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टिमटिमाती आँखों से भर पेट रोटी के सपने लिए उसने महानगरी की धरती पर कदम रखा। स्टेशन परिसर में फैले नरमुंडों के सैलाब को देख उसका कलेजा यकायक कांप उठा इतनी भीड ! जैसे बर्र का छत्ता टूट गया हो। हर कोई भागा चला आ रहा था। एक-दूसरे को ठेलते हुए। आगे बढने से ज्यादा दूसरे को पीछे ढकेलने की जद्दोजहद।
घबराकर उसने बापू की उंगली पकड ली। बापू ने उसका हाथ थपथपाया। घबरा मत। सब कुछ पहले से तय हो चुका था। पाँच साल से दिल्ली में रहे गोपी भाई ने वायदा किया था कि शहर पहुँचते ही उन्हें रिक्शा दिला देंगे और मुन्ना व उसकी माँ को किसी साहब की कोठी में काम। बस गोपी भाई की चाल तक पहुँचने की देर थी। उसके बाद सारे सपने अपने होंगे। घूंघट से घिरी घरवाली को साथ आने का इशारा कर बापू उसका हाथ थाम गोपी भाई के बताये पते पर चल दिये।
एक....दो....तीन....दस....बीस...साठ...सत्तर दुकानों की गिनती करते-करते वह गिनती ही भूल गया। जाने कितनी दुकानें। एक से बढकर एक। वह सपने में जितना सोच सकता था उससे भी ज्यादा खूबसूरत। कहाँ कल्लू हलवाई की दुकान पर भिनभिनाती मक्खियों की बारात और कहाँ ये राजमहल जैसे भव्य शोरूम। कहीं कोई समानता नहीं। अब तो वह भूल कर भी उस गाँव में नहीं जायेगा जहाँ खेतों में हाड-तोडने के बावजूद भरपेट रोटी मयस्सर नहीं।
’’रोजी-रोटी दे न सके वह सरकार निकम्मी है,
जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है।‘‘
अचानक कान के पर्दों से कुछ अवाजें टकरायीं। इन्द्रलोक में पैशाचिक गर्जना सी।
’’रोटी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
जो छीनेगा उस पर धिक्कार है‘
सावन की फुहारों के मध्य तपती लू के थपेडे टकराये। ज्वार सी उमडती भीड को खाकी वर्दीधारी लाठियों की बाड लगाकर रोकने की असफल कोशिश कर रहे थे।
’’बापू यू का होवत है‘ उसने अपनी आँखों को बापू के चेहरे पर टिकाते हुए पूछा। विश्वास था कि बापू के पास हर प्रश्न का उत्त्र होगा। हर समस्या का समाधान।
’’ई सब रोटी मांगत हैं‘‘ बापू की अनुभवी आँखों में आशंका के बादल तैरने लगे।
’’मांगत काहे हैं ? हमरी तरह ई सब काम काहे नाहीं ढूंढत हैं‘‘ उसने समस्या का आसान सा हल सुझाया।
’’शहर मां शहर वालों का काम नहीं मिलत है‘‘ बापू ने रोजी-रोटी के अधिकार और समस्या की व्याख्या की।
’’जब उनका काम नहीं मिलत है तो हम परदेसिन का कैसे मिली?‘‘ उसने प्रश्नों का चाबुक नंगी पीठ पर जड दिया।
सटाक....एक नग्न सत्य अनायास ही उजागर हो गया था। काम नहीं इसलिये रोटी नहीं मिलती या रोटी नहीं मिलती इसलिये लोग काम नहीं करते। अंडा पहले आया था या मुर्गी? अगर मुर्गी न होती तो अंडा कैसे होता (मूल प्रश्न) लेकिन अगर अंडा ही न होता तो मुर्गी कैसे बनती (आधारभूत प्रश्न)। अचंभित, जड बापू कोई उत्तर खोज पाता उससे पहले ही खाकी वर्दी ने अपना असली रूप दिखा दिया। भूखों की भीड पर बरसा-बरसा कर लाठी की भूख मिटाई जाने लगी। रंक और राजा, भूख और वैभव के मध्य युगों-युगों से चले आ रहे रिश्तों पर नवीनीकरण की मुहर लगने लगी।
