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कथादेश‘ ने अपने विगत दस वर्षों के अंकों में से विशिष्ट रचनाओं का एक चयन प्रकाशित किया है जो कथादेश ने सगर्व इन रचनाओं को प्रकाशित किया था, इसका फरवरी, २००७ अंक है। वे उन महत्वपूर्ण रचनाओं का पाठ चाहते हैं ताकि पाठकों की स्मृति में वे रचनाएँ एक बार फिर ताजा हो सकंं। इस अंक की योजना उचित है इसलिये भी कि कई बार अंकों की मासिक आवृत्ति में कोई विशिष्ट रचना छूट जाती है। यह इसलिये भी संभव है कि आज हिन्दी में ढेरों पत्रिकाएं ऐसी निकल रही हैं जिन्हें बगैर देखे भी चैन नहीं पडता और पढने बैठें तो पूरा महीना पत्रिकाएं पढने में गुजर जाता है। इसलिये हर पाठक अपना एक चयन करता है और उसी के अनुरूप वह पढता भी है। बहरहाल, ’कथादेश‘ के इस अंक की अंतिम चयनित और पुनर्प्रकाशित कहानी नीलाक्षी सिंह की ’रंगमहल में नाची राधा‘ है। नीलाक्षी सिंह अपनी ’परिंदे का इन्तजार सा कुछ‘ कहानी के लिये अधिक जानी जाती हैं। वह कहानी कथादेश में न छपकर ’वागर्थ‘ में प्रकाशित हुई थी इसलिये उसका चयन यहाँ नहीं हो सकता था। चूँकि उन्हें छापना ही था इसलिये उनकी कहानी ’रंगमहल में नाची राधा‘ का चयन किया गया। इस कहानी पर मैं इसलिये बात करना चाहता हूँ कि यह स्त्री-विमर्श के दौर में ऐसी युवा लेखिका की रचना है जो अपने विचारों के साथ स्त्री-विमर्श के नये पैरोकार के रूप में भी जानी जाती हैं। नीलाक्षी सिंह स्त्री की मुक्ति की प्रबल दावेदार हैं, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान, लवलीन और लता शर्मा की तरह-जाहिर है कि स्त्री की मुक्ति से कौन इंकार करेगा। लेकिन यह तो तय होना ही चाहिए कि स्त्री किससे मुक्ति चाहती है। मुक्ति तो गुलामी के बंधनों से ही होनी चाहिए। पर हमारी अतिउत्साही लेखिकाएँ ऐसा नहीं चाहतीं। वे ऐसा करके स्त्री मुक्ति के आंदोलन और स्वयं को भटकाती हैं। उनकी मुक्ति मन और शरीर की स्वतंत्रता से है। क्या स्त्री ऐसा ही चाहती है, क्या वह गुलामी और अन्याय-अत्याचार से मुक्त होकर स्वतंत्र जीना नहीं चाहती। क्या वह पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर निर्भय नहीं रहना चाहती ? वह ऐसा ही चाहती है, उसके लिये देह मुक्ति बहुत बडी चीज नहीं है, स्वतंत्र और स्वायत्त रहकर वह अपनी देह की भी स्वामिनी होगी फिर किस लंपट म साहस होगा कि उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे भोगने का लालच पाल सके ? हमारी युवा लेखिकाओं की विवशता और सीमा यह है कि वे परम्परा और यथार्थ को जाने बगैर स्त्री को मुक्त करना चाहती हैं इसलिये उन्ह देह मुक्ति ही सबसे बडी और सबसे अहम लगती है।
