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13 October 2008
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जिंदा आदमी की शवयात्रा
मुरारी शर्मा

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साँझ ढल रही थी। तुलजे राम दुकान के फट्टे चढा रहा था। उसे घर पहुँचने की जल्दी थी। शाम का अंधेरा घाटी में पसर रहा था, पर आसमान में घिर आई घटाओं से यह और भी स्याह हो गया था। सायं-सायं करती डरावनी हवा की पीठ पर सवार आवारा बादल मस्ती में डोलती देवदार की चोटियों से छेडछाड कर धार के दूसरी ओर निकल जाते। हवा के वेग से हिलते देवदार, बुरांस, बान, कैल और तोस के पेडों से डरावनी सी आवाजें निकल रही थी....। मानों किसी हॉरर फिल्म का दृश्य चल रहा हो.... कोई  और होता तो शायद इस शोर को सुन डर जाता.... मगर तुलजे राम इसका अभ्यस्त था। दोनों घाटियों के बीच स्थित इस ’गले‘ पर सुबह शाम ऐसी ही तेज हवाएँ चलती हैं।
दुकान का आखिरी फट्टा चढा कर तुलजे राम ने कुंडे पर ताला जड दिया। तसल्ली के लिए एक बार ताले को खींच कर देखा और पगडंडी के रास्ते घर की ओर चल दिया। धारगलू पर तुलजेराम की दुकान आने जाने वाले मुसाफिरों के लिए तो पडाव थी ही.... गाँव वालों का राशन व कपडा-लत्ता भी इसी दुकान से ही जाता। गाँव वालों की जरूरत का हर सामान तुलजे राम की दुकान में मौजूद रहता। वो भी इलाके की दूसरी दुकानों से कहीं सस्ते दामों पर।
तुलजे राम का घर दुकान से एक डेढ फर्लांग की दूरी पर ही था। मगर खराब मौसम, उबड-खाबड रास्ते के वजह से उसे यह दूरी कई मील लग रही थी। गाँव के लिए एकमात्र रास्ता मगर, वो भी ठीक नहीं। हालाँकि, कागजों पर यह रास्ता पक्का हो चुका था। प्रधान के लडके ने इसका ठेका लिया था.... बाप का राज था, सीमेंट की जगह रेत ही बिछा दिया। बरसात की पहली ही बारिश में बह गया सब.... जैसे पहले यहाँ पर एक भी ’तगारी‘ मसाला न डाला हो। इसके बाद फिर किसी ने भी इस रास्ते की सुध नहीं ली। जब से तुलजे राम ने धारगलू में दुकान डाली है अक्सर रात के अंधेरे में उसे यहाँ से जाना पडता है....अँधेरे में इस उबड-खाबड रास्ते पर कई बार गिरा-पडा है। मगर अब वह इस रास्ते का आदी हो गया है....कहते हैं घर की ओर जाने वाले रास्ते पर आँख मूँदकर भी चले तब भी उसे पता रहता है कि कौन-सा*कदम यहाँ रखना है। जैसे रास्ते को कदमों से नाप रखा हो....!