कोलाहल....क्रन्दन....चीत्कार....के मध्य कौन गिरा और कौन उठ नहीं पाया। कोई गणना नहीं। जिसकी जिधर सींग समाई दौड पडा। प्राणरक्षा ही शाश्वत सत्य है बाकी सब व्यर्थ है। आदि सिद्धान्त पूर्ण प्रचंडता के साथ प्रतिपादित होने लगा। भगदड और रेलमपेल में अपनों का साथ कब छूट गया पता ही नहीं चला।
एक गली में मुंह के बल गिरने के बाद बहुत मुश्किलों से वह सिर ऊपर उठा पाया। कंधों पर इन्सानों जैसे सिर चिपकाये अनेक धड भागे चले जा रहे थे। एक दूसरे को धकियाते। इन्सानियत से दूर हो, हैवानियत के करीब पहुंच रहे लोगों का हुजूम।
न कोई परिचित चेहरा न ही किन्हीं आंखों में परिचय जोडने की ख्वाहिश। फिर भी दैवीय मदद की आस में उसने आवाज लगाई, ’’बापू....ऽ....ऽ....ऽ
एक शब्द जो उसका सबसे बडा संबल था जूतों के कोलाहल के नीचे दब कर अस्तित्वहीन हो कर रह गया। किन्तु अभी भी शायद उसका इस शब्द से भरोसा टूटा न था। अतः अपने फेफडों म हवा भर उसने पूरी शक्ति से आवाजें लगाना शुरू कीं, ’’बापू....ऽ....माई तुम कहाँ हो...। बापू....ऽ....बापू....ऽ....।‘‘
उसकी सारी चेष्टाएँ तूफान के सामने दिये के संघर्ष सी साबित हुयीं। वह वहीं रुक कर बापू को खोजना चाहता था किन्तु पुलिस की लाठियाँ एक गली से दूसरी गली में भागने को मजबूर कर रही थीं। एक गली...दूसरी गली.... तीसरी गली....चौथी....यह गली....वह गली फिर किस गली से वह आया था खुद ही भूल गया।
कदमों ने जब तक साथ दिया वह चलता रहा। एक करोड की भीड म एक अदद माई-बाप की तलाश में प्यासे मृग सा भटकता रहा। किन्तु कदम भी कहाँ तक साथ देते? आखिर उनकी भी तो कोई सीमा थी। कदमों ने जब इन्कार कर दिया तो वह एक सडके के किनारे लुढक गया।
लोग आते रहे, जाते रहे। किन्तु न तो समय ठहरा और न ही लोग। सांझ होने तलक सिर्फ एक चीज करीब आयी। भूख। बदजात को न समय-कुसमय का ध्यान और न ही अच्छे-बुरे हालात का। उसने उसे ठेलने की बहुत कोशिश की किन्तु सब व्यर्थ। संकट में साया भले ही साथ छोड जाये पर भूख पूरी वफा निभाती है। सो एक बार आयी तो शिद्दत से चिपक कर रह गयी। उसका मन बहलाने के लिए वह हिम्मत करके एक बार फिर उठा और निरुद्देश्य सडक नापने लगा। खाली जेब हवा फांकते हुए।
’’अबे कालिया, तेरे से ७ छोकरा लाने को बोला था पर तू लाया है छै। २ बरातियों को काफी देगा, २ काजू-बर्फी की प्लेट घुमायेगा और २ पनीर रोल्स की। उसके बाद अप्पू हाथी कौन बनेगा तेरा बाप ?‘‘ लक्खू भाई टटवाला ने दहाड लगाई।
’’भाई भरोसा रखो। वह छोकरा भरोसे का है। आता ही होगा‘‘ कालिया घिघियाते हुए बोला।
’’लक्खूभाई तेरे भरोसे पर भरोसा कर अपन के ग्राहकों का भरोसा नहीं तोडेगा‘‘ लक्खू भाई ने कालिया को घूरा फिर आँखें मिचमिचाते हुए फैसला सुनाया, ’’बारात का टाईम हो रहा है। अगर ५ मिनट में छोकरे का इन्तजाम नहीं किया तो आगे से तेरे से धंधा बंद।‘‘
कालिया जानता था कि लक्खूभाई बात का पक्का है। अगर हाँ बोला तो हाँ, न बोला तो न। आस-पास के इलाके में ज्यादातर बारातों में टेंट और कैटरिंग का ठेका लक्खू भाईै का ही होता था। उनको लेबर सप्लाई कर के अच्छा कमीशन बन जाता था। आज तगडी सहालग थी। इसलिए छोकरों का अकाल पड गया था। ड्योढे दाम देकर बहुत मुश्किल से ७ छोकरे पटाये थे लेकिन एक दगा दे गया। साले को कहीं दोगुने पैसे मिल गये होंगे। मन ही मन उसने एक भद्दी सी गाली दी और सडक पर आकर इधर-उधर नजर दौडाने लगा।
