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१८५७, मिजार् गालिब और भारतेन्दु
निर्मल शर्मा

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१ नवम्बर, १८५८ को एक उद्घोषणा महारानी विक्टोरिया की ओर से सामने आयी भारत का प्रशासन अब कंपनी द्वारा नहीं, वरन् क्राउन द्वारा संचालित होगा। इसी घोषणा में यह खुलासा भी कर दिया गया था कि जिन सामंतों ने सीधे-सीधे ब्रिटिशर्स की हत्या (नरसंहार) का अपराध किया है, उन्हें छोडकर बाकी सामंतों को आम माफी दे दी जाएगी। यही नहीं, नयी रेजीम उनकी संपत्ति तथा उनके सम्मान की भी रक्षा का भरोसा दिलाती है।
अंधा क्या चाहे-दो आँखें ! भारतीय सामंतों ने इस उद्घोषणा का तहेदिल से स्वागत किया। ब्रिटिश शासकों ने पूरे सामंत-जमींदार वर्ग के साथ मित्रता और सहयोग का रास्ता अपनाया। उन्हें अपने शासन का आधार बनाना आरंभ किया। १८६२ में पटियाला के महाराजा और बनारस के राजा को बडे लाट की विधान-परिषद् में नामजद किया गया। यह जुगलबंदी खूब फूली-फली। इसका कारण था-सामंतों के प्रति बरतानी नीति में मौलिक परिवर्तन।
मौलिक परिवर्तन, कंपनी राज की जगह महारानी विक्टोरिया का राज न था। वह तो बाह्य परिवर्तन मात्र था। १८५७ के महाविद्रोह के पहले ब्रिटिश शासकों की नीति आमतौर पर सामंत व सरदारों/जमींदारों के विरुद्ध थी। १८५९ के बाद इस नीति में बदलाव यह हुआ कि वे ब्रिटिश शासन के आधार बन गये। नवोत्पन्न पूँजीपति वर्ग और भारतीय जनता के विरुद्ध लडने के लिए ब्रिटिशर्स उनका इस्तेमाल करने लगे। अब ब्रिटिशर्स ने देशी रियासतों को बनाये रखने की नीति अपनाई। प्रशासन में शामिल करने का दिखावा भी किया और कई प्रतिक्रियावादी कदम भी उठाए। जॉन ब्राइट ने ’भारत में अपराधों के सौ वर्ष‘ कहकर जिस कंपनी सरकार को नवाजा था-उसका अंत हो गया था और अब विक्टोरिया के राज में सुख-सौभाग्य की वर्षा होने की चर्चा होने लगी। कवियों के कंठ से प्रशस्तियाँ फूट पडीं और जनता ने स्वयं को महारानी विक्टोरिया की अधीनता में ही सुखी मान लिया। ’विद्रोह से पहले के कंपनी राज की तुलना में, लोगों ने महारानी विक्टोरिया के शासन को एक भिन्न वस्तु माना और वे समझे कि उन्हें सभी प्रकार की स्वतंत्रता इस शासन में सुलभ होगी।....परन्तु यह तंद्रा बहुत काल तक न रही-शीघ्र ही अकाल, महामारी, टैक्स, बेकारी आदि साम्राज्यवाद की विभूतियों ने उन्हें जगा दिया।
१८५७ की विफलता के साथ ही अंतिम मुगल का रंगून में इन्तकाल हो गया। भारी वित्तीय अराजकता फैल गयी। आम सांस्कृतिक पतन जरूर हुआ, किन्तु इसके समानान्तर नयी शिक्षा,  संस्कृति  और  उत्पादन  के संबंधों के परिणामस्वरूप जीवन शैली में भी परिवर्तन लक्षित होने लगे थे। कला में बदलाव आने लगा। गद्य  का विकास हुआ। साहित्य में लोक-तत्त्व प्रबल हो उठा। मध्ययुग के कलारूपों में परिवर्तन हुए। भारतीय भाषाओं में सामयिक विधा, पत्र-संग्रह, पत्रकारिता; का प्रस्फुटन हो चला। तथापि ये मात्र ब्रिटिश साहित्य की नकल न होकर, तत्कालीन