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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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’१८५७-कोई और भी था‘
हरपाल सिंह ’अरुष‘

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१८५६ के मार्च का मध्य। सुनहरा ने पहरभर रात शेष रहते अपने घोडे पर काठी कसी। रात में नमक के पानी में भिगोकर रखे गये चनों में से दो लप्पो चने थैली में डाले और घेाडे पर सवार होकर घर से निकल  चला। बडौत से दो कोस पच्छिम में से किनारा करते हुए निकलकर आगे बढता चला गया। खेतों की ओर जाते हुए बैलों के गले में बंधी घंट्टियां चहकने लगी थीं। इन घंट्टियों का साथ देने के लिए पेडों पर चिडयाएं भी प्रभाती गाने लगीं। पूरब के क्षितिज पर गहरापन अपनी सघनता के क्षीण होते जाने से बेचैन लग रहा था। धीरे-धीरे राख का रंग उभरकर अपने पीछे आती हुई लालिमा का संकेत देने लगा था। घोडा दुडकी चाल से आगे बढता जा रहा था।
चलते-चलते लगभग दो घंटे बीत चुके थे। अभी भी पेड और झाडयां काले रंग में रंगे हुए दिखायी दे रहे थे। खेत, जिनमें कोई-कोई गेंहूँ का था, शेष अधिकतर चने के थे, काली बिछी चादर जैसे लग रहे थे। दूर पर कभी-कभी तीतर बोल पडता था। मीठी-मीठी ठंड सुनहरा की सांसों के साथ घुलकर उसके सीने को अंदर से तर करती जा रही थी। यही ठंड उसके शरीर पर चादर की तरह लिपट कर विशेष प्रकार के आनंद से सराबोर कर रही थी। घोडे की टापों और सांसों की आवाजें वातावरण पर अपनी गति की लिपिया लिखने में संलग्न होकर ऐसी भंगिमा में क्रियाशील थीं मानो खुली प्रकृति के पटल पर स्वतंत्रता का इतिहास लिखने में संलग्न हों। बैलों की गलतनियों में खनकती घंटियों तथा विभिन्न प्रकार के पक्षियो द्वारा गाये जा रहे जागरण गीतों की ध्वनियों के सामूहिक प्रभाव में आकर यह प्रभाव अपने आप में ही अंगडाई लेने लगता था। सुनहरा को विशेष बैठक में भाग लेना था, अतः उसका मस्तिष्क प्रकृति का उस नैसर्गिकता के आकर्षण की ओर से बार-बार हटा जाता था। वह अपने मन में अनेक बिन्दुओं पर एक साथ विचार करता हुआ आगे बढता जा रहा था।
बागपत के पूरब से निकलता हुआ वह आगे बढ गया। ज्यों-ज्यों सुनहरा का घोडा धरती को नापता हुआ आगे बढ रहा था उसी की देखा-देखी सूरज के घोडे आसमान को नापते आगे बढने लगे थे, क्योंकि क्षितिज की मोड खुल गयी थी और उसमें से सूरज का लाल चेहरा झांकने लगा था। या तो सूरज के घोडों से सुनहरा के घोडे से साम्य स्थापित कर लिया था या फिर अनुसरण करते हुए उन्होंने भी टुकडी चाल चलना आरंभ कर दिया था। सुनहरा को पता नहीं चला कि कब वह काठा नामक स्थान पर पहुंच गया। काठा एक ऊंचे टीले का नाम है जो जमुना से चार कोस पूरब में स्थित है। इस टीले पर दस-पांच झोंपडीनुमा मकान बने हुए थे। टीले के पश्चिम छोर पर एक कुंआ है