सडक नापते-नापते उसके कदमों ने एक बार फिर जवाब दे दिया था। एक खंभे से पीठ टिका, वह निढाल होकर बैठ गया। कालिया की अनुभवी आँखों ने पल भर में ताड लिया कि छोकरा जरूरत मंद है। कुशल शिकरी की भाँति वह दबे पाँव करीब आया और फंदा उछालते हुए बोला-’’परेशान मालूम पडते हो।ं अगर एक छोटा सा काम कर दो तो अच्छी कीमत दूँगा।‘‘
’’रोटी मिलेगी ‘‘ अपनी टिमटिमाती आँखों को ऊपर उठाते हुए उसने पूछा।
’’रोटी क्या पूरी दावत मिलेगी। पूडी सब्जी, नान, पुलाव, बिरयानी-चाउमीन, बर्गर, पिज्जा सब मिलेगा‘‘ कालिया ने आश्वासन का टोकरा थमाया।
’’मुझे सिर्फ रोटी चाहिए‘‘ उसने अपनी वक्ती आवश्यकता और कीमत बताई।
सौदा सस्ते में पट सकता है। कालिया ने उसे आँखों में तोला फिर बोला, ’’काम ज्यादा कठिन नहीं है....‘‘।
’’बाबू रोटी कमावे से ज्यादा नहीं होई तुम्हारा काम‘‘ उसने कालिया की बात काटी फिर खडा हो मिट्टी झाडते हुए बोला, ’’चालो‘‘।
कालिया ने मन ही मन उस न आने वाले छोकरे को धन्यवाद दिया। अगर वह आ जाता तो कम से कम १०० रूपये देने पडते। इसे तो बारात का बचा-खुचा खिलाने के बाद १०-२० रूपये देने से ही काम चल जायेगा। उसका हाथ थाम वह लपकता हुआ लक्खूभाई के पास चल पडा।
’’साले, हरामखोर, अब आने का टाइम हुआ तेरा‘‘ लक्खू भाई ने उसे देखते ही दहाड लगायी फिर डपटते हुए बोले, ’चल जल्दी से मेटाडोर पर बैठ और काम पर जा।‘‘
’’बाबू साहब, पहले रोटी मिल जाती फिर जो काम कहिओ कर देईब‘‘ उसने दबी जुबान में याचना की।
’’साले....ऽ....हमसे जुबान लडाता है‘‘ लक्खूभाई ने एक भरपूर दोहत्थड जडा फिर चीखते हुए बोले , ’’दो घंटे देर से आया है ऊपर से पहले रोटी चाहिए। लंगर खोल रखा है तेरे वास्ते। चुपचाप गाडी में बैठ जा वरना टांगें चीर कर रख दूंगा।‘‘
उसे अपना दोष समझ में नहीं आया। किन्तु लक्खूभाई का रौद्र रूप देख कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। कालिया के साथ चुपचाप सामने खडी पुरानी मेटाडोर पर सवार हो गया। उसमें १२-१४ साल के ६ लडके और बैठे थे।
मेटाडोर जब दो फर्लांग निकल आयी तो लक्खू भाई का खौफ कुछ कम हुआ। उसने हिम्मत जुटा कर कालिया से कहा, ’’साब बहुत भूख लाग है। आप कहे राहे कि रोटी....‘‘
’’भइया थोड धीरज रखो। बारात में चल रहे हैं वहाँ जी भरकर माल उडाना‘‘ कालिया ने समझाया।
’’किसकी बारात? हियां तो हम कौनो का जानत नाहीं हैं‘‘ वह आश्चर्य से भर उठा।
’’किसी को जानने-बूझने की क्या जरूरत ? अपना काम करो, रूपया वसूलो और बात खत्म।‘‘ एक लडके ने दर्शन बघारा।
’’बारात मां काम तो लडकी वाले करत हैं। हम लोग किस की तरफ से हैं? लडका वाले की ओर से या लडकिन वाले की।‘‘ उसने अनिश्चय भरे स्वर में पूछा।
’’हमलोग बीच वाले हैं‘‘ दूसरा लडका ताली बजाते हुए भद्दे ढंग से मुस्कुराया फिर कालिया की ओर देखते हुए बोला-’सेठ ये तो नया पंछी मालूम पडता है। कहां से फांसा है?‘‘