जन्दगी से आने लगे थे। मिल्टन, शेली, बाइरन, पुश्किन पढे जाने लगे। उनसे प्रेरणा ली जाने लगी। वाल्तेयर, रूसो, मेजनी के विचारों ने भारतीयों को उकसाया। राष्ट्रवाद तथा राष्ट्रीयता के विचार प्रबल हुए। राजा राममोहन राय (१७७४ से १८३३) भारत में राष्ट्रवाद के जनक कहलाये। श्री विपिनचन्द्र पाल भारत में नवीन राष्ट्रवाद का जन्मकाल १८७५-७८ मानते हैं। राष्ट्रीय विचारों का विकास और राष्ट्रीय आन्दोलन का आरंभ १८७० के बाद ही हुआ माना जाता है।

उर्दू साहित्य में अन्य भाषाओं की तरह राष्ट्रीय भावना १८७० के बाद ही आयी। मुहम्मद हुसैन आजाद और ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली और नजीर प्रमुख नाम हैं। हाली की यात्रा मुसलमानों की तबाही के मर्सिये से शुरू होकर देशभक्ति तक पहुँची थी। किन्तु मुहम्मद हुसैन आजाद ने शुरू से ही देशभक्ति की चेतना को अपनी शायरी का विषय बनाया था। नजीर जनाभिमुख थे।
अपने जमाने के मशहूर शायर मिर्जा असदउल्लाह ख्ााँ ’गालिब‘ (१७९७-१८६९) ने अपनी आँखों से १८५७ के दौरान् अपने महबूब शहर दिल्ली को उजडते हुए देखा था। यही नहीं अपने भाई और अनेक मित्रों को इस महाविद्रोह की भेंट चढते हुए भी देखा था। शहंशाह बहादुरशाह जफर को परदेस में मौत मिली। इस सबका कारण वे १८५७ को मानते थे। शायद इसीलिए उन्हें १८५७ से वितृष्णा हो गयी थी। वे अंग्रेज हुक्मरानों के कायल थे और महारानी विक्टोरिया के प्रति मुतमईन कि वे दानी और ज्ञानी हैं, जरूर न्याय करेंगी। वे, पश्चिमी उपनिवेशवादियों द्वारा देश के वित्तीय शोषण के महत्त्व को शायद इसी कारण समझ नहीं सके थे। कुर्रतुल ऐन हैदर स्वीकार करती हैं कि उनके  लेखन में इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। वे महारानी तथा अंग्रेजों के प्रति मोहासक्त भी थे। शिक्षाविद् सर सैयद अहमद खान ने एक बार जब उनसे ’आईन-ए-अकबरी‘ पर अपनी प्रतिक्रिया लिखने का अनुरोध किया, तो उल्टे उन्होंने सर सैयद अहमद को ही ब्रिटिशर्स की उपलब्धियों का बखान कर डाला। मिजार् गालिब १८५७ में होते हुए भी कहीं नजर नहीं आये और आये भी तो....
१० मई, १८५७। मेरठ से हुआ महाविद्रोह का शंखनाद। ८ अप्रैल, १८५७ को हुई मंगल पाण्डेय की फाँसी से उत्पन्न सैन्य असंतोष को हवा दी चर्बी युक्त कारतूस ने और विद्रोह फैल गया। मेरठ से दिल्ली दूर नहीं थी, सो अगले दिन ११ मई, १८५७ को ’चलो दिल्ली‘ का आह्वान हो गया। विद्रोही दिल्ली पर चढ बैठे। अफरा-तफरी मच गयी। लूट, हत्या, आगजनी, अराजकता-क्या कुछ नहीं हुआ। हालाँकि, इसी दौरान विद्रोहियों ने अंतिम मुगल बहादुर शाह (द्वितीय) को अपना शहंशाह भी नियुक्त किया। नेतृत्व की सारी बागडोर उन्हें सौंप दी गयी। वे परिवर्तन के रहनुमा बन गये, जिनके दरबार में मिर्जा गालिब का न केवल आना जाना था, बल्कि वे बहादुरशाह जफर के उस्ताद भी थे। लेकिन विद्रोही सिपाहियों द्वारा दिल्ली की बर्बादी गालिब सहन नही कर सके। उन्होंने लिखा-
