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स्त्री-व्यक्तित्व की खोज करती कहानियाँ
जीवन सिंह

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आधुनिक होते समय का तकाजा है कि वह उन उपेक्षितों-वंचितों के महत्त्व को समझ रहा है, जो समय की रचना में बराबर से सक्रिय होकर भी इतिहास-वंचित रहे हैं। कहीं पितृसत्ता ने उनकी अनदेखी की है, तो कहीं उच्चता-बोध ने। सत्ता कैसी भी क्यों न हो, अन्ततः परायों के लिए शोषण-उत्पीडन का औजार बने बिना नहीं रहती। पूरी दुनिया में ही पितृसत्ता ने औरत के साथ बेहद बदसलूकी की है। लेकिन, यह समय ही है कि सब कुछ को उलट-पलट करके देखा जा रहा है। स्वयं औरत के संज्ञान में आता जा रहा है कि पितृसत्ता ने औरत के मन को इतना कुन्द बना दिया कि अपनी स्थितियों, अभावों, पीडाओं, त्रासों और उपेक्षाओं के बारे में स्वयं वह भी उसी सोच-व्यवहार की अभ्यस्त रहती चली आई है, जो उसके संस्कार पर पितृसत्ता ने थोप दिया है। एक जमाने में मीरा ने एक बडी कोशिश की थी और अपने घर-परिवार, कुटुम्ब-कबीले के रूढबद्ध संस्कारों से मुक्त होकर, एक स्वनिर्मित स्वाधीन परिवेश में साँस लेने का प्रयास किया था। पितृसत्ता की चालाकी ने सदियों तक उसे भक्ति-रस की चाशनी में इस तरह डुबोकर रखा कि उसका भिन्नार्थ-’मुक्तिपाठ‘, आधुनिक समय में आकर व्यक्त हो रहा है। उसके वास्तविक अर्थ को व्यक्त होने में सदियाँ लग गई हैं। गनीमत है कि समझदारी के नये अंकुर प्रस्फुटित हो रहे हैं। इस काम में स्वयं औरत की भागीदारी बढ रही है। वह स्वयं अपने व्यक्तित्व को निर्मित और व्यक्त ही नहीं कर रही है बल्कि, उसकी तलाश करते हुए, उसे रच भी रही है। भारतीय ज्ञानपीठ से २००६ में प्रकाशित अल्पना मिश्र, कविता और पंखुरी सिन्हा के  कहानी-संग्रह इसके प्रमाण हैं कि स्त्री का अन्तर्जगत उसके बाहरी संसार से कितना भिन्न और विशिष्ट है, जिसे स्वानुभूति के स्तर से वह स्वयं ही देख और बता सकती है। इस नयी कथात्मक रचनाशीलता की विशेषता है कि यह स्त्री-चेतना के आरम्भिक दौर जैसी ’आत्मदया‘ की हीनग्रंथि से मुक्त होने की स्पष्ट प्रक्रिया में है।
अल्पना मिश्र का जन्म १९६९ का है और उनकी ६ कहानियों के संग्रह का शीर्षक है-’भीतर का वक्त‘। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कहानीकार स्त्री-जीवन के उस भीतरी वक्त को दिखा रही है, जो सामान्यतया अभी तक के बाहरी वक्त से बाहर रहा है। इस भीतरी वक्त को रचते समय, वह एक अव्यक्त-कला की सृष्टि करती है, जो संज्ञाओं में व्यक्त न होकर सामान्यतया सर्वनामों और प्रतीकों में व्यक्त हुई है। दुखों में व्यक्ति पर दार्शनिकता का आवरण चढ जाता है। यही वजह है कि इन कहानियों की प्रतीक-भाषा पर दार्शनिकता की छाया, परछाईं की तरह साथ-साथ चलती दिखाई देती है। एक कहानी में व्यक्ति-मन को खोलकर रख देने का जरिया यही हो सकता है कि वह कविता की कला को अपने साथ सहेज कर चले। अल्पना मिश्र एक कहानीकार ही नहीं, कवयित्री भी हैं। उनका यह रूप उनकी कहानियों में जगह-जगह घुला-मिला नजर आता है। ’भीतर का वक्त‘ कहानी के आरंभ से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हम एक व्यथित और उद्विग्न नदी के तट पर खडे हैं। जो यहाँ ’तथ्य‘ के रूप में दिख रहा है, वह तथ्य तो है ’सत्य‘ नहीं। सत्य उससे भिन्न है, जिसे लेखिका ने इस तरह व्यक्त किया है ः