’’अबे चोप्प, बेकार की बकवास मत कर‘‘ कालिया ने छोकरे को डपटा फिर उसकी ओर मुडते हुए बोला, हम लोग मेहमानी नहीं मजदूरी करने चल रहे हैं वहां।‘‘
’’ओह, ‘‘ बात उसकी समझ में आ गयी। अतः खोपडी हिलाते हुए बोला,’’कौन सा काम करना होगा हमें।‘‘
’’कुछ खास नहीं‘‘ उसने मेटाडोर में एक किनारे पडे हुए अप्पू हाथी के खोल की ओर इशारा करते हुये कहा, ’’तुम इसे पहन कर हाथी बन जाना और बच्चों के बीच टहलना, उनसे हाथ मिलाना, थोडा बहुत मटक भी लेना।‘‘
’बस इतना आसान काम‘ उसने मन ही मन सोंचा। इस काम के वह पैसे नहीं लेगा। बस भर पेट खाना खाने के बाद माई-बापू को ढूंढने निकल पडेगा। पता नहीं वे कहाँ होंगे? किस हाल में होंगे ? कुछ खाया-पिया होगा या नहीं? सोचते-सोचते उसकी आँख छलक आयीं।
’’अबे इतनी देर से सोच क्या रहा है अब फटाफट तू भी तैयार हो जा मंजिल आने वाली है‘‘ कालिया ने कोहनी मारते हुए उसे घुडकी दी।
उसने चौंक कर देखा। बाकी सभी लडके तैयार हो चुके थे। फटे-पुराने चीथडों के स्थान पर उनके बदन पर झकाझक पैंट शर्ट, जैकेट और टाई चमक रही थी। जैसे जादू हो गया हो। भुक्खडों के स्थान पर सबके सब राजकुमार सरीखे बांके नजर आ रहे थे।
कालिया ने अप्पू के लबादे में पीछे बनी चेन खोल दी। उसने पहले अप्पू की टांगों में टांगें डालीं फिर पूरा का पूरा भीतर घुस गया। कालिया ने चेन बंद कर दी फिर पीछे लगे वाल्व से पंप को जोड कर हवा भरने लगा।
एक....दो....तीन....चार....कालिया जितने पंप मारता अप्पू का शरीर उतना ही फूलता जा रहा था। उसी साथ बढती जा रही थी उसके भीतर उमस और गर्मी। उसे लगा जैसे उसके भीतर दम घुट जायेगा। जिस काम को वह आसान समझ रहा था वह तो बिल्कुल जान लेवा था।
’’अबे जहां छेद बना है वहां अपनी नाक रख वरना इसी के भीतर मर जायेगा‘‘ कालिया ने पंप रखते हुए जोर से डपटा।
उसने इधर-उधर देखा। जिस जगह पर अप्पू की सूंड सिली थी वहां बहुत सफाई से छेद कर कपडे की जाली लगा दी गयी थी। उसने अपनी नाक वहां रखी तो राहत मिली। अब थोडा वक्त काटा जा सकता है।
’’चलो नीचे उतरो और अपना-अपना काम संभालो‘‘ मेटाडोर रुकते ही कालिया ने आवाज लगायी।
सभी लडकेउछल कर नीचे उतर गये फिर उन्होंने सहारा देकर उसे नीचे उतारा।
’’चलो गणेश जी महराज, पूरा पांडाल घूम-घूमकर जायजा लो कहां क्या बना है आपको तो कोई रोकेगा-टोकेगा नहीं‘‘ एक लडके ने उसके पेट पर घूंसा जडते हुए कहा।
’’हां भाई, अपनी-अपनी किस्मत है‘‘ दूसरे लडके ने सांस भरी फिर उसे छोड वह आगे बढ गये।
उसने चारो ओर दृष्टि दौडाई। पूरी स्वप्न नगरी सजी हुयी थी। रंग-बिरंगी रौशनी से नहाये विशाल पांडाल में आभूषणों से लदी स्त्रियाँ परियों सी इतराती फिर रही थीं। सूट-बूट में सजे पुरूषों का रौब-दाब तो देखते ही बनता था।
पांडाल के अग्रभाग में लगे चाट-कार्नर पर तो गुड्डे-गुडयों से सजे बच्चों की भीड टूटी पड रही थी। नथुनों में घी-मसाले की खुशबू पडी तो खिंचता हुआ वह चाट-कार्नर की ओर बढ गया।
’आह, आत्मा तृप्त हो गयी। अगर खुशबू में इतना आनंद है तो स्वाद में कितना होगा।‘ मुंह में भर आये पानी को लीलते हुए उसने हिसाब लगया। बिल्कुल मुफ्त में बंट रही थी चाट। वह भी खायेगा। जी भर कर।