....तुलजे राम इस गाँव का सबसे पढा-लिखा नौजवान था। गाँव ही नहीं पूरे इलाके का एकमात्र ग्रेजुएट था वह....। बापू तो उसे आठ जमात तक पढा कर भेड पालन के पुश्तैनी धंधे में ही लगाना चाहता था। मगर तुलजे राम इसके लिए राजी नहीं था.... सारी उम्र पाँवों से बिल्ली बँधी रहती है, उम्र कट जाती है भेड-बकरियों के साथ सफर में ही। गर्मियों में उँचे ’जोत‘ पार कर खुली चरागाहोांें में भेड-बकरियों के साथ खुले आसमान के नीचे गुजारनी पडती है.... ’मिरग‘ और भालू का ख्ातरा हर समय बना रहता है। न जाने कब हमला कर बैठे.... ऐसे में पुहाल के पालतू कुत्ते ही सीना तान कर हमलावर को ललकारते हैं।
....बचपन में तुलजे राम एक बार बापू के साथ भेडों को लेकर ’जोत‘ पर गया था। तभी उसने कसम खा ली थी कि वह पढ-लिखकर कुछ भी करेगा.... पर बापू की तरह भेड पालक ’पुहाल‘ नहीं बनेगा। ’पुहाल‘ की जिंदगी भी कोई जिंदगी है ?.... दिन-रात बस भेडों का ही साथ.... कोई बात करने वाला भी नहीं मिलता है। उसने देखा था जब भी ’जोत‘ में बापू को घर की याद आती.... वह चट्टान पर पीठ टिका कर देर तक बाँसुरी बजाता रहता.... बापू की बाँसुरी की सुरीली आवाज देर तक घाटियों में गूँजती रहती.... जो दर्द का संगीत बनकर हिमशिखरों, ग्लेशियरों और गहरी घाटियों के बीच न जाने कहाँ खो जाता।
तुलजे राम ने बापू को मना लिया था।े वह दूसरी बार ’जोत‘ में भेडें चराने नहीं आएगा....। यहाँ से लौट कर स्कूल में अगली क्लास में एडमिशन लेकर वह अपनी पढाई जाारी रखेगा। पढ-लिखकर बडा आदमी बनना चाहता था वह....! बापू ने भी बेटे के दिल की बात जान कर उसे आगे पढने की इजाजत दे दी थी। बापू भी जानता था कि पुहाल की जिंदगी भी इन पहाडों की तरह है.... जो बाहर से देखने में खूबसूरत हैं.... मगर वास्तव में यहाँ का जीवन उतना ही दुरूह और जीवट है, अपनी जिंदगी तो उसने किसी तरह काट ही ली, अब बेटा पढ लिखकर कुछ बन जाये तो उसे और क्या चाहिए ?
....तुलजे राम का मकसद भी पढ-लिखकर सरकारी नौकरी लगना और आराम की जिंदगी गुजारना ही नहीं था। अपने साथ वह गाँव की हालत और गाँव वालों की सोच को भी बदलना चाहता था। मगर वक्त के साथ तुलजे राम का यह सपना शेखचिल्ली ही ’डींग‘ साबित होने लगी। बी.ए. करने के बाद भी उसका संघर्ष ख्ात्म नहीं हुआ.... नौकरी के लिए आवेदन देते-देते वह थक गया था.... हर बार लिखित परीक्षा  पास  करने  के  बाद पर्सनल में बाहर कर दिया जाता.... यहाँ पर सिफारिशी ’टट्टू‘ बाजी मार जाते। उसके सारे ख्वाब पहाड की टेढी-मेढी पगडंडयों में बिना किसी ठौर ठिकाने  के  भटकते  रहे और  वह  अंदर ही अंदर टूटने लगा....।
....बापू से यह सब देखा नहीं गया.... वह इलाके के विधायक मानसिंह ठाकुर के पास भी गया था.... मानसिंह के बाप ध्यान सिंह से बापू की पुरानी जान पहचान थी। कभी उन दोनों ने एक साथ ही रोहतांग जोत के उस पार भेड-बकरियां चराई थीं। दोनों में आपसी धर्मचारा भी था।
