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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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मलयालम उपन्यास साहित्य और तकष्ाी
डॉ. के. एम. मालती

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मलयालम उपन्यास को एक लोकप्रिय विधा के रूप में विकसित करने में ओ. चन्तुमेनोन (१८४७-१९००) और सी.वी. रामन पिल्लै (१८५८-१९२२) का प्रमुख योगदान रहा है। वैसे चन्तुमेनोन के ’इन्दुलेखा‘ (१८८९) के पहले ही, सन् १८८७ में अप्पुनेडुडाडी का ’कुन्दलता‘ उपन्यास प्रकाशित हुआ था। लेकिन, यथार्थपरक सामाजिक उपन्यास की दृष्टि से ’इन्दुलेखा‘ मलयालम का प्रथम उपन्यास माना गया है। तत्कालीन समाज में प्रचलित नम्पूतिरी ब्राह्मणों और केरल की मातृदायक्रम को माननेवाली नायर जाति के बीच जो ’संबंधम‘ प्रथा चल रही थी, उससे उत्पन्न समस्याओं का चित्रण इस उपन्यास के केन्द्र में है। नयी शिक्षा के प्रभाव से किस तरह केरल म नारी-जागरण शुरू हुआ, यही इस उपन्यास का प्रतिपाद्य है। नायिका इन्दुलेखा परिवार वालों के दबाव में नहीं आती। अधेड उम्र के सूरीनंपूतिरी से शादी करने से वह मना करती है। वह नयी पीढी की शिक्षित एवं सजग नारी की प्रतीक है, जो अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय लेने में समर्थ है। ’शारदा‘ चन्तुमेनोन का अपूर्ण उपन्यास है, जिसमें सामाजिक व्यंग्य के नुकीलेपन का अहसास भरपूर है। चन्तुमेनोन ने  तत्कालीन  सामन्ती  नैतिक मान्यताओं को चुनौती दी। सी.वी. रामन पिल्लै ने ’मार्ताण्डवर्मा‘, ’धर्मराजा’, ’रामराज बहादुर‘ जैसे उपन्यासों में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को प्रमुखता देते हुए, देश प्रेम और स्वाभिमान की भावना को उजागर किया।
सन् १८८४ में केरलवर्मा तम्पुरान (१८४५-१९१४) ने ’अकबर‘ का प्रकाशन किया। यह वानलिमबर्ग ब्रोवर के डच उपन्यास का अंग्रेजी से मलयालम में अनुवाद है। इस उपन्यास ने मलयालम में ऐतिहासिक उपन्यासों का अच्छा नमूना प्रस्तुत किया। सन् १९२५ में विक्टर ह्यूगो के ’लामिराबले‘ उपन्यास का मलयालम अनुवाद ’पावडङल्‘ नाम से नालप्पाट नारायण मेनन ने किया। इस उपन्यास का काफी प्रभाव मलयालम उपन्यासकारों पर पडा। मलयालम उपन्यास साहित्य में यथार्थवादी विचारधारा का प्रवाहित होना इसी का परिणाम था। भारतीय भाषाओं में बंग्ला, हिन्दी उपन्यासों का विशेष प्रभाव मलयालम साहित्य-जगत पर पडा है। बंकिमचन्द्र के ’दुर्गेशनन्दिनी‘, नवाबनन्दिनी, ’कपालकुण्डला‘, शरत्चन्द के ’देवदास‘, ’चरित्रहीन‘ जैसे उपन्यास कुछ उदाहरण हैं।
बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशक में केरलीय समाज में नवजागरण की लहर चल पडी। आधुनिक केरल को रूपायित करने में इन आन्दोलनों की अहम भूमिका रही। सन् १९०३ में श्रीनारायण गुरु ने श्रीनारायण धर्म परिपालन संघम‘ (एस.एन.डी.पी.) की स्थापना की। केरल की पिछडी जनता की जन्दगी में नवोन्मेष और जागृति पैदा करने में श्रीनारायण गुरु को सफलता मिली। साथ ही दलितों के उत्थान के लिए श्री अय्यंकाली (१८६३-१९४१) ने ’साधुजन परिपालन संघम‘ (१९०७) के माध्यम से प्रशंसनीय सुधार-कार्य किया। सन् १९०१ में ’नंपूतिरी योगक्षेम सभा‘ का आरंभ हुआ। सन् १९१२ में केरलीय नायर समाजम् की स्थापना हुई। इन संगठनों के आन्दोलनों से केरल में बहुत बडी सामाजिक क्रान्ति हुई। उपनिवेशवाद और सामन्तवाद के ख्ालाफ जनता की आवाज गूँज उठी। केरलीय समाज में उभर आये संगठनों की ख्ाासियत यह है कि इनमें ज्यादातर संगठनकर्ता समाज की निम्न जाति के थे। सामाजिक नवजागरण के कार्य ने इन्हीं से विस्तार पाया। इसी पृष्ठभूमि पर केरल में प्रगतिशील आन्दोलन का आविर्भाव हुआ।