जिसके बारे में कहा जाता है कि किसी समय सोरठ ने यहाँ विश्राम किया था। इसी कुएं पर चरस चलता हुआ मिला तो सुनहरा ने थोडी देर आराम करना चाहा दो सगे भाई किसान  वहाँ पर अपने खेतों की सिंचाई कर रहे थे। हडियल बैलों के कंधों पर जूआ रखा था जिससे बंधे रस्सी के कुंडे में मोटा सा रस्सा जिसको लाह कहते थे। डगमगाते पैरों से बार-बार नेहची तक चक्कर लगाते हुए पानी खींच रहे थे। घोडे की रास एक पतले पेड के तने से बंधकर सुनहरा शौच से निवृत होने के लिए खेतों में उतर गया।
शौच से निवृत होकर उसने नाली में बहते पानी से हाथ धोये, कुएं के पास आकर कुल्ला किया, पास खडे कीकर के पेड से, एक दातुन तोडकर दांत साफ करने के लिए चबाने लगा। दातुन कर चुकने के बाद मुंह-हाथ धोकर चने की थैली खोल ही रहा था, जो घेाडे की जीन के साथ बंधी थी, कि किसान भाइयों ने भी बैल थाम दिये। छोटा भाई, जो कद में तो मध्यम ही था परंतु शरीर से काफी मजबूत था, राख में दबी आग को कुरेदकर चिलम भरने चल दिया। बडा भाई जो कद में छह फिट रहा होगा परंतु हडयल पने में अपने बैलों से मुकाबना कर रहा था, सुनहरा के पास आकर सेवाभाव से, ’जाटों का हुक्का है‘, बोलकर जमीन पर ऊंकडू बैइ गया। दोनों भाई सुनहरा के रंगढंग देखकर उसको मन ही मन सम्मान देने लगे थे। इन किसानों के शरीर पर कपडा मात्र दो गज ही रहा होगा जिसको इन्होंने लांगदार धोती की तरह कमर और घुटनों के बीच लपेट रखा था। सुनहरा ने एक-एक मुट्ठी चने दोनों भाइयों को दे दिये। तीनो जने आत्मीयता के साथ हुक्के को घेर कर बैठ गये। सभी अपनी बारी पर घूंट भी सूट लेते और बीच के अवकाश में चने के दाने भी फांकते रहते।
’बैल बहुत कमजोर हो गये हैं।‘ सुनहरा के इतना कहते ही बडा भाई जिसके मुख पर विषाद अपने पूरे प्रभाव के साथ उभर आया था, बताने लगा, ’संबत माडा चल रहा है, नवा भुस आने में बख्त लगेगा, जितना भुस पिछले साल का बचा है उसी के दम पर बख्त सरकाना पड रहा है, यूं समझ, अधपेट भुस देकर बैलों को अधभूखा रखने का पाप कब मेरे सामने आ जाय।‘ इतने में अपनी बात बीच में ठोकते हुए छोटा बोला पडा, ’संबत कहीं माडा नहीं, माडा तो फिरंगियों का राज है, जब लौ इनका राज रहेगा, हर संबत माडा ही होना है। हम मंडी के बेचने के लिए गुड ले गये थे। भला ऐसे बैलों से गाडी खींची जाती है क्या ? किराये की गाडी करके ले गये थे। जितने रुपये गाडी का किराया था उससे कई रुपये कम में गाडीभर गुड को खरीदा, मंडी में बैठे डकेतों के कहने को बनिया माथे पर टीका लगाकर थली पर बैठता है, बोलने को बोलेगा जैसे जीभ पर मिसरी रखी हो और काटने को ठूंठ गंडासा गर्दन पर चलाएगा।‘ उसने अपनी गर्दन को बायीं ओर झुकाकर अपनी हथेली को गंडासे की तरह खोलकर गर्दन पर चलाकर दिखाया। उसके चेहरे पर वेदना, वाणी में विद्रोह और आँखों में आक्रोश साफ झलक रहा था।
