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१८२४ में ही बन गया था अंग्रेजी सरकार के लिए ताबूत
मनोहर चमोली ’मनु‘

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भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने के लिए स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत १८५७ से मानी जाती है। लेकिन रुडकी क्षेत्र में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह १८२४ में शुरू हो गया था। इस विद्रोह से बौखलाये सहारनपुर के तत्कालीन मजिस्ट्रेट बिन्डाल को गोरखा सैनिकों की फौज बुलानी पडी। कैप्टन यंग के नेतृत्व में २०० सैनिकों ने भारतीय रणबांकुरों पर नियोजित हमला किया। रुडकी के विकास खण्ड भगवानपुर की न्यायपंचायत चुडयाला का गाँव कुंजा बहादरपुर ऐतिहासिक दृष्टि से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध १८२४ में हुए गुर्जर विद्रोह के रूप में प्रसिद्ध है।
१८२४ में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ समूचे सहारनपुर क्षेत्र में (उस समय रुडकी तहसील उत्तर प्रदेश के मेरठ मंडल के जनपद सहारनपुर का हिस्सा थी ) बडे पैमाने पर बगावत हुई थी। रुडकी के कितने रणबांकुरों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था, यह कहना मुश्किल है लेकिन एच.जी. वाटसन कृत देहरादून के गजेटियर में अंग्रेजी सेना से हुई भिडंत में शहीद १५२ भारतीयों के होने का उल्लेख है।
१८२४ के विद्रोह के दो मुखिया थे। गुर्जर बिजा सिंह ’बिज्जा‘ कुंजा के ताल्लुकेदार थे। बिजा सिंह लंढौरा के राजा रामदयाल के सम्बन्धी थे। कलुवा गुर्जर भी इसी क्षेत्र का निवासी था। इन दोनों ने सबसे पहले गुर्जरों को संगठित किया। शुरू में यह संगठित दल लाठियों-पत्थरों से ही अंग्रेजों से भिड जाते थे। धीरे-धीरे लूट-पाट कर इन्होंने सशस्त्र सैनिक दल का गठन कर लिया।
कलुवा और बिजा सिंह के कस्से आज भी प्रसिद्ध हैं। अंग्रेजों ने दोनों के आतंक से इन्हें डाकू करार दे दिया। कलुवा गुर्जर कुमाऊँ और गढवाल क्षेत्र में अंग्रेज समर्थकों से भिड पडता। गंगा के दोनों ओर कलुवा के दल ने अंग्रेजी सरकार की नाम में दम कर दिया। कलुवा ने देहरादून और शिवालिक पहाडी क्षेत्र में भी अंग्रेजों को आतंकित कर दिया था।
देहरादून के नवादा क्षेत्र में भी कलुवा ने लूट-पाट की। ३० मई १८२४ को कलुवा ने रायपुर पर हमला बोल दिया। मजिस्ट्रेट शोरी को ’सिरमौर बटालियन‘ बुलानी पडी। कलुवा-दल हमला कर लूटपाट करता और जंगल में छिप जाता।
’सिरमौर बटालियन‘ के असफल हो जाने के बाद ’गोरखा सैनिकों‘ को बुलाया गया। लेकिन कलुवा नहीं पकडा जा सका। अंग्रेज अधिकारियों ने फिर गुर्जरों और रांगडों को तंग करना शुरू कर दिया।
मजिस्ट्रेट शौरी ने गुप्त रूप से पता लगा लिया था कि कलुवा को सबसे अधिक सहयोग कुंजा बहादरपुर (आज का भगवानपुर क्षेत्र रुडकी) से मिल रहा है। यही नहीं मेरठ से मुरादाबाद तक के गुर्जर समुदाय के भारतीय भी शडयन्त्र में शामिल हैं। फिर क्या था, अंग्रेजी सरकार का ताण्डव शुरू हुआ। अंग्रेजी सेना ने गुर्जर और रांगड बाहुल्य गाँवों में आग लगानी शुरू कर दी। लोगों को घरों में घुसकर पीटना शुरू कर दिया।
कलुवा और बिजा सिंह ने पलटवार किया। उन्होंने सहारनपुर, ज्वालापुर, करतारपुर, भगवानपुर में हमले शुरू कर दिये। करतारपुर की पुलिस चौकी लूट ली। भगवानपुर बैरक पर हमला कर उसपर कब्जा कर लिया। ज्वालापुर तहसील से आ रहे सरकारी ख्ाजाने को लूट लिया। १ अक्तूबर १८२४ को २०० सिपाही सहारनपुर ख्ाजाना लेकर जा रहे थे। भगवानपुर के निकट कलुवा के दल ने ख्ाजाना लूट लिया। कलुवा कल्याण सिंह के नाम से मशहूर हो गया।
कलुवा का एक ही मकसद था। लूटपाट कर सेना संगठित करना और बन्दियों का रिहा कराना।  कलुवा ने सहारनपुर नगर पर हमला करने की योजना बनाई। सिकन्दरपुर, कुंजा बहादरपुर को अंग्रेज सैनिकों ने घेर लिया। सहारनपुर के मजिस्ट्रेट बिन्डाल कैप्टन यंग को लेकर सिकन्दरपुर पहुँचे। ३ अक्टूबर १८२४ को आमने-सामने भिडन्त हुई। कलुवा शहीद हो गया। उसके बाद बिजा सिंह अपने १५२ साथियों के साथ अंग्रेजों से भिड गये। कई भारतीयों को बन्दी बना लिया गया। बिजा सिंह भी शहीद हो गया।
दो युवा क्रान्तिकारी क्वार और भूरा ने नेतृत्व संभाला। मई १८२५ तक इन दोनों ने भी अंग्रेजों के दांत खट्टे  किये।  समूचे क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध माहौल बना। धीरे-धीरे १८५७ के स्वाधीनता संग्राम के लिए यहाँ पौध तैयार हुई। १८२४ का गुर्जर विद्रोह दबा तो दिया गया लेकिन यही विद्रोह अंग्रेजी सरकार के ताबूत की पहली कील बना। ’नोविल ःसहारनपुर-ए गजेटियर‘ और ’देहरादून-ए-गजेटियर‘ में यहाँ के गुर्जर विद्रोह का उल्लेख मिलता है।



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