’’बस्ती से दिल्ली नहीं जा रही हूँ। जा रही हूँ बस्ती से दिल्ली ही।
यह दिल्ली से बस्ती लौटने जैसा लग रहा है।
आगे जाती हुई ट्रेन जैसे पीछे लौट रही है।
खाली ! सुनसान।‘‘
स्त्री-जीवन का एक विशिष्ट पक्ष है-उसका जननी होना। वह सृष्टि-निर्मात्री भी है, जो सारी पीडा सहकर फलवती बनती है, लेकिन, इस जीवन से उसकी कितनी ही अभिशप्त-कथाएँ जुडी हुई हैं। इसमें केवल प्रसव-वेदना ही नहीं है बल्कि इस परिधि के साथ जुडी मनस्वेदना का पूरा गणित है, जिसके हानि-लाभ के खातों में वह स्त्री भी है, जिसे लेखिका ने उसकी वास्तविक संज्ञा में व्यक्त न करके ’बूढी चालाक आँखों वाली औरत‘ कहा है। वह बूढी औरत एक ऐसी विशिष्ट संज्ञा है, जिसे पितृ-सत्तात्मक समाज ने अपने उपयोग के लिए बनाया है। जहाँ पहली सीढी पर ही एक बूढी औरत, युवा औरत के साथ बदसलूकी से पेश आती है। एक युवा और प्रसविनी स्त्री के आसपास की अपनी यातनाओं से रूबरू कराती यह कहानी, उसके उस भीतरी मन का द्वार खोलती है, जो ’सभ्य बहुओं‘ के लिए लगभग सभी जगह बन्द रहा है। स्त्री-पुरुष के रिश्तों में ही नहीं, बल्कि स्त्री-स्त्री के रिश्तों में भी सामन्ती संस्कार ने जिस तरह का घुटन भरा माहौल बनाया है; उसे बहुत अच्छी तरह यह कहानी उकेरती है। पितृसत्ता का एक दूसरा तंत्र रहा है, जिसके पुर्जों में स्वयं स्त्री को तब्दील कर दिया गया है। उसे पूरी तरह पितृसत्ता के संस्कार में रंग दिया गया है। इससे अनेक तरह के अंधविश्वास पनपे हैं और रूढयों का एक क्रूर जाल फैलता चला गया है। यह जाल हमारे सभी रिश्तों के भीतर इतना सूत्रबद्ध है कि इसे थोडा सा भी झटका बर्दाश्त नहीं होता।
अल्पना मिश्र की कहानी की रचना-प्रक्रिया में दृश्य-बंधों की श्ाृंखला का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि, इस प्रक्रिया में ख्ातरा हमेशा बना रहता है और कथाकृति  दृश्य-संकलन जैसी लगने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखिका एक साथ कितना-कितना कहना चाहती है। इस चक्कर में, वह दृश्यों का कथा-संयोजन ठीक तरह नहीं कर पाती। कहानी की प्रकृति में संक्षिप्त जटिलता का गुण होना चाहिए। यह जीवन की सर्वांगपूर्ण सृष्टि नहीं है। उसके एकांग की सम्पूर्णता को छोडकर कहानी-रचना का प्रभाव पैदा करना संभव नहीं है। वैसे तो पूरी जन्दगी ही अनेक टुकडों का संपुंजन है और जरूरी नहीं है कि उनमें एक निश्चित श्ाृंखलाबद्धता भी हो। इसके बावजूद, कहानीकार उनका संयोजन-सम्पादन कुछ इस तरह से करता है कि वे समय की संगति में अपना एक कथा-प्रभाव कायम कर सकें। वस्तुतः, यह प्रभाव या कहें कहानी-प्रभाव तभी बन पता है, जबकि कहानीकार अपने समय और जीवन-यथार्थ के बीच से उस तत्त्व को खोज लेता है, जो मनुष्यता के सौंदर्य-विधान में अपनी एक कडी जोड देता है। अल्पना मिश्र की कहानियों में स्त्री-जीवन के यथार्थ के विविध और नये पक्ष तो अवश्य हैं लेकिन अभी वे उस सौंदर्यात्मक अनुभव तक नहीं पहुँच सकी हैं, जो कलात्मक क्षणों के साथ मनुष्यता के सौंदर्य को एकाकार कर देता है। उपस्थिति, भय, कथा के गैरजरूरी प्रदेश में, अंधेरी सुरंग में टेढे-मेढे अक्षर तथा बेतरतीब शीर्षक कहानियों में स्त्री की अपने व्यक्तित्व को पा लेने की उत्कट लालसा तो अवश्य प्रकट होती है, लेकिन साहित्य की किसी विधा का उद्देश्य केवल यथार्थ को प्रकट कर देने तक सीमित नहीं हैं। वह और आगे जाकर मनुष्यता के उस आकाश तक फैलना चाहिए, जहाँ सभी तरह की विभेद-प्राचीरें भरभरा कर ढह जाती हैं।

