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नारी-विमर्श में बार-बार एक बात सामने आती रही है कि वर्तमान शताब्दी महिलाओं की है। अपनी पुस्तक ’इन सर्च ऑफ एक्सीलेंस‘ (१९८२) के सहलेखक राबर्ट एच. वाटरमैन ने स्वीकार किया है कि ’भविष्य औरतों का है। वे इंटरनेट से भी बडी हैं।‘‘
आज देश और विश्व के सामने अनेक समस्याएँ व चुनौतियाँ हैं जिनके मद्देनजर महिला-नेतृत्व अत्यन्त आवश्यक है। आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक असमानताएं चरम पर हैं। विश्व रोजगार रिपोर्ट २००४-०५ के अनुसार विश्व की ४९.७ प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या की प्रतिदिन आय २ डॉलर से कम तथा १९.७ प्रतिशत की आय १ डॉलर से कम है। विकासशील देशों में ५८.७ प्रतिशत की आय २ डॉलर से कम तथा २३.३ प्रतिशत की १ डॉलर से कम है। ग्रामीण भारत में गरीबी भयावह स्थिति में है। नेशनल सैम्पल सर्वे २००४-०५ की रिपोर्ट बताती है कि औसतन ग्रामीण व्यक्ति १८ रूपये तथा निर्धनतम ५ प्रतिशत जनसंख्या ८ रूपये प्रतिदिन व्यय करती है। शहरी-क्षेत्र में स्लम में रहने वाली जनसंख्या (२४.१ प्रतिशत) ३५ रूपये प्रतिदिन में गुजारा करती है।
सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय विश्व में समस्त सत्ता सिमट कर संयुक्त राष्ट्र अमरीका के पास केन्दि्रत हो गयी। परिणाम-’विश्व व्यवस्था‘ के नाम पर वह तीसरे विश्व के देशों का आका बना बैठा है। २००३ में ईराक पर चढाई तथा युद्धोपरान्त ईराक की बर्बादी, २००६ में इजरायल व लेबनान युद्ध की विभीषिका सभी के दिलोदिमाग में ताजा है। अलगाववाद व आतंकवाद से पूरा विश्व आक्रांत है। अमरीका के विश्व व्यापार केन्द्र पर हमला, ग्रेट-ब्रिटेन में मेट्रो पर हुये विस्फोट और एक ही दिन में बम्बई रेलवे पर हुये क्रमिक बम विस्फोटों के जख्म अभी हरे हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनरक्षक अनिवार्य वस्तुओं व सुविधाओं तथा लिंग आधारित विश्व व्याप्त असमानताएँ सभी प्रज्ञावान व्यक्तियों के लिए चिन्ता का विषय हैं।
वर्तमान विश्व परिप्रेक्ष्य तथा विश्व शान्ति में महिला नेतृत्व समय की आवश्यकता है। महिलाएं अपने विशेष व पुरूषों से भिन्न गुणों के कारण इन समस्याओं को सुलझाने में अधिक उपयोगी हैं। महिलाओं में सहयोग, सहभाव, दूसरों की भावनाओं को समझने, सभी के साथ संवाद और सामूहिक प्रयास की अद्भुत क्षमता पायी जाती है, जो कुशल नेतृत्व के लिए आवश्यक है। सैली हेलीसेन ने ’द फीमेल ऐडवान्टेज‘ (१९९०) में लिखा है कि स्त्रियाँ ’नेतृत्व संतुलन‘ में आस्था रखती है और समस्या समाधान के लिए यह गुण परमावश्यक है क्योंकि अधिकांश वार्ताएँ अहं के कारण असफल होती है।। संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने सुरक्षा परिषद् (२०००) में कहा था ष्थ्वत हमदमतंजपवदे ूवउमद ींअम ेमतअमक ंे चमंबम मकनबंजवते इवजी पद जीमपत ंउपसपमे ंदक पद जीमपत ेवबपमजपमेण् जीमल ींअम चतवअमक पदेजतनउमदजंस पद इनपसकपदह इतपकहमे तंजीमत जींद ूंससेण्ष् सुरक्षा परिषद् ने १३२५वें प्रस्ताव (२०००) द्वारा मिलिट्री पर्यवेक्षक, नागरिक पुलिस, मानवाधिकार तथा मानवतावादी कार्यकर्ताओं में महिला योगदान बढाने की सिफारिश की। सन् २००० में कैम्पडेविड वार्तालाप की असफलता पर बिल क्लिंटन ने कहा था ’यदि कैम्पडेविड में महिलाएँ होतीं तो असफलता नहीं मिलती।