’’वास्तव में सोमवार का वह दिन बडा ही भयानक था, जब ११ रमजान, १२७३ हिजरी को जो कि अंग्रेजी केलेण्डर के हिसाब से भी ११ मई, सन् १८५७ का दिन था, सहसा दिल्ली के दरो-दीवार इस प्रकार हिलने लगे कि समूचे शहर में उनकी धमक सुनाई देने लगी। यह कोई भूचाल न था बल्कि मेरठ के बागी और नमकहराम सिपाही थे, जो उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन को अंग्रेजों के खून से अपनी प्यास बुझाने के लिए दिल्ली शहर में घुस आये थे। यह आश्चर्य की बात न होगी, अगर कहा जाए; कि दिल्ली दरवाजों से संतरी, जो कि पेशे में उन खूनी लुटेरों के साथी थे, वे भी इस शडयंत्र में बराबर के भागीदार थे।
’’शहर की रखवाली की जम्मेदारी को भूलकर, खाये हुए नमक को नकार कर, संतरियों ने द्वार खोल दिये और बागयों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से आमंत्रित किया। फुर्तीले घुडसवारों और पैदल शस्त्रधारियों की बागी सेना ने, ज्यों ही दरबानों को मित्र और दरवाजों को खुला पाया, समूचे शहर को पागलों की भाँति अपने पैरों से रौंद डाला। उन्होंने उस समय तक अंग्रेजों तथा उनके अफसरों का पीछा नहीं छोडा, जब तक कि उन्हें मौत के घाट उतार नहीं दिया और उनके डेरों को उजाड नहीं दिया।‘
....’’मैंने चीख्ाों और शोर-शराबे के बीच यह सुना कि लाल कले के सरदार और ब्रिटेन का एजेंट मौत के घाट उतार दिये गये। चारों ओर घोडों की टापों तथा सिपाहियों के पैरों की धमक सुनायी दे रही थी। जमीन पर एक मुट्ठी धूल भी न बच पायी थी, जो फूल जैसे बदन रखने वालों के खून से सन न गई हो और कोई बगीचा बाकी न था, जो कब्रिस्तान में बदल न गया हो। अफसोस होता है उन न्यायकारी, बुद्धिमान, सज्जन और विख्यात अंग्रेज अफसरों की हत्या पर! दुख होता है उन रूपवती, कोमल चन्द्रमुखी और चाँदी जैसे बदन वाली अंग्रेज महिलाओं की मृत्यु पर ! उदास हो जाता है मन उन अंग्रेज बालकों के असामयिक अन्त पर, जो अभी संसार को भलीभाँति देख भी नहीं पाये थे। स्वयं वे फूलों की भाँति थे और फूलों को देखकर हँस पडते थे। उनकी चाल को देखकर हिरन चलना सीखते थे....कि जिन्हें सहसा रक्त के भँवर में डाल दिया गया। अंगारे उगलने वाली मौत भी इन महान व्यक्तियों के शोक में काले कपडे पहने, तो गलत  न  होगा।  अगर  आसमान टूटकर धरती पर गिर पडे और धरती पर बवंडर फैल जाए, तो भी इनकी मृत्यु का हिसाब चुकता न होगा।.... धीरे-धीरे दूर-दराज के शहरों से यह ख्ाबर आने लगी कि बागी सिपाहियों ने अपने अफसरों की हत्या कर दी है और खुलेआम अपने अफसरों की हत्या करने के लिए बैरक से निकल पडे हैं। पूरे मुल्क में नमक हराम जमींदारों और सिपाहियों ने आपस में गठबंधन कर लिया ताकि पूरी ताकत के साथ सरकार के विरुद्ध मोर्चा ले सकें। केवल खून की नदी ही उन्हें संतुष्ट कर सकती है।
