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संघर्ष और आक्रोश की धारदार कविता
प्रो. फूलचंद मानव

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अगमन कविता का होता है, तो आँखों में चमक आती है, मन में आक्रोश भी। पेड की फुनगी से चिडया फुर्र-से उडती है, तो कितने ही चिडे पीछे उडान भरने लगते हैं। प्राकृतिक और सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियों में कवि-मन कुलाँचे भरता है, कल्पना में यथार्थ खोजता और जीवन-वास्तव को भी कहीं-कहीं कल्पना का आभास देता। ’कविता का आगमन‘ घुटते-घायल परिवेश में अंतर्मन को कुरेदता है। कविता आती है, तो ’अंदर-बाहर‘ रोशन हो जाता है या फिर मायूसी का माहौल जार-जार डूबता-उतराता है। नवीन ’नीर‘ का युवा कवि ’कविता का आगमन‘ झेलता है, तो जीवन-पथ के कई रास्तों को प्रश्नाकुल पाता है और वह खुद को एक ’लडाई‘ के लिए तैयार कर लेता है।
यहाँ मात्र काव्य-युक्तियाँ नहीं, काव्यारम्भ है, वरिष्ठ कवियों की छाया में। आधुनिक नगर का काव्य-मुहावरा एक त्रास दे रहा है। स्थितियाँ कुछ खास दे रहा है, लडने-मरने या गैरों को भी अपना करने के लिए। सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला‘ की कविता और उसके बाद के रचनाकारों में कवि मुक्तिबोध  हों  या धूमिल, कुमार विकल हों या पाश, पंजाबी-हिन्दी कविता में तेवर की कविता त्रास तक जाती है, जहाँ से मन के मुहावरे से अर्थ-विस्तार में ’कहीं न कहीं‘ खास हो जाती है। नवीन ’नीर‘ के शुरूआती काव्य में भी बाहर की और अंदरूनी पीडा है। समाज, परिवार या अडोस-पडोस की छटपटाहट और छल झाँकते हैं और आँकते हैं-आदमी को तराजू की तरह। यथा ’यह भटकने की चाह भी/कितनी ख्ातरनाक/बीमारी है/अथवा/औरतों का द्वन्द्व युद्ध/इन बिल्लियों के द्वंद्व युद्ध से मेल खाना/ कब बंद करेगा।‘ या फिर, कविता की ये पंक्तियाँ देखिए-’मरने के बाद/मेरी लाश को/जलाना ना/दफनाना ना/बल्कि/काल चक्र के/किसी पेड पर/उल्टा टाँग देना।‘ अथवा ’इन्कलाब/खाली चुटकियाँ/बजाने से नहीं आता/इन्कलाब/शब्दों को/मुँह में भर कर/नारों की/जुगाली करने से/नहीं आता/सिफर्/खोखली बातों के/फायर से/निशाने नहीं लगते/जुल्म नहंी मरते।‘
मौलिकता का मर्म, सर्जन का सुख ’कविता के आगमन‘ में नवीन ’नीर‘ के कवि ने सहेजा है, बटोरा है। उसके हाथ में जो चाँदी का कटोरा है, उसमें शब्दों के सिक्के स्वर्ण-कौंध बिखेर रहे हैं। पचास से ऊपर इन कविताओं में चंडीगढ ही नहीं, देश के अन्य प्रान्तों के नये, ताजा कवियों को भी पगडंडी दी है, जहाँ से राजमार्ग तक जाने के लिए हर युवा हस्ताक्षर लालायित है।
’नीर‘ का मानना है-’मैं हर रात अपनी आँखों पर/ नींद के छींटे मारता हूँ/ और सुबह-सुबह/ एक बेहोश आदमी की तरह/ बिस्तर से उठता हूँ/ और दिन के सारे काम/ पूरे होश से करता हूँ/ मगर इस यातना को कभी / समझ नहीं पाता हूँ।‘ (पृ. ७६)
नवीन ’नीर‘ ने रिश्तों को परखा-पहचाना हैं। गमी-खुशी को झेला है। पत्थर-पर्वत सबको ठेला है। सराहनीय तथ्य यह है कि नवीन ’नीर‘ नयी कलमों को साहित्य के चौराहे तक ला रहा है, जहाँ से वे दिशा लेंगे, दशा भी पहचानेंगे।
नवीन ’नीर‘ की ’कविता का आगमन‘ शुभ हो, संभावना के इस कवि में बुलन्द साहस और टकराहट की गूँज काव्य-मुहावरे को ठोस बनायेगी। पठनीय संग्रह पाठक सराहेंगे ही।



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