‘ भारत व पाकिस्तान के बीच शत्रुभाव होते हुए भी दोनों देशों की स्त्रियाँ सद्भाव बढाने के लिये प्रतिवर्ष कंवेंशन कराती रहीं। उत्तरी आयरलैंड में प्रोटेस्टेंट तथा कैथोलिकों के बीच झगडे को महिलाओं ने मध्यस्यथता द्वारा समाप्त कराया।
राजनैतिक क्षेत्र में महिलाओं ने सूझबूझ और समस्या-समाधान की क्षमता के बल पर एक नयी चेतना जाग्रत की है। वूमन एण्ड पॉलिटिक्स इन्स्टीट्यूट, (अमेरिकन विश्वविद्यालय) के अध्ययन से स्पष्ट है कि समन्वित निर्णय व सहमति की योग्यता, व्यापक दृष्टिकोण तथा समस्या निदान के नवीन सुझाव महिलाओं की विशेषताएँ हैं। १९७१ में बांग्लादेश को स्वतंत्र कराना प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की कूटनीति का सराहनीय उदाहरण है। कांग्रेसदल जब टूट व समाप्ति के कगार पर था श्रीमती सोनिया गाँधी ने उसमें नये प्राण फूँके और आज भी इतने बडे दल का नेतृत्व सफलता-पूर्वक कर रही हैं। १९३५ के महामन्दी काल में प्रेसीडेंट रूजवेल्ट की ’न्यू डील‘ नीति में उनकी पत्नी एलिनॉर रूजवेल्ट का बहुत बडा योगदान था।
महिला विषयक नीति-निर्धारण में महिलाओं का विशेष योगदान रहा है। समान कार्य के लिए समान वेतन, मातृत्व अवकाश, बच्चों के लिये क्रॅश, दहेज उन्मूलन कानून, पारिवारिक हिंसा-निवारण कानून, बालविवाह पर रोक, बालिका भ्रूण-हत्या रोक व बाल-श्रमिक निषेध कानूनों के पीछे महिला नेता और संगठनों का अथक प्रयास है।
व्यापार तथा उद्योग जगत में महिलागत विशेषताओं का महत्व विश्वस्तर पर स्वीकार्य है। मेरी पार्कर फॉलेत ने ’क्रियेटिव एक्सीलेंस (१९२४) में महिलाओं के भावनात्मक विवेक ;म्उवजपवदंस प्दजमससपहमदबमए म्फण्द्ध पर प्रकाश डाला जिसका सर्वप्रथम प्रचलन जापान में हुआ। अमरीका में ई. क्यू. १९८५ से प्रचलन में आया। भारतवर्ष में भारतीय उद्योग के कारपोरेट डायरेक्टर विजय सम्पत का कहना है कि उत्तम विचार, अधिक पारदर्शिता तथा समन्वित संगठनात्मक संस्कृति की क्षमता के कारण महिलाएं ग्राहकों के साथ अच्छे संबंध बनाने में कुशल होती हैं तथा संस्था के प्रति अधिक निष्ठावान होती हैं। आइ. बी. एम. के डायरेक्टर गुहा का विचार है कि स्त्रियाँ कार्यस्थल व बाजार स्थल की दूरी कम करने में कुशल हैं। कैटालिस्ट (महिला संस्था) के हाल ही के अध्ययन से स्पष्ट है कि जिन कम्पनियों के सर्वोच्च पदों पर महिलाएँ आसीन हैं उनके वित्तीय परिणाम उनकी अपेक्षा, जहाँ महिला अधिकारी कम हैं, बढया हैं।
सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में महिलाओं की भूमिका अग्रणी मानी जाती है। अन्धविश्वास, निरक्षरता, बाल अपराध, स्वास्थ्य व स्वच्छता के क्षेत्र में व्याप्त अनियमितताओेें के विरूद्ध महिला संगठनों व आम महिलाओं का सक्रिय योगदान रहा है। ’नर्मदा बचाओ‘ आन्दोलन में मेधा पाटेकर, सिंगूर के किसानों के हक की लडाई में ममता बनर्जी दलित महिलाओं के अधिकारों और सशक्तीकरण के लिये रूथ मनोरमा, बाल-विवाह के विरूद्ध भंवरी देवी, बिहार में शराब के व्यवसायी व शराबियों के विरूद्ध अनपढ गिरिजा देवी की मुहिम महिला सक्रियता के चन्द उदाहरण हैं। रुथ मनोरमा को वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। भँवरी देवी को बीजिंग में अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन तथा गिरिजा देवी को ’वीमेंस एनवायर्नमेंट एंड डेवेलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन‘ द्वारा सेमीनार में आमंत्रित किया गया।
इसके अतिरिक्त विश्व की आधी आबादी औरतों की है। समानता के सिद्धान्त के अनुसार उन्हें हर क्षेत्र में बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। अन्यथा यह संसार आधा-अधूरा रह जायेगा।
दुर्भाग्य है कि महिलाओं के महत्व को स्वीकार करने के उपरान्त भी हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी तुलनात्मक रूप से नगण्य है। ग्लोबल जेन्डर गैप रिपोर्ट २००६ के सूचकांक बताते हैं कि ११५ देशों में जिनकी कुल महिला आबादी ५ बिलियन है ५ प्रतिशत महिलाएं ही राजनैतिक रूप से सशक्त हैं। विश्व के सबसे अधिक प्रगतिशील व सम्पन्न देश अमेरिका की संसद में महिलाओं का प्रतिशत १५ है, भारत में ८, चीन में २० और स्वीडन में ४७ है। यमन में एक भी महिला सांसद नहीं हैं। विधायक, उच्च पदाधिकारी और प्रबन्धक के रूप में अमेरिका में ४६ प्रतिशत, स्वीडन में ३० प्रतिशत, चीन में १२ प्रतिशत, यमन में ४ प्रतिशत और भारत में ३ प्रतिशत महिलाएँ कार्यरत हैं।
महिला आर्थिक सबलीकरण की दृष्टि से भारत का विश्व में ११०वां स्थान है। सिर्फ बहरीन, पाकिस्तान, ईरान, यमन और सउदी अरब भारत से पीछे हैं। भारत की कुल श्रमशक्ति में ३४ प्रतिशत तथा व्यवसायिक और तकनीकी क्षेत्र में २१ प्रतिशत महिलाएं हैं। अमरीका में यह प्रतिशत क्रमशः ६० व ५५ हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, मातृत्व-काल में मिलने वाली सुविधाएं शिशुओं के लिए प्रदत्त सुविधाएं सभी दृष्टि से औरतें पिछडी अवस्था में हैं। प्रसूति के समय कुशल स्वास्थ्य कर्मियों के अभाव में सब-सहारा अफ्रीकी देशों में मातृत्व मृत्यु दर सर्वाधिक है। मालावी में मातृत्व मृत्युदर १८००, भारत में ५४० और अमरीका में १७ प्रति एक लाख प्रसव पर है।
प्रश्न है, क्यों महिला नेतृत्व विकास के इस युग में भी पीछे रह गया ? मेरी सी. विल्सन ने ’क्लोजिंग द लीडरशिप गैप‘ (२००४) में इस बात पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व भावनात्मक ढाँचा इस स्थिति के लिए उत्तरदायी है।