नीलाक्षी सिंह घर परिवार की एक सामान्य और कर्मठ स्त्री दीवानबाई में स्त्री मुक्ति का यह कुपाठ आरोपित करना चाहती हैं इसलिये उनकी दीवानबाई को बुढापे में जब घर में बहुएँ आ चुकी हैं, नाती पोते हो चुके हैं तथा पति सुदामा प्रसाद अपने पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं तब दीवानबाई को पुराने प्यार और मन के रिश्ते की याद आती है। कहानी के अंतिम पृष्ठ में दीवानबाई को उनके पुराने प्रेमी की पत्नी और बच्चों के मर जाने की खबर सुनाई जाती है। इस खबर से उन्हें आघात लगता है, वे रात भर बिस्तर पर तडपती हैं और रोती हैं। उन्हें अब अपने भरे-पूरे परिवार का नहीं अपने प्रेमी का घर याद आता है, उन्हें अपने छोटे-छोटे नातियों को रोटी का कौर खिलाते हुये भी वही प्रेमी याद आता है, उन्हें चिंता है तो अपने उसी प्रेमी की-’अपने पोतों के पीछे थाली लेकर कौर बनाकर घूमते हुये....उनसे खा लेने की मनुहार करते हुये। उनका मुंह अपने आंचल से पोंछते हुये....अक्सर वह भटकने लगीं। आगे-आगे दौडकर उसे छकाता बच्चा कब कनपटियों पर सफेद बाल वाला रूप धर लेता, कुछ होश ही न रह पा रहा था। कौन रखता होगा उसके खान-पान का ध्यान ! रात को सोते में अचानक खांसी का दौर आ जाता होगा तो कौन एक गिलास पानी तक लाकर देता होगा ! कुर्ते मैले पड रहे हैं या चप्पल घिस रही है या वजन कम हो रहा है....कौन दिलाता होगा इसका ध्यान ! दीवानबाई सोयी रातों को उंगलियों से टटोल-टटोलकर बिस्तर पर कुछ ढूंढती। उसका प्रेमी एक नवजात शिशु में सिमट आता....पूरी तरह से बस उस पर आश्रित। उसका खाना, सोना, पीना, नहाना सब दीवानबाई पर निर्भर। वह भूखा होता तो उसके होंठ दीवानबाई को तलाशते....उसे नींद आ रही होती तो उसकी आँखें दीवानबाई को ढूंढतीं....दीवानबाई ने अपने सीने को दोनों बांहों की गिरफ्त में कसकर जकड लिया...ये कैसा प्रेम था जो मातृत्व में, वात्सल्य में घुल-मिल जाता था। क्या औरत एक उम्र के बाद सिर्फ और सिर्फ माँ रह जाती है ? क्या औरत ही उम्र में सिर्फ और सिर्फ माँ होती है ? नहीं ? यह पूरा उद्धरण उस मान्य धारणा के विरुद्ध है जो स्त्री की संपूर्णता मातृत्व में मानता आया है। यह उद्धरण इस धारण के भी विरुद्ध है कि एक उम्र के बाद स्त्री अपने परिवार और नाती-पोतों में ही अपना भविष्य देखना शुरू कर देती है, उसके लिये अतीत भूल चुकी वह घटना है जो जीवन में कभी भी याद नहीं आती।
कहानी के प्रारम्भ में सुदामा प्रसाद का परिचय देते हुए यह बता दिया गया है कि इस समय उनकी उम्र ६२ वर्ष है, स्पष्ट है कि दीवानबाई भी साठ के आसपास ही होंगी। यानी कि भारतीय स्त्रियों से तुलना करें तो एक कृतकार्य स्त्री। मर्द के लिये तो कहा जाता है कि वह साठ की उम्र में भी जवान बना रह सकता है, ’साठा सो पाठा‘ पर स्त्रियों के लिये ऐसा कहीं नहीं कहा जाता। इसलिये कि वे रजस्वला मुक्ति के उपरान्त स्वयं को स्त्रीत्व से मुक्त मानकर नाती-पातों और बहुओं में अपने जीवन की सार्थकता ढूंढने लग जाती हैं। वे उसे अपने जीवन की उपलब्धि भी मानती हैं। दीवानबाई जैसी स्त्री उम्र के इस पडाव पर अपने भरे पूरे परिवार से संतुष्ट ही हो सकती थी क्योंकि जवानी के दिनों में अपनी मेहनत और किफायत से इस घर को खडा किया