....तुलजे राम ने जंगलात महकमे में गार्ड का इंटरव्यू दिया था। दौड और लिखित परीक्षा में वह अव्वल आया था। पर्सनल इंटरव्यू भी ठीक हो गया। यह बात उसने बापू को भी बता  रखी  थी।  एक  दिन  सारे  काम धाम छोडकर बापू विधायक से मिलने चला गया। सर्किट हाउस में लोगों से घिरा ठाकुर मानसिंह कभी टेलीफोन पर लंबी बातचीत करता तो कभी लोगों द्वारा दिए कागजों पर कुछ लिखता रहता। तुलजे राम का बापू यह सब हैरानी से देखता रहा.... कितना काम होता है विधायक को भी....। मगर जिन लोगों के वह काम कर रहा है वे तो उसके अपने क्षेत्र के लगते ही नहीं है.... सारे शहरी बाबू ही हैं.... उसकी तरह ठेठ ग्रामीण तो कोई नहीं है। अब वह इन लोगों के सामने उससे बात करे भी तो कैसे? मारे संकोच के वह दरवाजे के पास भीड छंटने का इंतजार करने लगा। लेकिन जितने लोग जाते उतने ही और आ जाते। आखिर हिम्मत जुटाकर वह कमरे में दाखिल हो गया। विधाायक जी नजर भी उस पर पड गयी। उसे पास बुलाकर पूछा ’क्या बात है-’देवीराम जी कैसे आना हुआ?‘‘
बापू ने हिम्मत करके तुलजे राम के इंटरव्यू की बात उसे बताई तो विधायक ने डायरी पर उसका नाम आदि नोट कर लिया और कहा ’आप बेफिक्र रहो ये काम हो ही गया समझो।‘ वह वापस लौटने लगा फिर अचानक रुक गया विधायक के पास जाकर झिझकते हुए कहा ’ठाकर जी आप बडे साहब को फोन कर देते तो काम बन  जाता।‘ उसने देख रखा था कि जिसका भी काम होता उसके लिए विधायक फोन कर देता था। उसे लगा कि विधायक उसके लिए भी अगर फोन कर दे तो बात बन जाएगी और वह भी निश्चिंत होकर घर लौटेगा....। विधायक ने एक नजर देवीराम पर डाली और पास बैठे अधिकारी को आँख मारते हुए फोन उठा कर कोई नंबर मिला कर बीच में ही काट दिया और कटे हुए फोन पर देर तक यूँ ही बात करता रहा। फोन रखने के बाद वह देवी राम से बोला ’मैंने बडे साहब से बात कर ली है.... तू अब घर जा, तेरा काम हो जाएगा। इतना कहने के बाद वह कमरे में मौजूद लोगों को देखकर मुस्कुराया.... उसके साथ वे भी मुस्कुरा दिए.... उनकी इस शातिराना मुस्कान का मर्म भोला-भाला देवीराम नहीं समझ पाया। उसे तो इस बात की तसल्ली थी कि शहर में भी उसके विधायक ने इतने लोगों के बीच उसे पहचान लिया और उसकी बात सुनी भी.... अब तो उसके बेटे का सपना साकार हो जाएगा।
....देवी राम का यह भ्रम तो कुछ दिनों बाद ही टूट गया। इंटरव्यू का रिजल्ट निकला मगर लिस्ट में तुलजे राम का कहीं नाम नहीं था। नौकरी मिली भी तो देवता के कारदार के थर्ड डिवीजन दसवीं पास लडके को। जो लकडी की तस्करी में कई बार पकडा गया था, मगर विधायक की वजह से उस पर कभी केस नहीं बना। अब उसे ही जंगलात महकमें की नौकरी मिलने का मतलब था मानों गिद्ध को ही मांस की रखवाली सौंप दी गई हो....।
....हर बार कोई न कोई अडचन तुलजे राम से हाथ आई नौकरी छीन लेती.... अब उसने भी उम्मीद छोड दी थी। बापू तो इस घटना के बाद निराश हो गया था.... वह विधायक को उसके चमचों के सामने गालियां देता ’हमारे ही वोट से विधाायक बनता है साला और हमारे साथ ही ’छेहचारी‘ करता है।‘