हुक्का सूटने के दो-तीन राउंड तक तो छोटा बिना बोले बैठा रहा। परंतु वह शांत नहीं था। अपनी उद्विग्नता को नियंत्रण में न कर पाने की विवशता में वह फिर कहने लगा, ’गाडी का किराया भरने के लिए सेठ की बही पर अंगूठा धरना पडा, अगले बरस के गुड में, इस बरस का किराया और ब्याज का ही पूरा पडेगा। जीलिए हम तो, और ये बैल भी।‘ छोटे की बात का रुख बदलने की सोच कर बडे ने अपनी जिज्ञासा को सुनहरा के सामने रखा, ’सुना है, जल्दी ही हुल्लड होने वाला है, किसी तरह फिरंगियों का खात्मा हो जाए तो सारा मुलक चैन से जी सकेगा।‘ सुनहरा की ओर दोनों भाइयों ने उत्सुकता और आशा से देखा तो उसने भी साफ करने के लिए, ’शाहमल का संदेश है कि गांववार नौजवान पट्ठे तैयार रहें, संगठन बना लें, सभी बिरादरियों को एक जगह जोड लें‘, उसने अपने दाहिने हाथ की मुट्ठी को दिखाते हुए कहा, ’ऐसे चमार-चूहडे भी मिलकर एकगात होकर साथ रहें। लुहारों को हथियार बनाने पर लगा दो, रात दिन लगकर इनते हथियार बनवालो कमी न हो।‘ छोटे ने शंका उठाते हुए पूछा, ’ये बनिया-भामन, चमार-चूहडों के साथ एक गात कैसे हो जायेंगे ? इनको छूत नहीं लग जाएगी? छूत नहीं भी लगे तो भी ब्युपारियों को हम साथ नहीं  लगायेंगे। ये तो अपनी धी के खसम होते हैं। फिरंगी बाद में नष्ट होते रहंगे, पहले मंडी वालों के बहीखाते नष्ट करने हैं, हमें तो।‘ सुनहरा ने बताया, ’सोच-विचार से काम लेना पडेगा। देख, मैं तो तेरे से उम्र में कम हूँ। जोश तो मैं भी खा सकता हूँ। पहले फिरंगियों को ठिकाने लगा दें। बाद में अपने मुल्क का इंतजाम हम खुद कर लेंगे।‘
इस प्रकार बहुत सारी बातें तीनों के बीच होती रहीं। प्रस्थान करने से पहले सुनहरा ने उनको अनेक नयी-नयी बातें बतलायीं। दोनों भोलेभाले भाइयों की समझ में सारी बातें तो नहीं आयीं। हाँ, इतना तो वे जरूर समझ गये, कोई बडी उलट-पलट होने वाली है। उन्हने अब तक तो यही सुन रक्खा था कि राज तो राजा की पलटते हैं। एक राजा को दूसरा राजा सेना की ताकत से उखाड कर फेंक देता है और  उसके राज पर अपना राज कायम कर देता है। पहली बार एक अजूबा होने वाला है कि जनता उठकर राज का तख्ता पलट देगी। बडे भाई ने छोटे को विश्वास दिलाने का प्रयास करते हुए समझाया, ’मुझे तो ये लडका वही लगता है जिसने तात्या टोपे से सवाल-जवाब किये थे। जिसने पूछा था कि फिरंगियों ने देसी राजाओं की पेंशन बढा दी और उनके गोद लिये गये बेटों को युवराज न मानने का कानून बदल दिया तो तुम और तुम्हारे राजे इन किसानों और मजदूरों को चौडे मैदान लुटने के लिए छोडकर महलों में नहीं जा बैठोगे क्या ? लोग बताते हैं कि तात्या टोपे का मुंह ऐसा जैसे सूई -धागे से सी दिया हो, और आँखें जैसे आग की लपटें उगल रही हों। मेरा मन तो पक्कम-पक्का हो रहा है कि यह तो वही लडका है। देखा नहीं, मधराणा कद, गौरा रंग, सफेद धोती, अंगरखे पर बटनों की पंगत, पगडी देख, जैसे भगवान ने अपने हाथों से बांधी हो। मेरा भीतर वाला मानता है, वह दिल्ली या कहीं और जघा जा रहा होगा। ऐसे आदमी मंतरी बनजाएं तो सारी धरती के ऊपर हरयाली नहीं बिछजाएगी क्या ? देखा, कैसे हवा में छलांग लगा कर घोडे की पीठ पर सवार हुआ है। एक-एक बात ऐसी कि भीतर धरने लायक। कुछ भी हो, देवता पुरुख है।