इतिहास साक्षी है कि हिन्दू व मुस्लिम धर्म ने महिलाओं को सदैव पारिवारिक बंधनों में जकड कर रखा। १६वीं शताब्दी में चर्च ने भी पवित्रता और स्त्रीत्व को मातृत्व से जोडकर महिलाओं को पारिवारिक जीवन व पुरुषों को सार्वजनिक जीवन से सम्बद्ध कर दिया। श्रम विभाजन का यह सामाजिक ढाँचा इतना मजबूत है कि इसमें कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आया ओर आज भी माँ और पत्नी का रूप महिला का सांस्कृतिक आदर्श है।
नेता का अर्थ है, पुरूष व पुरुषत्व। पुरूष को नेतृत्व के लिये योग्यता सिद्ध नहीं करनी पडती किन्तु महिला को नेतृत्व योग्यता की परीक्षा देनी पडती है। उनसे जान आर्क की तरह सख्त तथा मदर टेरेसा की तरह ममतामयी होने की अपेक्षा की जाती है। नेता की पुरूष प्रधान परिभाषा महिला नेतृत्व के मार्ग की सबसे बडी बाधा है। एक ओर ममता, त्याग और भावुकता आदि गुण जो परिवार के सांस्कृतिक आदर्श माने जाते हैं, कार्य स्थल पर अवगुण समझे जाते हैं। महिला यदि पुरूष गुणों को अपना ले तो उसे बुरी दृष्टि से देखा जाता है। शारीरिक व भावनात्मक योग्यता दोनों ही दृष्टि से उसे अच्छी नेता नहीं समझा जाता है।
पारिवारिक उत्तरदायित्व के कारण यह समझा जाता है कि औरतें अधिक घंटे तथा अतिरिक्त घंटे काम नहीं कर सकती हैं। उनमें अधिक मेहनत की क्षमता नहीं होती है। यह धारणा भारत जैसे विकासशील देश में ही नहीं बल्कि अत्यंत विकसित देश अमरीका में भी पायी जाती है। सर्वेक्षण बताता है कि ७३ प्रतिशत अमरीकियों का मानना है कि औरतों को कैरियर छोडकर परिवार की देखभाल करनी चाहिए।
परम्परागत आर्थिक ढांचे की संरचना, कार्यस्थल पर महिलाओं को मित्रवत वातावरण प्रदान करने के लिए जागरूक नहीं है। कार्य के घंटों में लचीलापन, सुरक्षा, मातृत्व-लाभ व अवकाश, बच्चों के लिए क्रेश व शिक्षा-सुविधाओं का आवश्यकतानुसार प्रावधान नहीं किया गया है। यही कारण है कि आर्थिक कार्यों में महिला नेतृत्व नगण्य है। सी.ई.ई. के अनुसार भारत में बडी कम्पनियों की कार्यशील जनसंख्या में४ प्रतिशत ही महिलाएं हैं।
सांस्कृतिक व सामाजिक ढाँचे के परिवर्तन में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मीडिया ने भी महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया है। प्रिंट मीडिया से लेकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने औरतों के ग्लैमर, फैशन व जिस्म को तो प्राथमिकता दी किन्तु उनके गुण, कुशलता, सफलता और व्यक्तित्व के सम्बन्ध में उनका व्यवहार भेदभाव पूर्ण रहा। प्रमुख दूरदर्शन कार्यक्रम, सिनेमा कहानी और आलोचक सभी पुरूष प्रधान होते हैं।
व्यक्तिगत आकांक्षाओं तक को महिला व पुरूष के दृष्टिकोणों से नापा जाता है। एम. बी. ए. डाटकाम के सर्वेक्षण (अमरीका) से स्पष्ट हुआ है कि पुरूष उद्यमी बनने के लिए और महिलाएं रोजगार के अवसर तथा विश्वसनीयता हासिल करने के लिये एम. बी. ए. करती हैं। हमारे देश भारत में स्त्री उच्च शिक्षा प्रदान कराने का अन्तर्निहित उद्देश्य अच्छा वर-घर प्राप्त करना है। यही कारण है कि तकनीकी शिक्षा के बाद अनेक स्त्रियाँ गृहणी बनकर रह जाती हैं।