-उसका खास चमचा खीमे राम उसे समझाता-’’ऐसी बात नहीं है चाचू तेरे सामने ही तो ठाकर साहब ने फोन कर दिया था.... कहीं कुछ कमी रह गई होगी, वर्ना यह काम तो हो ही गया था ’’देवी राम बुरा-सा मुंह बनाकर कहता ’कमी‘....? क्या कमी थी मेरे बेटे में.... उस कारदार का स्मगलर छोकरा क्या मेरे बेटे से ज्यादा अव्वल है?‘‘ देवीराम के तेवर देख खीमे राम सहम गया था।
इलाके  में  विधायक  का नाक व कान वही था। विधायक के ख्ालाफ कहां क्या पक रहा है वह झट से सूंघ लेता था। इलाके की हर खबर वह विधायक तक पहुंचाता रहता था.... हर खुशी गमी की सूचना वह उस तक पहुंचा देता। जब भी विधायक दौरे पर आता वह सारी तस्वीर उसके सामने पेश कर देता। किसके घर में बच्चा बीमार है.... बूढे की मौत हो गई या फिर किसकी घरवाली किसके साथ भाग गई.... यही नहीं प्राकृतिक आपदा से किसका कितना नुकसान हुआ और उसे क्या मदद मिली। जो काम हो गया उसका श्रेय खुद ले लेता, जो नहीं हुआ उसके लिए पहले से ही उसके पास बहाना तैयार रहता था।
इसके अलावा किसी का डंगर-पशु भी अगर बीमार है.... तो खीमेराम इसकी सूचना भी अपने आका तक पहुंचा देता था। विधायक भी इलाके के हर आदमी के नाम व गाँव के नाम से वाकिफ था। खीमेराम की सूचना के आधार पर वह उनसे बातों ही बातों में उनका हालचाल पूछ लेता। यहां तक कि गाय व बैल की ’सुखशांत‘ पूछ लेता। लोग इसी में खुश थे। मगर कभी-कभी विधायक का निशाना गलत जगह पर लग जाता.... जो बुजुर्ग दो साल पहले बीमारी की हालत में चल बसा हो उसके स्वास्थ्य का हालचाल पूछ बैठता और जो जिंदा होता उसकी मौत का अफसोस करने लग जाता....।
....तुलजे राम के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। जबसे तुलजे राम का विधायक पर से न केवल  भरोसा ही उठ गया था बल्कि उसे वह दुनिया का सबसे कमीना और धूर्त आदमी नजर आने लगा था। जो इन भोले भाले लोगों को बेवकूफ बनाता है। इसके बावजूद वह उनका शुभचिंतक होने का स्वांग करता है.... नौटंकी साला.... बात-बात में रंग बदलता है।
उस रोज इलाके के दौरे के दौरान विधायक तुलजेराम के बापू से बडे ही जोर से गले मिला था.... अपनी शेखी बघारते हुए सबके सामने उसने कहा था ’’अब तो बकरा तैयार रखो ठाकर जी, आफ लडके की बदली का नोट मैंने वन मंत्री को भेज दिया है.... बस दो चार दिन में आर्डर आने वाले हैं। विधायक की बात सुनकर उसके बापू के तन बदन में आग-सी लग गई.... मगर अपने गुस्से पर काबू पाते हुए बस इतना ही कहा था ’आपकी बडी मेहरबानी ठाकर साहब.... आफ इस कजर् को मैं कैसे चुकाऊंगा?‘‘