था, गरीबी के दारुण दुख से बचाने के लिये रात-दिन एक किये थे ’दीवानबाई ने खुशहाल बचपन और सुस्त जवानी के कौमार्यावस्था वाले दिनों के अपने सीखे हुनरों को चमकाया और कुछ सादे कपडे उसके घर आने लगे और उस घर से जाते वक्त उन कपडों पर किस्म-किस्म के फूल-पत्ते डालियां कढे होते। कसीदे के पैसों से दाल-नमक का जुगाड हुआ। इसी मेहनत के बल पर पति की पढाई पूरी करवाई और ठीक-ठीक जीवन जीने के दिन आये। ऐसी परिश्रमी और परिवार के सुख और समृद्धि के लिये समर्पित स्त्री के लिए इस प्रकार पीछे लौटना संभव नहीं होता। यह सही है कि स्त्री अपने पहले प्यार को नहीं भूल पाती लेकिन यह भी तो सही है कि अपने परिवार के लिये वह एक उम्र के बाद सब कुछ भुला देती है-अपना पहला प्यार भी। दीवानबाई कोई अपवाद नहीं है, उसकी जीवनचर्या और जीवन की विशद घटनाओं से ऐसा नहीं लगता, उसे अपवाद के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह कहानी का सहज विकास नहीं है, यह पात्र का यथार्थ रूप नहीं है बल्कि यह आरोपित रूप है जिसे अपनी बात कहने के लिए ख्ाडा किया गया है। यदि मान भी लें कि दीवानबाई अपने पहले प्यार को इस उम्र तक नहीं भूलीं तब उसके कुछ जीवन प्रसंग तो कहानी में आने चाहिये थे। पर कहानी में तो उनके आरम्भिक वैवाहिक जीवन के कुछ छुट-पुट दृश्य है जो उनके प्रेम को नहीं भूलने के प्रमाण बनते हैं बाद में तो ऐसा कहीं कुछ नहीं है। दीवानबाई सारी उम्र उसी शहर में रही जिस शहर में उसका प्रेमी रहता है, पर ऐसा कोई दृश्य नहीं है जिससे उनके मिलने, बातें करने और देह को रोमांचित करने वाले कुछ प्रसंग आते हों। लेखिका ने लिखा भी है, ’दीवानबाई की जवान आँखों के सामने उसके प्रेमी का घर बसा। उसकी बाल-बच्चेदार, लदी-फंदी आँखों के सामने उसके प्रेमी के घर किलकारियाँ गूँजीं। उसके चलनी के उस पार से चाँद और सुदामा प्रसाद को बारी-बारी से देखती आँखों के सामने उसका प्रेमी विधुर हुआ। उसके दूर की चीजें धुंधली दिखाई पडने वाली आँखों के सामने उसके प्रेमी के बाल सफेद हुए।‘ यानी सब कुछ सामने ही हो रहा है फिर भी एक दूरी बनी हुई है तब वह प्रेम का घनीभूत रूप कहाँ गया जो जीवन के इस पडाव में अचानक बाढ की तरह आता है। यदि बाढ आनी ही थी तो नदी को तो जीवित रखते। दरअसल, यह स्त्री मुक्ति के छद्म को गढने के लिये गढी गयी ऐसी कहानी है जो जीवन की वास्तविकताओं से मुँह मोडकर क्रांन्तिकारी उद्घोष करना चाहती है। जीवन के इस मोड पर दीवानबाई का यह कहना कि ’शादी से पहले किसी और के साथ मेरे सम्बन्ध थे और मैं उसके पास जाना चाहती हूँ। ....मैं उसके पास लौटना चाहती हूँ। इस घर के सारे कर्तव्य पूरे कर दिये मैंने।.... मुझे मुक्ति चाहिए।‘