‘ छोटे ने भी अपनी राय प्रकट करते हुए, ’भाई! चाहे कोई बात समझ ना आती हो, पर यूं लगता है जैसे औतार बोल रहा हो। शाहमल का नाम याद रखना। वही  है जो पार उतरवा सकता है दूसरे ने कहा। सुनहरा काठा से चलकर मंडौला नामक स्थान से होता हुआ लौनी पहुंच गया। लौनी भी एक टीले पर बसा हुआ गांव है। यहां पर जाट-गूजरों ने नादिरशाह को उस समय वापिस मोड दिया था जब वह दिल्ली को लूट कर उत्तर पूर्व की ओर बढ रहा था। आज जनता के संगठित प्रतिरोध से खिन्न होकर वह दुबारा दिल्ली में घुस गया और भीषण नरसंहार मचाकर उसने अपने क्रोध को शांत किया था। सुनहरा ने अपने घोडे को बंथला की ओर मोड दिया। दिन निकले काफी समय हो गया था। यह वह समय था जब किसान रबी की कटाई में व्यस्त हो गये थे। चने और मसूर की फसलें लगभग कट चुकी थीं। तंग और कच्ची सडक पर बैलगाडयां अपने लक्ष्य की ओर बढ रही थीं, जिससे सुनहरा की गति में कई बार रुकावट हो जाती थी। ऐसी सडकें खेतों से तीन-चार हाथ गहरी होती थीं। कहीं-कहीं इतनी तंग होती थीं कि आमने-सामने से आती बैलगाडयां बचाकर निकालने में कठिनाई होती थी। ऐसी परिस्थितियों का सुनहरा को पहले से ही आभास था, तभी तो पहरभर रात शेष रहते  ही  वह  घर से निकल पडा था। बचता-बचाता कभी धीमा कभी तेज होकर चलता हुआ हिंडन नदी पार करके गाजीउद्दीनपुर नामक गांव के पास से होता हुआ वह दादरी की ओर बढ चला।
दादरी में चौधरी उमरावसिंह गूजर ने एक बैठक बुला रही थी, जिसमें गुलावटी, अगौता, जहांगीरपुर, सुनपेडा, दादूपुर, सन्नौटा और बिसरख आदि गावों से दो-दो आदमी बुला रखे थे। साथ ही मालागढ के नवाब वलीदाद खां के भी इस बैठक  में  सम्मिलित होने की आशा थी। जब सुनहरा चौधरी उमराव के मकान पर पहुंचा तब तक दिन काफी चढ चुका था। आठ-दस लोग ही वहां बैठे थे। चौधरी उमरावसिंह, जिसकी आयु लगभग पचास वर्ष थी, शरीर से लंबा-तगडा और गेहुंआ रंग का रौबदार आदमी दिखता था। उसकी काली और तनी हुई मूंछों के ऊपर नुकीली प्रभावशाली नाक सुंध कर बडी-बडी चमकदार आंखों के बीच में ऊंचे माथे से जाकर मिल रही थी। दोनों टांगों की धोती घुटनों तक आती थी, ऊपर अंगरखा, जिसमें कसा हुआ उसका सीना, व्यक्तित्त्व की तरह ही विशाल था। सिर पर कसकर बंधी हुई फेंटदार पगडी। उमरावंसह सुनहरा को देखते ही खडा होकर घोडे की लगाम पकडने के लिए लपका। वह मेहमान के स्वागत करने की परंपरानुसार ही आगे बढा था। जो लोग बैठे हुए थे, वे एकदम खडे होकर आश्चर्य से देखने लगे। उनका आश्चर्य