....इस पर विधायक ने अकडते हुए कहा ’यह तो मेरा फर्ज था.... अपने इलाके के लोगों का काम नहीं करूंगा तो फिर किसका करूँगा?‘ हाँ ठगने के लिए तो अपने ही इलाके के भोले-भाले लोग हैं....‘ पास खडे तुलजे राम ने उसे टोकते हुए कहा ’जो अभी नौकरी भी नहीं लगा उसकी बदली करवा देते हो.... कब तक ठगोगे इन लोगों को, आखिर एक दिन तुमसे हिसाब मांगेंगे ये लोग।‘ तुलजे राम के इस अप्रत्याशी वार से एक पल के लिए वह बिदक गया। मगर विधायक की भी गैंडे से मोटी खाल थी.... उस पर तुलजे राम के व्यंग्य वाणों का असर नहीं हुआ था। अनजान बनने का नाटक करते हुए वह उसकी पीठ थपथपाने लगा-’अच्छा मैं तो समझा था कि तेरी नौकरी लग गई है.... खैर कोई बात नहीं आगे जो भी इंटरव्यू हो सीधे मेरे पास चले आना।‘
....लेकिन तुलजे राम ने तय कर लिया था। अब वह नौकरी के लिए विधायक के आगे गिडगिडाएगा नहीं और न ही अपने बापू को उस पाखंडी के आगे हाथ जोडने देगा। अब वह स्वयं अपने पैरों पर खडा होकर दिखाएगा.... जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीयेगा वह....। उसने प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना के माध्यम से लोन लेकर धारगलू पर दुकान खोल दी। ट्रक भर कर सामान लाया था वह.... कम मुनाफा रख वह सस्ते दामों पर चीजें बेचने लगा जिससे उसकी दुकानदारी चल पडी थी।
....अभी तुलजे राम घर के पास नहीं पहुंचा था कि तेज हवा के साथ बारिश शुरू हो गई। सामने की पहाडी पर बादलों के बीच बिजली का ’लश्कारा‘ हुआ जिसकी चमक से उसे  रास्ता  साफ  दिखाई  दिया। इसके साथ ही जोरदार धमाका हुआ.... जंगल में कहीं आसमानी बिजली गिरी थी.... तुलजे राम ने दौडते-भागते हुए घर तक की शेष दूरी तय की।
उस रात मानों कयामत आ गई थी। पानी ऐसे बरसा जैसे बादल का घडा फट पडा हो। घोर गर्जना के साथ आसमान में बिजली ऐसे चमकती मानों अंधेरे कोने में कैमरे की लाईट पडी हो। इसके साथ ही एक के बाद एक जोरदार ’कडाके‘ के साथ बिजली गिरने का धमाका होता.... जिससे तुलजे राम क्या पूरे गाँव की नींद उड जाती। क्या पता गाँव के किसी घर पर ’बीज‘ गिरी तो अनर्थ हो जाएगा। गाँव के बडे-बूढे गुडगुडाते हुए सोच रहे थे। अब इस आपदा से देवता ही रक्षा करें।
मगर  जिस  बात  की लोगों को आशंका थी वह आधी रात को हो ही गई....! गाँव के बीच भारी गर्जना के साथ लपलपाती कोई चीज गिरी जिसके धमाके से गाँव के ’काठकुणी‘ शैली के पहाडी मकान झनझना उठे। सारे गांव में कोहराम मच गया.... ’बीज‘ गाँव वाले अक्सर आसमानी बिजली के गिरने को बीज गिरना ही कहते हैं।
....देवता के मंदिर के पास खडा ध्वज टूट गया था। ध्वज का टूटना गांव के लिए अपशकुन था। वैसे  तो रात के अंधेरे में आए इस तेज अंधड ने काफी कहर बरपाया था.... देवगढ में वर्षों बाद ऐसा तूफान आया था.... रात भर तेज हवाओं के साथ हुई मूसलाधार बारिश से कई पेड गिरे तो टीन व स्लेट के पुराने छप्पर भी उड गए.... घोर गर्जना के साथ एक के बाद एक कई बार आसमानी बिजली गिरी। इस कयामत भरी रात में डरे सहमे गाँव वालों के पास सुबह होने का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
