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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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साहित्य, संस्कृति और व्यक्ति का अवदान : ’अभिज्ञान‘
राजेन्द्र परदेसी

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तमिल, हिन्दी और संस्कृत भाषाओं और उनके साहित्य के अधिकारी विद्वान् श्री र. शौरिराजन की कृति ’अभिज्ञान‘, निबन्धों का तीन सौ पृष्ठीय वृहद् संग्रह है। इसमें उत्तर-दक्षिण के भाषाई सेतु मनीषी शौरिराजन के कुल बीस हिन्दी निबन्ध समाविष्ट हैं, जिनका प्रतिपाद्य संस्कृति, साहित्य और व्यक्ति आधारित है।

संस्कृति विषयक निबंधों में प्रमुख हैं-द्रविड कौन थे, दस्तु और द्रविड तथा तमिल संस्कृति। साहित्य से संबंधित आलेख हैं-आसेतु हिमाचल, तमिल साहित्य की आधुनिक प्रवृत्तियाँ, तमिल भाषा में राष्ट्रभक्ति-साहित्य, भारतीय भाषाएँ और राष्ट्रीय अस्मिता, एक प्राचीन तमिल महाकाव्य (शिलप्पधिकारम्) तमिल के रामकथा काव्य कंब रामायण में श्री राम वचनामृत तथा मेंढकी का रुदन (तमिल लोकगीत), व्यक्ति या विभूति केन्दि्रत निबंध हैं-आदर्श भारतीय महामानव अगस्त्य, तमिल का आध्यात्मिक मेघदूत (आंडाल), प्रजानाम् प्रिय चक्रवर्ती श्री राजराजचोलन, श्री रामानुजाचार्य, श्री त्यागराज, स्वदेशी जहाजरानी के कर्णधार राष्ट्र नेता व. उ. चिदंबरम पिल्लै, न्यायतुला के प्रथम स्वदेशी (सर मनुस्वामी अय्यर),  तमिल के महान कवि भारती तथा वीणावादिनी का प्रिय पुत्र कारैक्कुड सांबशिव अय्यर, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती पर एक अन्य निबन्ध ’जन और जनतंत्र के प्रथम प्रतिनिधि कवि‘ भी समीक्ष्य ग्रन्थ में संग्रहीत है।
विद्वान लेखक श्री र. शौरिराजन के निबंधों के शीर्षकों से ज्ञात होता है कि वह हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित तो हैं ही, अपने गहन अध्ययन और अनुशीलन को हिन्दी भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की है।
’आसेतु हिमाचल‘ इस ग्रन्थ का पहला निबंध है, जिसमें यात्रा के महत्व को दर्शाया गया है, यात्राओं से ही सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रचार-प्रसार हुआ है, नये-नये भू-भागों की खोज हुई है, तमिल के यात्रा साहित्य और यात्रा साहित्यकारों के साथ-साथ महापंडित राहुल सांकृत्यायन और गाँधीजी का स्मरण करते हुए कुछ यात्रा-विषयक पुस्तकों से परिचय कराया गया है।
’तमिल भाषा की आधुनिक प्रवृत्तियाँ‘ निबंध में तमिल भाषा और साहित्य की जानकारी भी दी गयी है और आधुनिक प्रवृत्तियों के तहत उपन्यासों, नाटकों कहानियों तथा अन्य विधाओं से संबद्ध तमिल साहित्य का विश्लेषण-विवेचन प्रस्तुत किया गया है। ’तमिल भाषा में राष्ट्रभक्ति-साहित्य‘ निबन्ध में सात-आठ शतियों के कालखण्ड के तमिल कवियों-कवयित्रियों के राष्ट्रीय चेतना-विषयक साहित्य और तमिल पत्र-पत्रिकाओंं की शोधपरक अलभ्य जानकारी एकत्र की गयी है। इसी निबंध में सुब्रह्ममण्यम भारती की एक तमिल