स्त्री मुक्ति का यह सरलीकरण है। दीवानबाई जैसी वयोवृद्ध और घर-परिवार वाली स्त्रियाँ इस प्रकार का निर्णय नहीं लेतीं। निर्णय लेने का यह न तो समय है और न उसकी आवश्यकता। उनका दाम्पत्य जीवन और पारिवारिक जीवन बहुत अच्छी तरह चल रहा था। स्वयं कहानी लेखिका ने लिखा है-’दीवानबाई और सुदामा प्रसाद की गृहस्थी की नींव ऐसी कच्ची थोडे न थी। मानाकि आधार उनके सम्बन्धों का सीली हुई जमीन पर रखा गया था पर जमीन सीली हुई थी दरकी हुई तो नहीं। दीवानबाई फिर घर-संसार के छोटे-छोटे कामों में उलझ-पुलझ गयी थीं। सुदामा प्रसाद और बेटों को चांक से नीम का उबला पानी पिलवाना,, पोतों की उंगलियाँ पकडकर सडक पार करवाना, बहुओं के लिए फेरीवाले से मोल-तोल कर चूडयाँ खरीदना, सूखे धनिया के स्वस्थ मोटे गोटे को सिल पर दररना, चावल और कंकड को एक-दूसरे से अलग करना....दीवानबाई वक्त की रफ्तार से कदम साधकर चलना चाहती थीं।‘ समय के साथ चलने वाली दीवानबाई का यह समझदारीभरा रूप है, उन जैसी स्त्री का यही रूप हो सकता था और यही कहानी से निकलकर आता है पर कहानी लेखिका को तो कुछ और ही बताना था इसलिए वे उनके स्त्रियोचित रूप की अनदेखी करके क्रान्तिकारी, प्रेम के लिये सब कुछ बलिदान करने वाली आधुनिक स्त्री के रूप में उसे प्रस्तुत कर देती हैं। ऐसा नही कि दीवानबाई को प्रेम करने का अधिकार नहीं है, उन्हें अपने परिवार को छोडने का भी हक है पर इसके लिए स्थितियाँ तो अनुरूप होनी चाहिए थीं। रांगेय राघव की महत्वपूर्ण कहानी’ गदल‘ में नाती-पोतों और बहुओं वाली गदल घर छोडकर जाती है तो इसलिये कि देवर और उसके बच्चों ने उसक पति के मरने के बाद मृत्युभोज उदारमन से नहीं किया और जो देवर उन्हें पहली मुलाकात से ही चाहता था-उसने भी विधवा हुई गदल को हाथ पकडकर नहीं रोका। पूछने पर गदल स्वयं कहती है ’जगहंसाई से मैं नहीं डरती देवर ! जब चौदह की थी तब तेरा भैया मुझे गाँव में देख गया था। तू उसके साथ तेल पिया लट्ठ लेकर मुझे लेने आया था न तब ? मैं आयी थी कि नहीं? तू सोचता होगा कि गदल की उमर गई, अब उसे खसम की क्या जरूरत है? पर जानता है मैं क्यों गयी ?..अब मेरा यहाँ कौन है। मेरा मरद तो मर गया। जीते जी मैंने उसकी चाकरी की, उसके नाते उसके सब अपनों की चाकरी बजाई। पर जब मालिक ही न रहा तो काहे का हडकम्म उठाऊँ ? ये लडके, ये बहुएँ। मैं इनकी गुलामी नहीं करूँगी। ... कायर! भैया तेरा मरा, कारज किया बेटे ने और जब सब हो गया तब तू मुझे रखकर घर नहीं बसा सकता था। तूने मुझे पेट के लिए पराई ड्योढी लंघवाई।‘ गूजर जैसी जातियों में बडे भाई के मरने के बाद भाभी को रखने की परम्परा है, जिसे उसका देवर डोडी नहीं कर सका। गदल के अंदर अपनी परम्पराओं के निर्वाह के लिए ललक है। घर छोडना उसकी मजबूरी थी, वह देह मुक्ति के नारे के तहत घर छोडकर नहीं गई थी, जबकि उसकी उम्र उस समय कुल ४५ वर्ष ही थी, उसे देह की आवश्यकता रही होगी, पर यदि कहानी में यह सब आया होता तो कहानी इतनी बडी नहीं बनती।
