, दोनों ही स्त्री-विमर्श के दो विपरीत ध्रुवों की कहानियाँ हैं। ’निन्नी कब मरी थी‘ में जहाँ स्त्री पति की उपेक्षा की घुटन से तिल-तिल कर बेआवाज दम तोड देती है, वहीं ’अब क्षमा याचना नहीं‘ की स्त्री अपने परम्परागत भीरु स्वभाव से मुक्त होकर, अपने जबरन बलात्कृत होने को अपना दोष न मान कर, अपने पूरे वजूद के साथ तन कर खडी हो जाती है-’अगले दिन, सबकी आशा के विपरीत, वह बैंक के लिए तैयार हुई थी, शोख कपडे, मेकअप रोज की तरह हल्का नहीं। उसने निश्चय कर लिया था कि अधूरे सच वाली जन्दगी अब वह नहीं जिएगी। उसका जीवन अपना है। क्या इसका एक अंश अपने लिए नहीं ?‘ (पृ. ८९) दोनों कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर एक बात स्पष्ट सामने आती है कि मजबूत आर्थिक आधार प्राप्त होने पर स्त्री अबला नहीं रह जाती है।
और अन्तिम कहानी है-’गंगा बाबू वापिस आए‘ बूढा वरिष्ठ इन्सान पुराने घने छायादार वृक्ष की मानिन्द होता है। उसकी जडें अपने परिवेश में बहुत गहरे पाताल तक फैली होती हैं। अगर उसे उसके परिवेश से उखाड कर दूसरे  स्थान पर रोपने की चेष्टा की जाती है, तो वह सूखने लगता है। अपने पुराने परिवेश में लौटने पर उसका मुरझायापन फिर से हरेभरेपन में बदलने लगता है।
प्रताप दीक्षित का यह पहला कहानी संग्रह है। इस संग्रह से उनके अंदर के लेखक की विकास-यात्रा को समझा और महसूसा जा सकता है। उनके अन्दर गहरी संवेदनशीलता है, जो दूसरे के दुख और दर्द के अनुवाद कहानी में कर देती है। हाँ, भाषा के स्तर पर उन्हें अभी और परिपक्व होना होगा।



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