मैक्सिम गोर्की के नेतृत्व में सन् १९३४ में सोवियत संघ में गठित ’सोवियत लेखक संघ‘, सन् १९३५ जुलाई में पैरिस में ई.एम. फोस्टर की अध्यक्षता में आयोजित’संस्कृति की रक्षा के लिए विश्व लेखक अधिवेशन‘ ;ॅवताक बवदहतम व ूतपजमते वित जीम कममिदबम व बनसजनतमद्धए सन् १९३५  में  ही  मुल्कराज आनन्द की अध्यक्षता में लन्दन में सज्जाद जहीर, भवानी भट्टाचार्य जैसे लोगों के नेतृत्व में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना, सन् १९३६ अप्रैल में प्रेमचन्द की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ का प्रथम अधिवेशन-इन सबका भारतीय साहित्य पर प्रभाव पडना स्वाभाविक था। साहित्य की सोद्देश्यता पर सोचा जाना इन्हीं का परिणाम था। भारत में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के सन्दर्भ में ई.एम.एस. ने लिखा है-’’प्रगतिशील लेखक संघ की सथापना और क्रियाकलापों की प्रेरणा हमें मैक्सिम गोर्की, हेनरी बरबूस तथा फासीवाद का विरोध करने वाले अन्य विश्वविख्यात विद्वानों द्वारा की गयी उस घोषणा से मिली थी, जिसमें फासीवाद के बढते हुए तूफान के विरुद्ध दृढ संघर्ष के लिए आह्वान किया गया था। साथ ही, इसे भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार विद्वानों और विदुषियों का वरद हस्त प्राप्त था, जिनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मुंशी प्रेमचन्द और सरोजिनी नायडू जैसे लोग शामिल थे।‘‘१ २० अप्रैल, १९३७ में केरल के तृश्शूर में मलयालम के प्रगतिशील साहित्यकारों का सम्मेलन ’जीवत्साहित्य संघम‘ के नाम से आयोजित हुआ। सन् १९३७ में शुरू हुआ यह जीवत्साहित्य आन्दोलन सन् १९४४ में ’पुरोगमन साहित्यान्दोलन‘ में परिणत हुआ।
मलयालम में पी. केशवदेव, बशीर, पोट्टेक्काट, उरूब, तकषी जैसे साहित्यकार प्रगतिशील विचारधारा से जुडकर साहित्य के लिए ज्यादा ठोस और सक्रिय भूमिका की तलाश करने लगे। सन् १९३० के बाद के मलयालम उपन्यासकारों में सामाजिक नैतिकता-बोध ज्यादा प्रकट होता है। सन् १९३० में मलयालम के प्रमुख आलोचक एम.पी. पॉल का आलोचनात्मक ग्रन्थ ’नोवल साहित्यम्‘ प्रकाशित हुआ। पाश्चात्य साहित्य की नयी प्रवृत्तियों से मलयालम साहित्य-जगत को जोडने का अभूतपूर्व कार्य केसरी बालकृष्ण पिल्लै (१८८९-१९६०) ने किया। उन्होंने ’केसरी‘ पत्रिका के माध्यम से मलयालम साहित्य की युवा पीढी में आत्मविश्वास जगाया। ’केसरी‘ ने प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित साहित्यकारों में जोश भरने का कार्य किया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, समाज को जर्जरित करनेवाली जाति-प्रथा और छुआछूत के ख्ालाफ उठने वाले गाँधी जी के विचारों से भी युवा पीढी प्रभावित हुई।

तकषी मलयालम के उन कथाकारों म श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने अपने समय को कुशलता के साथ अपनी रचनाओं में उकेर दिया। वह समय नवजागरण का था। साहित्य में प्रगतिशील विचार और देश भर में स्वतन्त्रता आन्दोलन का दौर था। तकषी जैसे प्रबुद्ध साहित्यकार पर इन सबका प्रभाव पडना स्वाभाविक था। मलयालम के प्रमुख आलोचक, पत्रकार और पाश्चात्य साहित्य के विद्वान श्री केसरी बालकृष्ण पिल्लै का आशीर्वाद उनको भरपूर मिला था।  १९३४ में तकषी का पहला उपन्यास ’त्यागत्तिनु प्रतिफलं‘ प्रकाशित हुआ। १९३५ में ’पतितपंकज‘ का प्रकाशन हो गया। मोयासाँ, जोला, चेखोव जैसे साहित्यकारों का प्रभाव उनकी रचनाओं में आया है। उनकी प्रारम्भिक रचनाओं का काल आत्मान्वेषण का काल है। ’तोट्टियुडे मकन‘ (१९४७) और ’रण्डिडडषी‘ (१९४८) के प्रकाशन के साथ ही मलयालम पाठकों के मन में तकषी का नाम जम गया। १९५६ में प्रकाशित ’चेम्मीन‘ उपन्यास ने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। इन तीनों उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में श्रीमती भारती विद्यार्थी ने क्रमशः चुनौती (१९५२), दो सेर धान (१९५७) और मछुआरे (१९५९) नाम से किया है।
’तोट्टियुडे मकन‘ उपन्यास में दलितों की जन्दगी अपनी सारी वास्तविकताओं के साथ पाठकों के सामने खुलती है। तीस साल तक गंदगी ढोनेवाला दलित इशक्कुमुत्तु के बेटे चुडलमुत्तु को भी वही मजदूरी करनी पडती है। अपना बेटा मोहन को पढाने की इच्छा उसे है। अपने लिए एक घर बनाने का अरमान है। इन सपनों की पूर्ति के लिए वह भरसक कोशिश करता रहा। नगर परिषद् के नेता के पास अपनी कमाई सौंप दी कि घर बनाने लायक रकम हो जाने पर वह वापस की जाएगी। लेकिन उसने उसे लौटाने से इन्कार कर दिया। नेता ने अपने लिए बढया सा मकान बनवा लिया। भंगी बनने के लिए अभिशप्त मोहन का आक्रोश इतना बढ गया था कि उसने नेता के घर को आग लगा दी। तीन पीढयों में अन्तर है। पहली पीढी का इशुक्कमुत्तु गुलाम मानसिकता में डूबा हुआ निरीह व्यक्ति है, जो अपनी सारी तकलीफें चुपचाप झेलता है। दूसरी पीढी के चुडलमुत्तु के मन में अपने भावी जीवन के सपने हैं, आकांक्षाएँ हैं। संगठित होने की कोशिश करने के बावजूद विरोधी शक्ति से वह पराजित हो जाता है। तीसरी पीढी तक आते-आते साक्षरता और राजनीतिक जागरण और जनचेतना का परिवेश आ जाता है। आलप्पुषा के दलितों जीवन में अनिवार्य रूप से परिवर्तन करने की जरूरत पर जोर दिया गया है। जाति के नाम पर किये जाने वाले अत्याचार की तरफ ध्यान आकर्षित करने में तकषी सफल हुए। जमीदारी व्यवस्था और औपनिवेशिक मूल्यों का ख्ाण्डन सामाजिक समानता के लिए जरूरी था। तमाम परिवर्तन राजनीतिक सत्ता के हथियाने पर ही संभव हैं, इसकी ओर भी उपन्यास में संकेत है। केशवदेव के ’ओडयिल निन्नु‘ उपन्यास के पप्पू की तरह, गंदगी ढोने वाले को उपन्यास में लाकर तकषी ने उपन्यासों में नायक-संबंधी संकल्पनाओं को बदल दिया। एक कलाकृति की पूरी समग्रता इस उपन्यास में मौजूद है।
मलयालम की प्रमुख प्रगतिशील रचना ’दो सेर धान‘ में कुट्टनाट के किसानों की जन्दगी का चित्रण है। हड्डी तोड मेहनत करने के बदले में मजदूरी में सिफर् दो सेर धान से संतुष्ट होकर रहने वाले निरीह ग्रामीण की यह जीवन-झाँकी है। राजनीतिक अधिकार की जटिलताओं का विस्तार इसमें है। दक्षिण केरल का गाँव कुट्टनाट धान की खान है। पानीदार खेतों और नारियल लगी द्वीपनुमा जगहों से भरा गाँव। यहाँ के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर किसान समाज के निचले तबके के परयन और पुलयन जाति के थे। कौडयों में खरीदे गये गुलाम जैसा ही उनका हाल है। अनपढ और अन्धविश्वास से पूर्ण। जमींदार उच्च वर्ग के हिन्दू या ईसाई थे। कोरन, चात्तन और चिरूता इसके मुख्य पात्र हैं। कोरन और चात्तन दोनों अच्छे मित्र हैं। कालिप्परयन और कुञप्पी की बेटी चिरूता से शादी करने की इच्छा, कोरन और चात्तन के मन में है। सारे गाँववाले इस बात से सहमत थे कि देखने में एकदम खूबसूरत, फुर्तीली चिरूता खेत में काम करने में भी चतुर है। ’’बोने, जोतने और काटने का खेती-संबंधी जो भी काम हो, उसमें कोई भी दूसरी लडकी उसकी बराबरी नहीं कर पाती थी। कटाई के समय, जब वह दराँत लेकर सुबह खेत में जाती, तब काट-काट कर ढेर लगा देती और शाम को ही जाकर दम लेती।‘‘२ चिरूता का बाप इसलिए तो लडकी के लिए ज्यादा ’पेणपणम‘ (शादी में वर द्वारा लडकी के पिता को दी जाने वाली रकम) माँगता था। कोरन ने जमींदार पुष्पवेलिल औसेप्प के यहाँ खेती में मजदूरी करने के बदले अग्रिम रुपये लिये और चिरूता के बाप की माँग पूरी कर दी। इस तरह, देखने में सुन्दर, सुडौल और स्वस्थ चिरूता को अपनी पत्नी बनाने में कोरन सफल हुआ।