’’बिना राजा के शहर, बिना मालिक के नौकर, बिना माली के बाग....जैसे पेडों के झुरमुट तो हों बाग में, पर उनमें फूल न हों। लुटेरे हर तरह से आजाद हैं। व्यापारियों ने टेक्स देना बन्द कर दिया है। बस्तियाँ वीराने में बदल चुकी हैं और घरों में बेनाम शरणार्थी घुसकर उन्हें लूटपाट की जगह समझ बैठे हैं।.... डाक का काम ठप हो गया है, क्योंकि शस्त्रों का सिलसिला कट गया है। डाकियों के लिए आना-जाना मुश्किल हो गया है। अब तो न पत्र भेजे जा सकते हैं और न ही पाये जा सकते हैं। बहरहाल, टेलिग्राम से, जो वायर के बजाय वाइब्रेशन से चलता है, संदेश भेजे और पाये जा सकते हैं।
’’सिपाहियों ने तोपख्ााने से बन्दूकें निकाल ली हैं और शहर के ऊँचे स्थानों पर आकर मुहाना साध लिया है। वास्तव में, बागी सिपाहियों और अंग्रेजों के बीच सीधा मुकाबला हो रहा है। तोपों और बन्दूकों का धुँआं देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो काले बादल आसमान में लटक रहे हों और पत्थरों की वर्षा हो रही हो। सारा दिन तोपों की आवाजें सुनायी दे रही हैं।
’’दुश्मन की फौजें भारत के कोने-कोने से एकत्र हो रही थीं। चूँकि बादशाह स्वयं इंकलाबी था, इसलिए बडे-बडे सरदार, जो दूर-दूर के प्रांतों से आये हुए थे, सब के सब इंकलाबियों से आकर मिल गये। फर्रूख्ााबाद के एक बडे घराने का अमीर, तफज्जुल हुसैन, जिसने पहले कभी बादशाह से हाथ मिलाने की चेष्टा न की थी, वह भी बादशाह से एक अच्छे मित्र और सहयोगी की भाँति (पिछली बातों को भुलाकर) आ मिला और उन्हें अपने कृपापात्र होने का यकीन दिलाया।‘ ख्ाान बहादुर ख्ाान एक बहका हुआ अमीर, सत्ता की तलाश में कुछ सिपाहियों को बरेली से अपने साथ लेकर बादशाह के समक्ष उपस्थित हुआ और बादशाह को एक सौ सोने के सिक्के भेंट किये। इसके अतिरिक्त उसने बादशाह को कुछ हाथी-घोडे भी चाँदी की जीनों के साथ भेंट किये। बुरी नजर रखने वाले का नाश हो।‘‘ (पुस्तक ’दस्तम्बू‘ से उद्धृत। संपादन अब्दुल बिस्मिल्लाह का है )
सूरते हाल उनके महबूब शहर दिल्ली का हो चला था। चारों ओर सियापा पडा हुआ था। अब गदर, बलवा, जन-विप्लव अथवा महाविद्रोह की स्थिति में बर्बादी तो दोनों ही तरफ से होना थी और हुई। मिर्जा गालिब मूलतः शायर थे। एक भावुक इंसान। लिहाजा ’दस्तम्बू‘ में व्यक्त ये सारी प्रतिक्रियाएँ मर्सिये अथवा शोकगीत से अधिक मायने नहीं रखतीं। यह अफसोस, उन्हीं भावनाओं की अभिव्यक्ति कर रहा है। दिल्ली, महारानी और अंग्रेज हुक्मरानों के प्रति गालिब साहब का यह इश्क, यह मोहब्बत जाहिर सी बात है कि बिना ’आग के दरिया‘ से गुजरे किसी भी हालत में पायी नहीं जा सकता था।
११ मई, १८५७ को विद्रोहियों द्वारा बनायी गयी दिल्ली की दुर्दशा पर हम गालिब साहब के रंज और अफसोस से रूबरू हो चुके। १४ सितम्बर, १८५७ को दृश्य बदला। चार माह चार दिन में सूरत बदली, बाजी पलटी। पुनः अंग्रेज दिल्ली पर काबिज हुए। विद्रोहियों को खदेड दिया गया। तब गालिब साहब की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह ’दस्तम्बू‘ में पढने को मिलती है-’’ग्यारह मई से चौदह सितम्बर तक चार महीने और चार दिन होते हैं। सोमवार को दिल्ली पर बागयों का कब्जा हुआ था और सोमवार को ही उनसे दिल्ली को खाली करा लिया गया। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि शहर का छीना जाना और उस पर दुबारा अधिकार पाना एक ही दिन की बात है। संक्षेप में यह कि विजयी अंग्रेजों ने दुश्मन बागयों को, जहाँ कहीं रास्ते में पाया, जान से मार डाला।‘‘ गो कि, यह तो पुण्य का काम था। विद्रोही सिपाही और जमींदार, यदि मिलकर सौ साल पुराने गुलामी के जुए को उतार फेंकने के लिए मुक्ति की कामना से महाविद्रोह करते हैं, तो वे नमकहराम हो जाते हैं। जुआ उतार फेंकने की सारी कोशिशें शडयंत्र नजर आने लगती हैं। शहंशाह इंकलाबी नजर आने लगते हैं, और ख्ाान बहादुर खान तथा नवाब यूसुफअली ख्ाान बहादुर खुशामदिये लगने लगते हैं। किन्तु अंग्रेज ’विजयी‘ तथा ’विद्रोही दुश्मन‘ से नवाजे जाते हैं। या अल्लाह इस बूढे, भावुक व हारे हुए शायर को माफ कर ! ’दस्तम्बू‘ से ही कुछ और नजीरें देखिए, १४ सितम्बर, १८५७ को लेकर-....’क्रुद्ध शेरों ने जब नगर में घुसना शुरू किया, तो बहुत सारे कमजोर और बेसहारा लोगों को उन्होंने जान से मार दिया, उनके घर जला दिये। विजेताओं की विजय के समय तो ऐसा होता ही है।‘‘ वाह चचा, क्या जस्टीफकेशन है ! कुर्बान जाऊँ।
महारानी विक्टोरिया की शान में मिर्जा गालिब द्वारा एक कसीदा पेश किया गया था। सबब था....रोम, ईरान और अन्य देशों के राजाओं की भाँति, जिन्होंने अपने कवियों तथा शुभचिन्तकों के मुँह मोतियों से भर दिये थे, गर्दनों में सोने की माला पहना दी थी और जागीरें अथवा अन्य उपहार भेंट किये थे, दयालु महारानी भी प्रार्थी (अर्थात् गालिब) को ’मेहर ख्ाान‘ की उपाधि से और आभूषण से विभूषित करें। साथ में कुछ जीविकोपार्जन का साधन भी उपलब्ध कराएँ, जिसे अंग्रेजी में पेंशन कहते हैं। तो क्या सारा द्रविड प्राणायाम महज इसीलिए था ?
इन अन्तर्विरोधों व कमजोरियों के बावजूद मिर्जा गालिब उर्दू गद्य के जनक माने जाते हैं। उनकी शायरी उच्च कोटि की थी, है और रहेगी। मैंने ’दस्तम्बू‘ के जरिये महज इतना समझने की कोशिश की है कि इस ’अपराइजिंग १८५७-१८५९ को लेकर महामना क्या व किस तरह सोचते थे। जैसा व जितना मैं समझ पाया, आफ सामने रखने की कोशिश की है। यदि कोई नासमझी हुई हो, तो माफी बख्शें।


हिन्दी और उर्दू से भी उच्च कोटि का राष्ट्रीय साहित्य बंग्ला और मराठी में आया। ’राजभक्ति‘ कोई नयी अथवा अनोखी बात नहीं थी। प्रायः पायी जाती रही है। खुद गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी अतिशय विनम्र रहे हैं-महारानी विक्टोरिया तथा उनके शासन के प्रति। तथापि, देखना यह होगा कि ’राजभक्ति‘ के रहते हुए भी कोई व्यक्ति उस विपरीत वातावरण में देशभक्ति की बात कितनी और किस खूबी से कर सका है। क्योंकि, ऐसा कर पाना तब किसी चुनौती से कम नहीं था। बांग्ला में बंकिम, मराठी में चिपलूणकर, गुजराती में नर्मद, तमिल के भारती, हिन्दी के भारतेन्दु, उर्दू के हाली, आजाद, नजीर आदि ने उस चुनौती को बखूबी निभाया था।