भी अपनी जगह ठीक था। उमरावसिंह जैसे बडे चौधरी का एक नौजवान मेहमान के स्वागत में इतनी चुस्ती दिखाना उनके लिए कुतूहल पैदा करने वाला तो था ही। सुनहरा भी कम नहीं था। वह घोडे पर से छलांग लगाकर कूद गया और बाग को थामे-थामे घोडे और चौधरी उमराव ंसह के बीच में आकर अभिवादन की मुद्रा में खडा हो गया। एक नौकर ने दौडकर घोडे की बाग हाथ में ली, और इस प्रकार एक ओर चलना आरंभ कर दिया जैसे उसको मेहमानों के स्वागत में सम्मिलित होने का पूरा अभ्यास हो। नौकर ने घोडे को आंगन की खुली कच्ची रेतीली धरती पर लुटलुटी करके थकान उतारने के लिए स्वतंत्र छोड दिया।
इतने में वलीदाद खां पाच-छह आदमियों के साथ आ पहुंचा। चौधरी उमरावसिंह ने दौडकर उसके घोडे की लगाम थाम ली। वह घोडे से इस प्रकार उतरा जैसे सुलतान अथवा बादशाह उतरता है। उसकी टखनों से ऊपर तक की सलवार के ऊपर सूती शेरवानी जिसकी कालर और बटन वाल पट्टियाँ हरे रंग के कपडे से बनी थीं पहन रखी थी। हरे रंग-रंग के कपडे को लपेट देकर बनायी गयी फेंटदार पगडी उसको तुर्की ढंग का व्यक्तित्व प्रदान कर रही थी। छोटी तराशी हुई दाढी और ऐंठा कर ऊपर को उठी हुई मूछें उसके चेहरे के व्यक्तित्व को अधिक निखार रही थीं। सभी ने खडे होकर उसका स्वागत किया। इसी प्रकार, कभी दो, कभी चार, आदमी आते-आते, पेंतीस-चालीस की संख्या जुड गयी।
एक नौकर हुक्के भर रहा था। बाहर आंगन में उपलों के एक छोटे से ढेर में आग सुलग रही थी। नयी विकसित हुई तंबाकू की किस्म कंपला के साथ देसी तंबाकू की गंध मिलकर बैठकखाने की हवा में तैर रही थी। शीरे का भीनापन भी उस गंध में अपना योगदान कर रहा था। सरकंडे के मूढे पर बैठा हुआ चौधरी उमराव सिंह खडा हो गया तो सब की आंखें उसकी ओर मुड गयीं। उमराव ने सभी आने वालों पर निगाह दौडाकर पूछना आरंभ किया, ’मैं जिस गांव का नाम लूँ तो वहां से आने वाला भाई हां कर दे, जिससे सब को जानकारी हो जाय कि हम कहां तक तैयार हैं और हमारी सफलता की कितनी उम्मीद है, अब मैं नाम पुकारता हूँ‘, कहकर उसने एक-एक करके उन गांवों के नाम पुकारे जिन से लोगों के सम्मिलित होने की उम्मीद थी। सभी ने ’हां‘ में उत्तर दिया। संतुष्ट होकर उमरावसिंह ने कहा, ’मैं आज आप सभी को एक ऐसे नौजवान से मिलवाता हूँ जिसको मैंने खासकर आप लोगों के बीच बुलवाया है। पिछले महीने इससे मैं मेरठ में मिला था। यह एक पढा-लिखा नौजवान है। यह देश, समाज और दुनिया की बहुत सारी बातें जानता है। मेरठ में इसकी बातों का तोड उस औधड साधु के पास तो क्या होता तात्याटोपे के पास भी नहीं मिला। मैंने तो उस बैठक में ही कह दिया था, हमारा नायक तो यह नौजवान होना चाहिए। परंतु वहां पर तो ऐसे लोगों की बांधी  बंध रही थी जो अपने आपको बहुत बडे आदमी समझते हैं। अब हम इस बात पर बहस नहीं करेंè

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