तुलजे राम ने घर के चबारे से बाहर झांक कर देखा तो देवता के मंदिर के साथ खडा देवदार का पच्चीस-तीस फुट ऊँचा खंबानुमा ध्वज टूट कर धरती पर बिखरा पडा था.... उसे समझते देर नहीं लगी कि अभी जो धमाका हुआ.... वह इसी का ही था। तुलजे राम जानता था कि इतनी ऊँचाई पर जंगलों के आस-पास बसे इस गाँव में आसमानी बिजली गिरना तो आम बात है। ऐसा कई बार हुआ है जंगल में देवदार के पेड को दो फाड कर देती है आसमानी बिजली....। तुलजे राम को याद है जंगल में भेडें चराने गई उसकी दादी हुकमू बारिश से  बचने के लिए पेड के नीचे खडी थी तो पेड पर बीज गिरने से उसकी मौत हो गई थी। जब वह छोटा था इस बारे में दादू कभी कभार उसे बताया करता था।
....अब वर्षों बाद गाँव में बिजली गिरी थी.... देवता के ध्वज का टूटना कोई मामूली बात नहीं थी....। यह आपमें गंभीर मसला था.... ध्वज का इस तरह अचानक टूटना अच्छा नहीं है.... देवता के भंडार में जमा हुए देवता के खास करींदे इस बात से चिंतित थे....। देवता का कारदार बुधे राम हुक्के की  गुडगुड के साथ लंबे कश खींचता और नाक व मुंह से   धुंए का ऐसा गुब्बार छोडता मानों चिमनी का मुंह खुला हो। वह पासा फेंक रहे भंडारी नीलमणि से कहता है ’देओ के जेठे मोहरे से लगा और एक बार फिर फेंक पासा.... शायद कोई तो जवाब मिले।‘ भंडारी ने कारदार के कहे अनुसार पासे को देवता के मोहरे के पास ले जाकर मन ही मन प्रार्थना की और मुट्ठी खोल कर पासा जमीन पर गिरा दिया.... चाल इस बार भी उल्टी पडी थी। सबके चेहरे अनजानी आशंका से सिकुड गए।
....बीती रात के अंधड से गाँव में काफी नुकसान हुआ था.... मगर इसकी चिंता किसी को नहीं थी.... चिंता थी तो बस देवता के ध्वज के टूटनेकी.... वैसे भी यह कोई मामूली ध्वज नहीं था। बल्कि देवता की शक्ति का प्रतीक था। इसके खडे रहने से ही तो देवता की सत्ता कायम रहती है.... अब यह गिर गया है तो देवता शक्तिविहीन हो गया है....।
बुधे राम कारदार थोडा चिंतित स्वर में बोला ’पचास साल  पहले  गाडा  गया था यह ध्वज.... इसके लिए खास विधि-विधान करना पडता है।‘ उसकी बात का समर्थन करते हुए भंडारी नीलमणी ने कहा ’जब तक यह ध्वज खडा था गाँव के सब लोगों पर देवता की शक्ति का साया था.... अब वह साया उठ गया है।‘ लोहे के सांकल को देवता के रथ की ओर सरकाते हुए जालपू गूर ने कहा ’सुबह से धंग्यारे में धूप जला रहा हूँ पर मुझे ’खेल‘ ही नहीं आ रही.... देवता कोई जवाब नहीं दे रहा है.... देओ भी मानों गूंगा हो गया है....।‘
सबके मन में अब यही आशंका थी कि इस गाँव का अब कोई ’बेलीबारस‘ नहीं रहा है.... देवता भी लगता है शक्ति विहीन हो गया है। देव विमर्श में लगे कारिंदे चिंतित थे....।‘ शक्ति के बिना तो यह काठ का गुड्डा ही रह जाएगा‘ भंडारी नीलमणी ने वहाँ व्याप्त सन्नाटे को तोडते हुए कहा ’इसका कुछ तो परिहार होगा.... जिससे देवता का शत फिर वापस लौट आए....?’ ’हाँ एक ही उपाय है इस गिरे हुए ध्वज की जगह दूसरा ध्वज गाडना पडेगा....‘ कारदार बुधे राम अपनी बात पूरी करता इससे पहले ही बीच में तुलजे राम बोल पडा ’’इसमें कौन सी बडी बात है सब लोग चलो जंगल से इससे भी बडा पेड काट लाते हैं.... गाड दो देवता के नाम का ध्वज और बना दो सर्वशक्तिमान....।‘ उसकी इस बात से सलाह कम व्यंग्य अधिक था।