भारतेन्दु  हरिश्चन्द्र  (१८५०-१८८४)  तो स्वयं एक मध्यकालीन दरबारी वातावरण में पले थे। उनका घर किसी दरबार से कम नहीं था। जिसके वे स्वयं बादशाह थे। उनके पिता बाबू गोपालचन्द्र सरकार के कृपा पात्र थे। जबकि भारतेन्दु न केवल हिन्दी में नवीन राष्ट्रीय चेतना लाने वाले एक साहित्यकार ही थे, वरन् वे स्वदेशी आंदोलन के अग्रदूत और प्रसिद्ध समाज-सुधारक भी थे।  अंग्रेजों  की माया तथा धन, बल और चालों को वे खूब समझते थे।
भारतेन्दु के साहित्य में ही नहीं, वरन् उस काल व मंडल पर ’लोक रंग‘ सवार था। लोक रूप यथा होली, कजली, आल्हा, पहेली, कवित्त, दोहे छन्द में साहित्य रचा जाता था। इस काल में नाटकों का खूब योगदान रहा। न केवल नाटक लिखे गये, वरन् अनुवाद भी हुए। भारतेन्दु तो स्वयं नाटक खेलते भी थे। उन्होंने अपने समय में गद्य की भाषा को परिमार्जित भी किया। उन्हें वर्तमान हिन्दी गद्य का प्रवर्तक भी माना गया है, जैसे मिर्जा गालिब को उर्दू गद्य का पुरोधा माना गया है। हमारे जीवन और साहित्य के बीच जो विच्छेद पड रहा था, उसे भारतेन्दु बाबू ने अपने मंडल के लेखकों के साथ मिलकर पाटने के संयुक्त प्रयास किये थे। उनके समय में कविवचन सुधा, हरिशचन्द्र मैगजीन, सारसुधा -निधि, हिन्दी प्रदीप, ब्राह्मण जैसी प्रबुद्ध पत्रिकाएँ भी अपना विनम्र योगदान साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा उसको लोकोन्मुख बनाने में करती रहीं। उनके नाटकों में भारत दुर्दशा, अंधेरनगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, नील देवी आदि ने न केवल उस जमाने में सत्ता के लिए मुसीबतें खडी कीं, बल्कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद, आपातकाल के दिनों में भी ’अंधेर नगरी‘ सरकार का सरदर्द बनी थी। इन रचनाओं की जीवंतता, लोक-तत्त्व, मारक अथवा प्रतिरोधी क्षमता ही उनकी प्रासंगिकता को आज भी बनाये हुए है। हम यहाँ कुछ चुनिंदा रचनाओं के जरिए अपनी बात कहने की कोशिश करेंगे।
महारानी विक्टोरिया के प्रति विश्वास प्रकट करते हुए भी भारतेन्दु बाबू कहने से नहीं चूकते। देश का धन विदेश जा रहा है, मंहगाई दुर्भिक्ष और महामारी का प्रकोप हर तरफ नजर आ रहा है, उस पर भी तरह-तरह के टैक्स लगाकर महारानी की सरकार भारत को तबाह करने से बाज नहीं आ रही। देखें एक ’आल्हा‘-
’संवत उनइस सौ तिरपन मा, पडा हिन्द में महा अकाल।
घर-घर फाके होने लगे, दर-दर प्रानी फिरैं बेहाल।।
गेहूँ चावल सावाँ मकरा, सबै अन्न एक भाव बिकाय।
बिन पैसा सब छाती पीटैं, अब तो हाय रहा नहिं जाय।।
कोई पात पेडन के चाबै, कोई माटी कोई घास चबाय।
कोई बेटवा बिटिया बेचै, अब तो भूख सही नहिं जाय।।
कोई घर-घर भीखौ माँगे, कोई लूट-पाट के खाय।।
बहुत लोग जो अन्न देत हैं, राम निहोरे करैं सबाब।
बहुत लोग देते हैं फाँसी, अरु मलिका से चहैं खिताब।
सी.एस.आई., के.एस.आई.,  राय बहादुर केर खिताब।।
इसी क्रम में एक ’होली‘ देखिए-
डफ बाज्यो भरत भिखारी को
केसर रंग गुलाल भूलि गयो,
कोउ पूछत नहिं पिचकारी को।
बिन धन अन्न लोग सब व्याकुल,
भई-कठिन विपत नर नारी को।
चहुँ दिसि काल पड्यो भारत में,
भय  उपज्यो  महामारी   को।
