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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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केशव तिवारी की कविताएँ
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यह समय है पहचान खोने का

मेरे गाँव के गडरियों के पास
अब भेड नहीं हैं
नानी कती थीं कि
नई बहुरिया बिना गहने के और
’चुँगल‘ बिना चुगली के भी रह सकते हैं
पर गडरिये बिना भेडों के नहीं
ऐसा नहीं है दुनया भर में अब
भेडें नहीं हैं। नहीं हैं तो
मेरे गाँव के गडरियों के पास
अब भेड नहीं हैं
नहीं है बूढी हुनरमंद उँगलियों के लिए ऊन
जिनके ऊपर पूरे गाँव की जडावर का
जम्मा था
ऐसा भी नहीं कि अब इस हुनर की
जरूरत नहीं है, नहीं है तो अब
इनके हुनर की जरूरत नहीं है
अपनी सदियों पुरानी पहचान आज
खो चुके ये लोग अब
किस नई पहचान के साथ जियेंगे
यह समय ही
पहचान खोने और एक
अजनबीपन में जीने का है
पर ऐसा भी तो हुआ है
जब अपनी पहचान को
उठी हैं कौमें तो
दुनिया को बदलना ही पडा है
अपना खेल।


ईसुरी

बसंत आ गया है महाकवि
एक बार फिर
तुम्हारी बुन्देली धरती के
सरसों के पीले फूल
और उसकी मादक गंध से
लहस लहस जाने का
समय आ गया है
तुम्हारी ही बोली में आई नगन नगन पियराई
यह सत्य है अब महीनों पहले से
नहीं सजती हैं फडें
और अब वे फागों के आचार्य भी कहाँ
पर ऐसा भी क्या कि
तुम्हारी चौकडयों और
फागों के बिना बीत जाये बसंत
आज भी जब युवा फगुहार गाता है
पटियाँ कौन सुघर ने पारी
तो नवयौवनाओं के चेहरे
कनेर के फूलों से सुर्ख हो उठते हैं
और रजऊ का दर्द तो
अब भी फाँस की तरह चुभता है
युवाओं के सीने में
बसंत आ गया है महाकवि
एक बार फिर तुम्हारी धरती का
तुम्हारे नाम से धन्य होने का
समय आ गया है
बसंत आ गया है महाकवि।


जब सबकुछ बदल रहा है

जब सब कुछ हर क्षण बदल रहा है
मैं तुमसे कभी न बदलने की बात कह रहा हूँ
यह बात मैं समय के विरुद्ध कह रहा हूँ
यह सोचकर कि हर बात समय
के हाथ में देकर
अक्सर हम अपनी निरीहता का गान
करते हैं और उसके पीछे छिपी
हमारी कायरता रह रह कर झाँकती है
कितने कितने खूबसूरत नाम दे रखे हैं
हमने अपनी कायरता को
जिसके मोह में कभी-कभी
बाज भी फँस जाते हैं
ये जानकर हमारे लिये
कुछ भी छिपाना सम्भव नहीं
फिर भी हम लगातार एक कोशिश करते हैं
उन तीव्र अनुभूतियों के ख्ालाफ
जो हर बात केा भेद कर
सच तक जा पहुँचती हैं
मुझे ये अक्सर लगता है कि हर मौसम
उसका हर रंग तुममें आकर समा गया है
जिसको मैं तुम्हारे बदलते चेहरे के
रंगों में देख लेता हूँ।
तुम्हारे उदास चेहरे के साथ हर रंग
बदरंग हो उठता है
और खुश देख कर तुमको
जेठ की कडी धूप में भी
खिल-खिल उठते हैं रातरानी के फूल
हाँ जब सबकुछ हर क्षण बदल रहा है
मैं तुमसे एक बार फिर कभी न बदलने की बात
कर रहा हूँ।


अच्छा हुआ

अच्छा हुआ कभी भी
इतना ऊँचा न हुआ मेरा माथ
कि टकराता किसी पहाड से
इतना नीचा भी नहीं कि
झुक झुक जाता जगह-जगह पर
अच्छा हुआ कभी भी
इतना सुन्दर न हुआ मैं
कि ढलती काया देख देख
दुखी होता
यह ठीक ही रहा तुमने
मनुष्य मानकर किया स्नेह
और मैं देवताओं के गुनाहों से
बच गया।



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