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Vartmaan Sahitya ::June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner मराठी कविताएँ अनुवाद : डॉ. शैलजा ’श्यामा‘
छात्र के प्रति
केशवसुत
इस धरती का महत्व बहुत है
पूरे विश्व का तो बहुत ही है
पर तुम्हारे अन्तर्याम में निहित महत्ता का जो बीज है
उससे ज्यादा महत्वपूर्ण कोई दूसरी चीज नहीं
इस पर गौर करो
हे छात्र,
यह बात अमूल्य है....१
अग्नि दीप्तिमान जरूर है
सूर्य तो उससे भी दीप्तिमान
पर तुम्हारे अन्तर्याम में निहित
जो है किरण सत्य की
उसकी दीप्ति सर्वोपरि है
इस पर गौर करो
हे छात्र...
यह बात अमूल्य है....२
धरती पर रत्न जवाहरात बहुत हैं
आकाश में अनगिनत हैं दृश्यमान
पर तुममें निहित जो सच्चरित्र है
वह अतुलनीय है
इस पर गौर करो
हे छात्र,
यह बात अमूल्य है...३
कहते हैं मांसपेशियों में रहती शक्ति
राजदण्ड में वह अति बलवती
पर जो सीख रहे हो एक-एक शब्द नया
शक्ति उसकी चरमरा देगी पूरे विश्व को
उसका पूर्ण ज्ञान प्राप्त करो
हे छात्र,
विश्व जो बदलना है।....४
’’वहाँ नहीं होगी माँ मेरी‘‘
वा. गो. मायदेव
बडी धूमधाम से चल रहा था
खेल गुल्लीडण्डे का
रास्ते में
बालक एक मग्न था खेल में
कार में बैठी एक भद्र महिला
देख रही थी उसकी ओर
बडे स्नेह से अपलक
बीच में रुकी कार और रुकावट खेलने में !
क्षणार्ध में चढकर कार के मडगार्ड पर
पूछा बालक ने,
’’क्यों रोकी कार आपने ?‘‘
’’इसलिए कि ले जाऊँ तुझे
साथ अपने
जा पूछ के आ बापू से तेरे‘‘
’’कहती है माँ बापू को मेरे
बुलाया है भगवान ने पास अपने‘‘
’’अच्छा तो आ पहन कर कुर्ता अपना‘‘
’’अभी तक नहीं सिया माँ ने मेरी‘‘
’’ठीक, चल तो कार में मेरी बैठ जा
घर जाकर दगी नया कुर्ता तुझे
मिठाई, खिलौने ढेर सारे‘‘
बालक उतरा नीचे
’’घर मेरे क्यों नहीं आता रे?‘‘
’’वहाँ नहीं होगी माँ मेरी।‘‘
स
फूलों की प्रार्थना
कुसुमाग्रज
आइए, पधारिए
आहिस्ता आहिस्ता
सबेरे चमकती किरनें सूर्य की
बूँद-बूँद ओस की बिखरी
हरित पत्तों से हम आए
इस दुनिया में हैं खिले
बस इतने से हृदय हमारे
पर इनमें कोष सुगन्ध के
हंसते डोलते
उछाल देते
अनुभूति लेने उनकी
आइए, पधारिए
परंतु आहिस्ता आहिस्ता....
कभी छुपे आड में पत्तों की
कभी रोयें झूठ मूठ का रोना
झोंको का हलकी हवा के
कभी ल हम मजा
बहुविध रंग नए
शरीरों पर हमारे
निर्मल सुंदर
अन्तर्याम हमारा
मिलने हमसे
आइए, पधारिए
परंतु आहिस्ता आहिस्ता....
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