मेरी सी. विल्सन का कहना है कि परिवार बनाम सामाजिकता की इस ऐतिहासिक कश्मकश की लागत पूरे समाज को उठानी पडी है। एक ओर परिवार को पुरूष का आवश्यक योगदान नहीं मिल पाया तो दूसरी ओर औरत घर और कार्य की चक्की में पिसती रही। न परिवार ही खुश रहा और न ही कार्यस्थल पर प्रशंसा और प्रोन्नति मिली। कानून है, लेकिन कानूनी अधिकार व्यावहारिक रूप से प्राप्त नहीं हुए। महत्वाकांक्षा पुरुषों की पहचान है। योग्यता को समाज तवज्जो नहीं देता। अधिकार, महत्वाकांक्षा और योग्यता की रस्साकशी में औरतें अपनी विश्वसनीयता ही खो बैठती हैं।
महिला नेतृत्व विकास के लिये क्या प्रयास किये जाये? एक अहं प्रश्न है। सर्वप्रथम परम्परागत सामाजिक मूल्यों व सांस्कृतिक ढा.ँचे की संरचना में परिवर्तन करना होगा। नेता की पुरूष प्रधान परिभाषा बदलनी होगी और औरत को उसके स्वाभाविक गुणों के आधार पर नेता मानना होगा।
संख्या की दृष्टि से विश्व की आधी जनसंख्या औरतें हैं इसलिये हर क्षेत्र में उनका बराबर का हिस्सा होना चाहिए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महिला नेताओं की संख्या बढाना आवश्यक है। कहावत है कि एक और एक ग्यारह होते हैं। अक्टूबर १९७५ में आइसलैंड की ९० प्रतिशत गृहणियों ने हडताल की जिससे पूरा देश हिल गया। इस दिन को वहाँ महिला अवकाश घोषित किया गया तथा इस दिन को यादगार बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दशाब्दी प्रारम्भ की।
नेतृत्व-विकास के लिए महिलाओं को किसी पद या बडे कार्यक्षेत्र की आवश्यकता नहीं। घर पडोस, पंचायत, गाँव या शहर अथवा कार्यस्थल, किसी भी स्तर से अपनी आवाज उठा सकती हैं। आवश्यकता है मनोबल तथा लगन की। केरल में ७० वर्षीया मयिलम्मा ने अपने जिले में स्थित कोकाकोला प्लांट के विरूद्ध १५८८ दिनों का सत्याग्रह करके एक इतिहास रचा जिसके परिणामस्वरूप उस जिले में प्लांट बन्द करना पडा।
परिवार व कार्य के बीच समन्वय की संस्कृति का विकास आवश्यक है ताकि महिलाओं को सिर्फ गृहिणी अथवा यदि वे कार्यशील हैं तो परिवार व कार्य में संतुलन के द्वन्द्व से मुक्ति प्रदान की जाये। इस कार्य में लेखकों व मीडिया को गुरुतर दायित्व का निर्वाह करना पडेगा।
आरक्षण, महिला-नेतृत्व के विकास का महत्वपूर्ण उपाय है। यूनीसेफ की स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन रिपोर्ट २००७ के अनुसार आरक्षण से महिलाओं के राजनैतिक सबलीकरण में सुधार हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार विश्व के जिन २० देशों में संसद में सर्वाधिक महिलाएं हैं। ७ देशों में किसी न किसी रूप में आरक्षण का प्रयोग किया है। भारत में स्थानीय निकायों में आरक्षण के कारण ही महिलाओं का १/३ प्रतिनिधित्व है और १० लाख से अधिक महिलाएं इन संस्थाओं में कार्य कर रही हैं। दुर्भाग्य है कि हमारी संसद में महिला आरक्षण बिल आज भी खटाई में पडा हुआ है।
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