’’हैलो, मिस्टर अप्पू, हाउ डू यू डू‘‘ तभी एक लडके ने उसका रास्ता रोक अपना हाथ आगे बढाया।
उसकी समझ में ही नहीं आया कि वह क्या कह रहा है। अतः अचकचा कर खडा हो गया।
’’रियली यू आर वेरी हैंडसम, लुकिंग जस्ट लाइक ऐ प्रिंस‘‘ उस लडके ने अपने दाहिने हाथ से उसका पंजा पकड कर जोर से हिलाया और फिर खिलखिलाते हुए आगे बढ गया।
चंद क्षणों तक भौंचक्का रहने के बाद उसने कदम आगे बढाये ही थे कि बच्चों की भीड ने उसे घेर लिया। कोई उससे हाथ मिलाना चाह रहा था तो कोई उसकी पूंछ छूकर देखना चाहता था। कोई उसे स्पर्श कर दूर भाग जाता तो कोई दूर से ही उसे देख कर आनंदित हो रहा था। चंद क्षणों में ही वह सबके आकर्षण का केन्द्र बन चुका था।
किन्तु उसका आकर्षण ? उसका आकर्षण तो तवे पर सिंक रही गर्मा-गर्म टिक्कियां थीं जिन्हें देख पेट में कूद रहे चूहों ने अब घमासान मचा दिया था। मौका देख कर वह धीरे-धीरे चाट स्टाल के करीब बढने लगा। उसी के साथ बच्चों की भीड भी उस ओर खिसक रही थी।
पहले क्या मांगे टिक्की या मटर? उसने सोचा। टन्न....टन्न....टन्न तभी चाट वाले ने अपने हाथ की कलछुल को तवे पर जोर से पटका फिर काट खाने वाले अंदाज में गुर्राया, ’’अबे खोपडी पर क्यूं चढा आ रहा है। दूर जाकर खडा हो। भीड भाड में अगर तवा पलट गया तो तेरे साथ-साथ मेरी हड्डी-पसली भी तोड दी जायेगी।‘‘
छन्न....सारा उत्साह गर्म तवे पर पडे पानी सा उड गया। ’हम लोग मेहमानी नहीं मजदूरी करने चल रहे हैं कालिया का वाक्य याद आते ही वह स्वप्न लोक की ऊंचाइयों से यथार्थ के कटु धरातल पर आ गिरा।
भूख से कुलबुला रही अंतडयों को काबू में करते हुए वह पीछे पलटा। सामने से उसके चार साथी काजू-बर्फी और पनीर रोल्स की प्लेटें लिए चले आ रहे थे। उसने देखा। बिल्कुल साफ देखा। उन चारों ने मौका मिलते ही बर्फी के कुछ टुकडे अपने मुंह में डाल लिये थे।
ये लोग जरूर उसकी मदद करेंगे। पूरी उम्मीद के साथ वह आगे बढा। किन्तु वे चारों उसकी बगल से यूं निकल गये मानों उसे देखा ही न हो।
बारात आ चुकी थी। चाट-कार्नर, फ्रूट-चाट, कोलड्रिंक्स हर स्टाल पर लोग यूं टूट रहे थे मानों खाने के अलावा और कोई काम ही न हो। सिर्फ एक वह जो खाने के लिए काम कर रहा था उसे खाने को कुछ भी नसीब न था। समुद्र के बीच खडा वह एक बूंद जल के लिए तरस रहा था।
जयमाल पडते ही डिनर शुरू हो गया। लोग हाथ जोड-जोडकर मेहमानों से खाना खाने के लिए विनती कर रहे थे। असमंजस में फंसा वह भी भीड के साथ भोजनस्थल की ओर बढ चला।
’अरे बाप रे, इतना खाना ! रोटियों का पूरा पहाड ! छोटी रोटी, मोटी रोटी, पतली रोटी, पीली रोटी। जाने कितनी तरह की पूडी और रंग-बिरंगी कचौडयाँ। बडी-बडी मेजें पकवानों से अटी पडी थीं। उनसे उड रही खुशबू भूख को बेकाबू किये दे रही थी। बस दो रोटी और प्याज ही उसे मिल जाये तो वह यहां से चला जायेगा।
’’अबे, यहां खडा होकर क्या कर रहा है। उधर बच्चे धमा-चौकडी मचा रहे हैं जाकर उनका मन बहला‘‘ तभी एक कडकदार आवाज ने चाबुक जडा।
खाना सामने देख अंतडयाँ विद्रोह पर उतारू हो गयी थीं। उनका दमन करते हुए एक बार फिर वह मुख्य पांडाल की ओर आ गया। बच्चे अब उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहे थे। उन्हें नये दोस्त और नये खेल जो मिल गये थे।