कविता के कहानी-संग्रह ’मेरी नाप के कपडे‘ में कुल दस कहानियाँ-भय, चार घण्टे, फुरसत के चार दिन, स्मृतिखण्ड, खेल-खेल में, नीमिया तले डोला रख दे मुसाफिर, सुख, देहदंश, आईना हूँ मैं और मेरी नाप के कपडे-संकलित हैं। भारतीय समाज में स्त्री की परिस्थितियों को लेकर जो आग कविता के मन में जलती रही  है, वही वृत्तान्त का रूप धारण कर कहानियों के रूप में अवतरित हुई है। इनमें वे कुछ ऐसी परिस्थितियों को व्यक्त करती हैं, जो सामान्य और औसत नारी-व्यवहार से भिन्न एवं विशिष्ट हैं। रूढवादियों की नजर में यह सब सामाजिक मर्यादा का अतिक्रमण कहलायेगा, लेकिन समय और तर्क की कसौटी पर इस तरह का मर्यादा-भंग न केवल जरूरी है, वरन् मानवीय संभावनाओं के विस्तार के लिए वांछनीय भी है। आज की मध्यवर्गीय स्त्री, पहले की तुलना में स्वाधीनता की नयी परिस्थितियों को  निर्मित करने में सक्षम है। वह छोटे शहरों में तो नहीं, लेकिन  महानगरों में ’मेरी नाप के कपडे‘ कल्पना और रवि की तरह, बिना विवाह किये एक साथ रह सकते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही यह, आर्थिक तौर पर स्वाधीन वर्ग के लिए एक नये समय की सृष्टि है, जिसके ऊपर आज भी हमारे समाज का एक बडा वर्ग नाक-भौं सिकोडता है। लेकिन, यह समय का तकाजा है कि आज की आर्थिक दृष्टि से स्वाधीन होती स्त्री अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले लेने के आत्मविश्वास में मुब्तिला हो रही है। स्त्री-पुरुष के सामन्ती  दाम्पत्य  सम्बन्ध के विकल्प के रूप में यह एक नया मोड है, जिसे पूँजीवादी व्यवस्था से प्राप्त स्वाधीनता के वातावरण में थोडे साहस, दृढता और आत्मविश्वास से स्त्री व पुरुष दोनों ही प्राप्त कर सकते हैं। देखने की बात यह है कि यहाँ अकेली स्त्री की भूमिका ही पर्याप्त नहीं होगी। यहाँ पुरुष की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। लेकिन, यहाँ इस यथार्थ का कोई सौंदर्यात्मक और सामाजिक स्तर नहीं व्यंजित हो पाया है। इतना ही है कि एक स्वाधीन माहौल की सृष्टि हो रही है। पहले से चली आती दांपत्य-परंपरा का प्रतिरोध दोनों स्तरों पर है। इसके विपरीत ’आईना हूँ मैं‘ कहानी की नायिका ’मैं‘ की कशमकश पुरुष को जाँचने और अपने चेहरे की खोज तक सीमित रहती है। उसका एक ही सवाल बार-बार उभरता है कि ’इसमें मेरा चेहरा कहाँ है‘ या ’मुझे आईने में अपना चेहरा नहीं दिखायी देता‘ और अन्त में, वही सवाल और उसका उत्तर-’मैं आईना हूँ.... सिफर् आईना।‘ लेकिन, उसके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष है कि वह आईना बनकर रहना नहीं चाहती। ’’मैं चीखना चाहती हूँ.... नहीं ऽऽऽ मैं आईना नह।