’भारत दुर्दशा‘ नाटक में भारतेन्दु बाबू ने अंग्रेजों (रानी विक्टोरिया) के राज को भारत दुर्दैव तथा राक्षस तक कह डाला है। ’भारत दुर्दैव‘ खुद को परिचित कराते हुए कहता हैः
मरी बुलाऊँ देस उजाडूँ, मंहगा करके अन्न।
सबके ऊपर टिकस लगाऊँ, धन है मुझको धन्न।
मुझे   तुम   सहज   न   जानो    जी,
मुझे   इक    राक्षस    मानो   जी।
नाटक का सार यह है कि ’भारत दुर्दशा‘ का कारण ’भारत दुर्दैव‘ ही है। उसके कामों से ही उसे आसानी से पहचाना जा सकता है कि इस राक्षस का वास्तविक नाम कुछ और नहीं ’अंग्रेजी राज‘ ही है।
’अंधेर नगरी‘ नाटक में चूरन वाले के लहजे में एक व्यंग्य-सीधा प्रहार-कुछ इस अंदाज में किया गया है-
चूरन अमले सब जो खावैं, दूनी रिश्वत तुरत पचावैं।
चूरन नाटक वाले खाते, इसकी नकल पचा कर लाते।।
चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते।
चूरन खाते लाला लोग, जिनके अकल अजीरन रोग।।
चूरन खावैं एडिटर जात, जिनके पेट पचै नहिं बात।
चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिन्द हजम कर जाता।।
चूरन पुलिस वाले खाते, सब कानून हजम कर जाते।
ले चूरन का ढेर, बेचा टके सेर।।
’अंधेर नगरी‘ में टके सेर भाजी, टके सेर खाजा है। पंडित मूर्ख सब एक ही भाव तोले जाते हैं। जन-साहित्य में यह एक आदर्श नाटक है। आपातकाल में भी इस नाटक का प्रसारण सत्ता का कोप-भाजन बन चुका है। यह क्या इसकी कम मारक क्षमता है कि हर तानाशाह उसे अपने पर हमला मानता है। अंगरेज, अंगरेजी, कानून, पुलिस आदि कई को भारतेन्दु बाबू ने हँसी-हँसी में पहेलियों के माध्यम से अपने तीक्ष्ण व्यंग्य का निशाना बनाया है। उनमें से कुछ पहेलियाँ देखिए ः
भीतर-भीतर सब रस चूसै, बाहर से तन-मन-धन मूसै।
जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखि साजन, नहिं अंगरेज।

नयी-नयी नित तान सुनावै, अपने जाल में जगत फँसावै।
नित-नित करै हमें बल सून, क्यों सखि साजन नहिं कानून।

रूप दिखावत सरबस लूटै, फंदे में जो पडे न छूटै।
कपट कटारि जिय में हुलिस, क्यों सखि साजन नहिं पुलिस।

मतलब ही की बोलै बात, राखे सदा काम की घात।
डोलै पहिने सुन्दर समला, क्यों सखि साजन, नहिं सखि अमला।।

भारतेन्दु ब्रिटिश सरकार के कोप-भाजन थे, आँखों की किरकिरी। उनकी पत्रिकाएँ खरीदना तत्कालीन सरकार ने बंद कर दिया था। उन्होंने बैलगाडी में बैठकर देश की वास्तविक दशा देखी थी। बाढ-पीडतों के लिए उन्होंने हाथ में नारियल लेकर भीख माँगी थी। इसीलिए, वे युग-साहित्य को जन साहित्य बनाने में सफल हुए। भारतेन्दु युग के साहित्य की सबसे बडी खूबी यही है कि वह जनता का साहित्य है।
और १८५७ जनता द्वारा मुक्ति की कामना के साथ छेडा गया महाविद्रोह/अपराईजंग था, जिसमें ग्रामीण, किसान, शहरी, गरीब, बुनकर, कारीगर, भील-भीलाले, बंजारे, नायक, आदिवासी, गृहस्थ, संयासी, कोटवार, चौकीदार, दुर्गरक्षक, हिन्दू-मुस्लिम सिपाही, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढे, युवक-सभी का प्रतिनिधित्व था&#