’तू तो पढा लिखा मूर्ख है तुलजे राम....।‘ अब तक खामोश बैठे कठियाला नीमे राम ने गुस्से में कहा ’यह कोई मजाक की बात नहीं है.... गाँव पर संकट आया है इसका  निवारण करना जरूरी है। तुझे पता है देवता के बिना हमारी कोई पहचान नहीं है।‘ तुलजे राम तो मानों उसका मजाक उडाने के ही मूड में था। हंसता हुआ वह बोला ’तू ठीक कहता है चाचू देवता के बिना आप लोगों की कोई पूछ नहीं होगी.... ये जो सारा तंत्र तुम लोगों ने देवता के नाम पर रच  रखा है.... वो भला इसके बिना फिर कैसे रचोगे....? ’’क्या बक रहा है तुलजे राम.... हम देवता की चाकरी करते हैं.... कोई तंत्र नहीं रचते, जो देव-परंपराएँ हैं हम सब उन्हें ही निभाते हैं।‘ अबकी बार कारदार बुधे राम ने तुलजे राम को टोका था। मगर तुलजे राम भी हार मानने वाला नहीं था। वह उनकी हर दलील को अपने तर्कों से काटता जा रहा था। कारदार की बात का उत्तर देते हुए उसने कहा ’देव परंपरा.... कौन सी देव परंपरा की बात करते हैं आप लोग ? देवता को देवता ही कब रहने दिया है आप लोगों ने....?‘ तुलजे राम ने गुस्से में कहा ’आपने तो देव परंपरा के नाम पर भोले-भाले लोगों की आस्था का मजाक  उडाया  है....  रूढयों और अंधविश्वास को बढाया है.... दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है और आप लोग बस यहीं पर ही अटके हैं‘ गूर ने आवेश में आते हुए कहा ’’देख तुलजे राम इससे ज्यादा और कुछ मत कहना, यह परंपराएं कोई आज की नहीं बनी हैं.... पूरा समाज जुडा हुआ है इनसे।‘ उसकी बात का सभी ने समर्थन करते हुए समवेत स्वर में  कहा ’’जिस समाज में रहना उसके अनुसार ही ढलना पडता है.... यहाँ एक आदमी की मर्जी नहीं चलेगी।‘‘
देवता के कारिंदों और तुलजे राम के बीच तर्क देर तक जारी रहा। तुलजे राम चाहता था कि इस प्राकृतिक आपदा से जो नुकसान हुआ है.... उसके बारे में बातचीत कर एक दूसरे की मदद करें मगर यहाँ तो बात बिजली के खंभे की तरह पच्चीस फुट लंबे ध्वज पर आकर अटक गई थी। आखिर उसे भी तो इन्हीं लोगों के बीच रहना था.... उसकी  दुकान भी उन्हीं के सिर पर चल रही थी....! वह चुप हो गया मगर उसने मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की इरादा कर लिया था.... बस इसके लिए वह सही समय के इंतजार में था। माहौल को सामान्य करने की गरज से युवक मंडल के प्रधान महादेव ने कहा ’अच्छा यह तो बताओ अब आगे क्या करना है? इस समस्या का कोई तो समाधान होगा।‘‘
-’अब काहिका ही आखिरी समाधान है.... सबको अपने पापों के प्रायश्चित के लिए छिदरा करवानी होगी.... इसके बिना देवता की शक्ति नहीं लौट सकती....। कारदार बुधे राम ने जैसे निर्णायक स्वर में अपना फैसला सुनाया।
’’काहिका.... छिदरा....?‘‘ एक साथ सबके मुंह से निकला।