‘‘ इस तरह, इन कहानियों में एक स्वाधीन होती मध्यवर्गीय स्त्री की छवियां हैं, जो फिलहाल, अपने ’व्यक्ति‘ के नियंत्रण में हैं। जैसाकि मध्यवर्गीय समाज में होता भी है। इस तरह के सृजन की सबसे बडी सीमा है, इसकी ’वैयक्तिकता‘। लेकिन इसी के भीतर वह सम्भावना भी है, जो इसे व्यक्ति-स्वाधीनता से आगे ले जाएगी। यहाँ वह दृष्टि नहीं है, जो समाज के पारस्परिक रिश्तों में किसी एक आनुषंगिक जीवन-क्षेत्र को समग्रता में लाकर देखती है। स्त्री-विमर्श की यह संकीर्णता है कि वहाँ जो खंडित यथार्थ आता है, उसका रिश्ता कहीं उसके आसपडोस से नहीं बनता। वह स्वाधीनता की लडाई तो है, लकिन समग्र स्वाधीनता के सूत्र वहाँ बहुत कम नजर आते हैं। ज्यादातर स्त्री-विमर्श अलगाव की भावना उद्दीप्त होता है। यह आशा की जा सकती है कि इस तरह की उदीयमान लेखिकाएँ, एक बडे रचनाकार की तरह अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए, नयी संभावनाओं की तलाश करेंगी।

पंखुरी सिन्हा का कहानी-संग्रह ’कोई भी दिन‘ इसी परम्परा की एक कडी है। इनमें एक ऐसी युवा कहानीकार की छवि है, जो दैनंदिन अनुभवों से कहानी-रचना के लिए जगह बनाती हैं। वे कविता और कहानी दोनों विधाओं में लिखती है। इस संग्रह में उनकी बारह कहानियाँ-प्रदूषण, तालाब कहो या पोखर, कहानी का सच, बहुत साल बाद, कोई एक अभयारण्य, एक नास्तिक की आस्था, सान्त्वना, अपने-पराये, अकेला पर्यटन और अकेली पूजा, बेलगाम रेस, आवाजें, कोई भी दिन-संकलित हैं। अल्पना मिश्र और कविता की तरह, वे भी इस माध्यम से एक साथ बहुत कुछ कहना चाहती हैं, सामान्यतया, लोग अपने जीवनानुभवों में आस्था और रूढयों को जितनी जगह दिये रहते है, उतना बदलते और व्यापक होते जीवन-संदर्भों के उस आधुनिक तर्क को नहीं,  जिसने वर्तमान को बेहद चमकदार और सुविधा-सम्पन्न बना दिया है। ज्ञान और व्यवहार के बीच एक तरह का अमानवीय द्वैत हमको पशुता से ऊपर नहीं उठने देता। हम रूढयों और अंधविश्वासों में इस कदर उलझे रहते हैं कि सब कुछ पा लेने के बावजूद, कुछ न पाने की स्थितियों में कैद रहते हैं। इसकी पराकाष्ठा हमको स्त्री-जीवन-व्यवहार में सबसे ज्यादा नजर आती है। यह अच्छा संकेत है कि पंखुरी सिन्हा ’कोई भी दिन‘ कहानी में एक स्त्री-चरित्र को चुनकर यथास्थितिवादी संस्कार पर प्रहार करती है। यह स्त्री-विमर्श का एक नया क्षेत्र है, जहाँ एक भिन्न तरीके से स्त्री को स्वाधीनता का अवसर मिलता है और वह इस तरह केवल स्त्री की ही नहीं, वरन् पूरे समाज की स्वाधीनता के लिए स्पेस तैयार करती हैं। इन कहानियों की विशिष्टता यह है कि केंद्र में एक स्त्री न होकर पूरा स्त्री-समाज है। लेखिका केवल स्त्री-पुरुष के अन्तर्विरोधों को ही उद्घाटित नहीं करती, वरन् उस सम्पूर्ण को लाती है, जो तरह-तरह से हमारे जीवन को पराधीन बनाये हुए है। कैसी विडम्बना है कि शुभ दिन और शुभ मुहुर्त के नाम पर हम कालचक्र की अवैज्ञानिकता के जाल में उलझे रहते हैं। यही अवैज्ञानिकता है, जो स्त्री-जीवन के मुक्त न हो पाने  में  सबसे  बडा  अवरोध है। सिन्हा की इन कहानियों की एक विशेषता इनके फलक की व्यापकता है। ये पारिवारिकता और सामाजिकता के धरातल पर सिरजी गयी कहानियाँ हैं। एक बडे स्तर पर, यहाँ वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि और वैचारिकता के लिए खुला संघर्ष है, वह इन्हें स्त्री-परिवेश में अनूठा और विलक्षण बनाता है।



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