रचना का हिन्दी अनुवाद भी समाविष्ट है-मधुर तमिल वाणी की जय हो / उदार चरित तमिल-भाषियों की जय हो/महान भारत राष्ट्र की जय हो / हमारी प्रगतिशील भारतीय प्रजा की जय हो/वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्। यह रचना आज से ९५ वर्ष पूर्व की है, ऐसे ही ’भारतीय भाषाएँ और राष्ट्रीय अस्मिता‘ निबंध में विचार व्यक्त किये गये हैं कि ’हमारी बौद्धिक पराधीनता, जातीय स्वाभिमानशून्यता संवेदनहीनता और निज भाषा-प्रेम की पथभ्रष्टता प्रायः सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं की अस्मिता को संकट में डाल चुकी है।‘ इसी निबंध में लेखक ने बताया है कि लंदन से प्रकाशित ’मिलेनियम फेमिली इन्साइक्लोपीडिया‘ १९९७ में दिया गया है कि ’आगामी शताब्दी के दौरान सभी जीवित भाषाओं में ९५ प्रतिशत मिट जाएँगी। फिलहाल संसार में प्रतिवर्ष कही-न-कहीं १० भाषाएँ या बोलियाँ लुप्त हो रही हैं।‘ इस संदर्भ में हम सभी हिन्दी भाषाभाषियों को गंभीरता के साथ विचार करना होगा।
संस्कृति-विषयक निबंधों में एक महत्वपूर्ण विवेचन हे ’तमिल‘ और ’द्रविड‘ शब्दों को लेकर लेखक का मानना है कि ’तमिल‘ शब्द से ’द्रविड‘ शब्द विकसित हुआ है, जबकि अन्य भाषाविद् मानते हैं कि ’द्रविड‘ शब्द ’तमिल‘ से विकसित हुआ है। निबंधकार ने ’तमिल‘ और ’द्रविड‘ शब्दों की जो व्याख्या की है, वह संस्कृति और भाषा के अध्येताओं के लिए उपयोगी होगी।
व्यक्ति केन्दि्रत निबंधों में अगत्तियर, तोल्काप्पियर, तिरूवल्लुवर, इलंगो अडियल, आंडाल, कंबर, श्री रामानुजाचार्य, भारती जैसी महनीय विभूतियों और उनके योगदान से परिचय कराया गया है। चोलवंशीय सम्राट राजराज चोलन, संगीतज्ञ वाग्गेयकार भक्तराज, न्यायाधीश सर मुत्तुस्वामी अय्यर, वीणा वादक कारैक्कुडि सांब शिव अय्यर और देशभक्त व. उ. चिदंबरम पिल्लै के प्रेरणाप्रद चरित्र-चित्रण दिशावाहक हैं।
आलोच्य  निबंध-संग्रह  का सुविस्तृत महत्त्वपूर्ण निबंध ’तमिल के रामकथा-काव्य कम्ब रामायण में श्री रामवचनामृत‘ है। कम्बरामायण की रचना कवि चक्रवर्त्ती कम्बन ने ग्यारहवीं शती में की थी। यह महाकाव्य सम्पूर्ण तमिल वाङ्मय का गौरव ग्रन्थ है। इसी महाकाव्य के ५३ प्रसंगों के मूल तमिल उद्धरणों को देवनागरी लिपि में बद्धकर उनके भावार्थ निबंध में प्रस्तुत किये गये हैं।
अंतिम अध्याय का शीर्षक ’तमिल संस्कृति‘ है जो अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत है। इसमें लेखक ने तमिलनाडु के इतिहास, तमिल भाषा के विकास, तमिल साहित्य की गौरवशाली परम्परा, तमिल जनजीवन की विशिष्टताओं और संस्कारों का विवेचन प्रस्तुत किया है जो ज्ञानवर्द्धक है।
सारांशतः ’अभिज्ञान‘ को संस्कृत, तमिल और हिन्दी के विद्वान श्री र. शौरिराजन ने, अपने अध्यवसाय की गरिमा से युक्त कर गौरव ग्रन्थ का सतत् पठनीय स्वरूप प्रदान करने में  सफलता प्राप्त की हैं।
निबंधों की भाषा विषयानुकूल सहज-सम्प्रेष्य है, पुस्तक का मुद्रण और साज-सज्जा मनोहारी है।



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