थोडी देर बाद से अपना एक साथी एक कोने में खडा दिखा। उसके करीब पहुँच उसने फुसफुसाते हुए पूछा,’’ हमलोगन का खाना कब मिली?‘‘
’’अमा यार, तू तो पूरा भुक्खड मालूम पडता है। जबसे आया है सिर्फ खाने की बात कर रहा है।‘‘ वह ठठाकर हंसा फिर उसका पेट थपथपाते हुए बोला, ’चिंता मत कर। ये मेहमान निबट लें फिर सारा माल अपना ही है।‘‘
उसने पांडाल में बैठे मेहमानों पर दृष्टि दौडाई। काफी लोग खाना खाने जा चुके थे, बचे खुचे आधा घंटे में निबट जायेंगे। उसने हिसाब लगाया। उसके बाद वह दुनिया की सबसे बडी आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है।
उसका हिसाब तो सही था किन्तु गणित थोडी सी गडबडा गयी। आधे घंटे में ज्यादातर मेहमान तो निबट गये किन्तु नशे में धुत दूल्हें के दोस्त मदहोश हो नाचे जा रहे थे, नाचे जा रहे थे। दोस्तों के इंतजार में दूल्हा अभी तक बैठा था। मजबूरन लडकी के घरवालों ने भी खाना नहीं खाया था।
पौने बारह बज चुके थे। थोडी देर में तारीख बदलने वाली थी। उससे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। भीड काफी छंट चुकी थी सिर्फ स्टेज के आस-पास कुछ लोग जमा थे।
इधर-उधर देखते हुए वह एक बार फिर खाने के पांडाल की ओर बढने लगा। वहाँ भी इतना खाना बचा था कि वह साल भर खाये तब भी खत्म न हो। किन्तु उसे तो सिर्फ दो रोटियाँ चाहिए थ। सारे वेटर बातों में मशगूल थे। मौका ताड कर उसने रोटियाँ उठाने के लिए हाथ आगे बढाया तो धक्क से रह गया। उसका हाथ तो अप्पू के चोंगे के भीतर था। वह चाह कर भी रोटी नहीं उठा सकता था। अपनी बेबसी पर उसकी आँखें भर आयीं किन्तु उसके आंसुओं को देखने वाला वहाँ कोई न था।
मन मार कर वह मुख्य पांडाल की ओर वापस लौट आया। उसके साथी एक कोने में बैठे बातें कर रहे थे। कुछ सोंचकर वह उनके करीब आया और फुसफुसाते हुए बोला, ’’ईके भीतर बहुत उमस है। बिल्कुल दम घुटा जा रहा है। अब ईका उतरवाय दो।‘‘
’’अबे अगर इसको उतार दिया तो कालिया एक पैसा भी नहीं देगा।‘‘ एक लडके ने समझाया।
’’हमका पैसा नहीं, रोटी चाही।‘‘ उसके स्वर से बेबसी झलक उठी।
’’अजीब घामड है तू। जब से मिला है रोटी-रोटी लगाये है। अगर कालिया भडक गया तो तेरी बोटी से रोटी खायेगा। इसलिए मुंह बंद रख।‘‘ दूसरे लडके ने उसका यथार्थ से परिचय कराया।
’’लेकिन ईके भीतर की गर्मी बर्दाश्त से बाहर है‘‘ उसने अपना पक्ष सामने रखने का प्रयत्न किया।
’’उसका इंतजाम किये दे रहे ह‘‘ उस लडके को दया आयी और उसने उठकर पीछे से चोंगे की चेन आधे से ज्यादा खोल दी।
वह तो यही चाहता था। टहलता हुआ एक अंधेरे कोने में आया और हाथ-पैर झटक कर चोंगे को उतार दिया। अब वह आजाद था। उसके और रोटी के बीच अब कोई दीवार न थी।
उसने इधर-उधर दृष्टि दौडाई। दूल्हें के नशेडी दोस्त अभी भी डांस करने में मस्त थे। सधे कदमों से वह एक बार फिर भोजन स्थल की ओर बढा। वेटरों का समूह अभी तक बातों में मशगूल था।
मौका देखकर उसने एक रोटी उठाई ही थी कि नशे में धुत एक बाराती की दृष्टि उस पर पड गयी। वह बुक्का फाड कर चीखा, ’’चोर....ऽ....चोर....ऽ....चोर....ऽ....