’रंगमहल में नाची राधा‘ की दीवानबाई को इतनी बडी उम्र में भी देह की आवश्यकता महसूस होती है इसलिये भी घर छोडकर प्रेमी के पास चली जाती है। नीलाक्षी सिंह ने लिखा है-’उम्र के इस मोड पर ये कैसा भटकाव था। जब उम्र थी, इच्छाएँ थीं, भूख थी, तब जो सब नहीं कर पाई उन चीजों की ओर अब ..इतने सालों बाद। ये तो जीवन का अंत करीब आ रहा था, अब फिर से एक नया जीवन जीने की चाह। वह भी इतने दायित्वों में बंधी होने पर...समाज, घर, परिवार, रिश्तेदार...एक औरत होने के बावजूद। नहीं, उसे अपनी पुरानी दुनिया में ही रहना होगा, उसी में रमा देना होगा अपने को। उसने सुदामा प्रसाद की पीठ को सहलाया अपनी तर्जनी से, उसे मालूम था कि उसके स्पर्श मात्र से सुदामा प्रसाद के मन में हसरतें जाग उठेंगी और ....वह हमेशा के लिए अपने को अपनी गृहस्थी में डुबो देगी। लेकिन ये क्या ? कोई हरकत नहीं हुई सुदामा प्रसाद में। उसने अपनी बाहों का बंधन धीरे-धीरे श्लथ किया। उसके कानों में सुदामा प्रसाद के खर्राटे की महीन आवाज आई. उसने सावधानी से पूरी तरह अपने आपको सुदामा प्रसाद से अलग कर लिया। दीवानबाई ने नीले बल्ब की रोशनी में गौर से अपने पति का चेहरा पढा। उस पर साफ-साफ लिखा था कि सुदामा प्रसाद ये बाजी हमेशा के लिऐ हार चुके थे। यानी दीवानबाई को इस उम्र में भी पति, बच्चे, घर परिवार की जगह देह सम्बन्धों की अधिक आवश्यकता है उनके पूरा न होने पर... ‘‘दीवानबाई ने अपने आपको सजाया और अपने प्रेमी के दरवाजे की घंटी बजा दी। मैं एक बार फिर जोर देकर अपनी बात कहना चाहता हूँ कि एक उम्र के बाद स्.त्री और पुरुष को देह सम्बन्धों से अधिक घर और उसकी इज्जत अधिक प्यारी होती है, उन्होंने जिस घर को और घर के एक-एक सदस्य को पाल पोसकर बडा किया है, उन्हें आगे बढते देखना चाहते हैं। घर की समृद्धि और हंसी खुशी में ही वे अपने भविष्य को सुरक्षित पाते हैं। यह समय पीछे लौटने और प्यार के लिए मर मिटने का नहीं है। दीवानबाई ऐसा करती हैं तो पता नहीं क्यों करती हैं ? उसे तो अपने संघर्ष भरे जीवन को परिवार की उपलब्धियों में देखना चाहिए।
नीलाक्षी सिंह को भारतीय परिवारों की स्थितियों और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की समझ नहीं होगी, ऐसा मैं नहीं मानता पर इतना तो कहना ही चाहता हूँ कि अपने क्रान्तिकारी परिवर्तनों के बावजूद भारतीय घरों में ऐसा नहीं होता, अपवाद कहीं भी हो सकते हैं लेकिन अपवाद कहानी के विषय नहीं हो सकते। हमारा समाज लाख बुराइयों के बावजूद आगे बढ रहा है, स्त्री को वोट देने का अधिकार और अपनी तरह से जीने नौकरी करने का अधिकार इसी समाज ने दिया है। हर समाज की तरह इस समाज में भी विकृतियाँ है, जिनसे दोनों को सामूहिक रूप से लडना चाहिए। यह लम्बी लडाई है, जो एक दिन में हार थक कर पूरी नहीं हो सकती। और यह भी सच है कि असामान्य क्रान्तिकारिता भी किसी लडाई के हथियारों को भोथरा करती है, समय उसपर धार धरने का है। यह धार अपने समाज को समझकर ही धरी जा सकती है। नकली कहानियाँ और नकली क्रान्तिकारिता-दोनों ही स्त्री मुक्ति के आन्दोलन के विरोध में जाती हैं।
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