उपन्यास में जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण का यथार्थ, कलात्मक वर्णन मिलता है। कोरन कहता है-’’किसने जोता-बोया ? परयन-पुलयन ने ही तो जोता बोया है। धान पैदा हुआ, तो तम्पुरानों ने अपने धनागार भर लिये। परयन-पुलयन ने ही अपनी मेहनत से मिट्टी भर-भर कर पानी में से जमीन उठायी। उसमें नारियल के पेड लगाये। पर नारियल तोडकर ले जाते हैं तम्पुरान लोग।‘‘३ कोरन सोंचता है कि ऐसे तम्पुरान के खेतों में जी-तोड परिश्रम करने से कोई फायदा नहीं है। चिरूता की माँ कुञप्पी का मानना अलग है, वह कहती है-’’एक परयन को तम्पुरान ने चार पाँच थप्पड मार दिये। उसके लिए इतना क्या सोचना और कहना है ? तुम्हारे जैसे छोकरों को क्या मालूम? तम्पुरान ने दासों को मार तक डाला है और लाश को पत्थर से बाँधकर नदी में फेंक दिया है। उनका यह अधिकार है।‘‘४ कुञप्पी की पीढी सारा अन्याय ’जमींदार का अधिकार‘  मानकर चुपचाप सहती है। कोरन की आवाज इन अन्यायों के ख्ालाफ उठती है। जमींदारो के नैतिक शोषण से मजदूरिन नहीं बच पातीं। दो सेर धान में जमींदार का बदतमीज नालायक बेटा चाक्को, चिरूता से बुरा व्यवहार करता है। अपनी पत्नी की ओर बुरी नजर डालने वाले चाक्को को, वह बर्दाश्त नहीं कर पाता। कोरन ने हाथापाई में चाक्को का काम तमाम कर ही दिया। बाद में कोरन को जेल की सजा हुई। जेल जाते समय उसने अपनी गर्भवती पत्नी को मित्र चात्तन के संरक्षण में छोड दिया था। चात्तन, चिरूता को अब सिफर् अपनी बहन समझता है। भैया बनकर अपनी जम्मेदारी निभाता है। कोरन के जेल से छूटते ही वह चिरूता और कोरन के नन्हें बेटे को उसे सौंप देता है। आजादी, मताधिकार और राजनीतिक जागरण के साथ किसान-मजदूरों में आये वैचारिक बदलाव को उपन्यासकार ने दिखाया है। ’’मजदूरों के समक्ष अपने जीवन-साहचर्यों को बदलने लायक एक नमूना खडा करने की कोशिश तकषी ने की। मजदूरों के बारे में दूसरों की सोच कैसी को, इस पर नहीं, बल्कि खुद मजदूर अपने लिए क्या कर सकता है, इस पर ही उन्होंने बल दिया।‘‘५ तकषी की संवेदना और सहानुभूति किसानों के साथ गहरी थी। दलित-वर्ग अपनी कमजोरियों और अधिकारों के प्रति जागरूक हो गया है। उनकी नयी पीढी आत्मविश्वास के साथ नारा लगाती है-’कृषिभूमि कृषकों के लिए‘। भारत छोडो आन्दोलन, ट्रेडयूनियन आन्दोलन, भारत की स्वतंत्रता, भारत-पाक विभाजन, उत्तर भारत में उभर आये सांप्रदायिक दंगों की गूँज-इन सबका प्रभाव तकषी और उनके समकालीनों पर पडा। १९४६ में वयलार गाँव में आयी क्रान्ति की परिणति की झलक ’तलयोड‘ (खोपडी) उपन्यास में है। तकषी एक समतामूलक समाज का निर्माण चाहते हैं। जागीरदारी और जमींदारी व्यवस्था का विरोध उनकी रचनाओं में है। किसान, मजदूर और दलितों को उन्होंने साहित्य का अंग बनाया।
विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रतिबद्ध होते हुए भी तकषी कभी उसके गुलाम नहीं रहे। वे समय-समय पर आत्मालोचन भी करते रहे। प्रगतिशील आन्दोलन धीरे-धीरे फीका पडने लगा था। म&#

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