कहाँ है....ऽ....किधर है....ऽ....कौन है....ऽ....‘‘ अनेकों स्वर एक साथ गूंज उठे।
चक्रव्यूह में चर्तुदिक बाण वर्षा से आक्रांत हो वह भागा। किन्तु अभिमन्यू भी भला कभी बच पाया है? पकडो....ऽ....पकडो....ऽ.... जाने न पाये....ऽ....। भद्रजनों के सिंहनाद ने आह्लादित भीड का उत्साहवर्धन किया। ऐसे सुअवसरों के तलाश में रहने वाले कायरों ने रणबाकुंरों का मुखौटा लगा लिया और पिल पडे बुराई के समूल नाश के पवित्र अभियान में।
न कोई आरोप पत्र, न बचाव पक्ष के फिजूल के तर्कों में समय गवांने का झंझट। बस सीधा न्याय। लात-घूसों ....थप्पडों की अमृत वर्षा के मध्य न तो किसी को यह जानने की फुर्सत थी कि क्या चुराया है, और न ही किसी ने इसकी आवश्यकता समझी। क्योंकि चोरी तो चोरी होती है। चाहे छोटी हो या बडी। कानून सबके लिए बराबर।
’’अबे ये साला फटीचर बारात में आया कहाँ से। पता लगाओ कहीं इसके और साथी तो नहीं हैं‘‘ तभी किसी जागरूक ने राय दी।
बात में दम था। आधी भीड गुप्तचरों का रूप धर चारों दिशाओं में फैल गयी। अगले ही पल एक जेम्स बांड अप्पू का चोंगा लहराते हुए चीखा, ’’ये देखो, साला अप्पू बन कर चोरी करने आया था।‘‘
’’साले का कपडा और चोंगा दोनों फाड कर देखो, पता नहीं कितना माल छुपा रखा हो।‘‘ किसी अकलमंद ने राय दी।
चर्र....चर्र....चर्र....दुश्शासनों के हाथ वस्त्र हरण करने लगे। किसी कृष्ण का हाथ उसे बचाने नहीं आया। हां आया तो दौडता हुआ कालिया आया। चिंदी-चिंदी हो चुके चोंगे पर दृष्टि पडते ही उसका खून खौल उठा। हर्जाने में अब लक्खू भाई कम से कम चार बरातों का कमीशन काट लेंगे। यह सोच उस पर भूत सवार हो गया और वह राशन-पानी लेकर उस पर पिल पडा, ’’साले, चोरी करता है....नमकहराम....ऽ....जिस थाली में खाता है उसी में छेद करता है। हम मजदूरों का नाम बदनाम करता है....ऽ....।‘‘
उसकी चीखें निकल रहीं थीं किन्तु कालिया रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसे पीटते-पीटते जब उसके हाथ दर्द करने लगे तो वह क्षण भर के लिए रुका फिर उसके बाल झिंझोडते हुए दहाडा ’’जल्दी से बता क्या चुराया है वरना टांगे चीर कर रख दूंगा।‘‘
मुंह से निकल आये खून को पोंछने के |