’’हाँ.... काहिका।‘‘ कारदार ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा-’नड को बुलाकर सारी ’कारी‘ करनी पडेगी.... ध्वज गाडने के अलावा सब लोगों को ’’छिदरा‘‘ करवानी पडेगी.... पच्चास साल पहले भी ऐसा ही हुआ था.... तब मैं छोटा था.... चार दिन तक गांव में कारज चलेगा.... बाहर से आने वाला हर आदमी गाँव का मेहमान होगा.... उसके खाने-पीने की व्यवस्था देवता की ओर से होगी....।
’’तब तो राशन भी बहुत लगेगा।‘‘ तुलजे राम ने उत्सुकता से पूछा ’’हाँ.... आटे-चावल की कई बोरियां लगेगी, तू अभी से इंतजाम कर ले सारा सामान तेरी ही दुकान से लिया जाएगा।‘‘ कठयाले ने कहा ’....पर एक बात ध्यान में रख देवता के कारज में कोई विघन्न मत डालना।‘
-’जब आप सब लोग कहते हैं तो मुझे भी क्या पडी है।‘ तुलजे राम ने काहिका उत्सव के लिए अपनी सहमति जताते हुए कहा-’कितना राशन चाहिए समय पर बता देना मुझे भी बाजार से गाडी में सामान लाना पडेगा।‘
देवता को शक्ति संपन्न करने वाले इस उत्सव की तैयारी में गाँव का हर आदमी जुट गया था.... सबसे पहले पैसों का जुगाड करना था.... मंहगाई का जमाना है लाखों रुपये लगेंगे.... मगर लोगों ने देवता के नाम पर दिल खोलकर दान दिया। दूसरी हारी के लोगों ने भी इस पुनीत कार्य में अपनी ओर से अंशदान भेजना शुरू कर दिया।
....तुलजे राम हैरान था। अचानक लोग इतने दानवीर कैसे हो गए ? कल तक जो लोग स्कूल और रास्ते के नाम पर दमडी निकालने को राजी नहीं थे.... स्कूल का छप्पर ठीक करवाने के लिए वह लोगों के घर पर भी गया.... मगर किसी ने फूटी कौडी की मदद नहीं दी। उल्टे लगों की बातें सुनने को मिली.... सरकार क्या मर गई है.... अगर छप्पर भी लोगों को ही ठीक करवाने पडे तो क्यों खोल रखे हैं स्कूल। मगर अब देवता के नाम पर तो चंदा देने वालों की होड लग गई थी.... पन्द्रह दिन में ही ढाई लाख रुपये जमा हो गये थे। देवता के भंडार में हुई बैठक में यह हिसाब लगाया गया था.... अभी और पैसों की जरूरत है‘ भंडारी ने हिसाब लगाते हुए कहा-’पाँच लाख के करीब खर्चा होगा इसमें। खीमे राम ने सुझाव दिया-’अगर सब लोगों को मंजूर हो तो एक तरकीब है मेरे पास‘‘
’’हाँ.... हाँ.... बोले‘‘ सबने सहमति दे दी।
खीमें राम ने भूमिका बांधते हुए कहा-’’देवता की कृपा से पैसा तो और भी आ जाएगा।.... पर मेरा सुझाव है कि देवता की सराय के लिए दो लाख की घोषणा ठाकर साहब ने की है, वह पैसा ब्लॉक में आ गया है.... क्यों न उस पैसे को भी इसमें लगा दिया जाए ? सराय तो लोगों ने बना ही दी है... बस इसको थोडा रंग रोगन कर देंगे और ठाकर साहब से उद्घाटन भी करवा देंगे।‘
उसकी बात पर सब लोग एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। युवक मंडल के प्रधान हरदेव ने कहा-’’सुझाव तो ठीक है पर सरकारी पैसे को इस तरह कैसे खर्च कर सकते हैं?‘‘
’’वो सब तुम मेरे पर छोड दो.... मैंने इस बारे में ठाकर साहब से बात कर रखी है.... उन्होंने बीडीओ को सारी बात समझा दी है.... बस काहिका वाले दिन सराय का उद्घाटन करवाना पडेगा।‘
....आखिर उत्सव का &#