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अतिला यूसुफ की कविताएँ

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बुदापेस्ट में ११ अप्रैल १९०५ को जन्म। तीन साल में पिता ने घर छोड दिया और १४ साल की उम्र में माँ चल बसीं। कभी अनाथालय में रहे तो कभी रिश्तेदार के यहाँ। किसी तरह खुदकुशी की कोशिश की। हंगरी के साम्यवादी दौर में सर्वहारा के महान कवि के रूप में देखे गये। १७ साल की उम्र में प्रथम संग्रह। आजीविका के लिए कोयला-लकडी चोरी करने से लेकर होटल में सफाई तक करनी पडी। ’विद प्योर हर्ट‘ नामक कविता के लिए १९२५ में विश्वविद्यालय से निकाल दिये गए। अपने विवादस्पद लेख ’साहित्य और समाजवाद‘ के कारण अभियोग तक झेलना पडा। ३ दिसंबर, १९३७ को रेलगाडी से कटकर जान दे दी)
मेरी कर्कश आवाज नहीं
यह मेरी कर्कश आवाज नहीं, यह पृथ्वी है
जो कडकती है
सावधान, सावधान, शैतान का पागलपन जाग उठा है
अर्द्ध पारदर्शी वसंत के साफ धुँधले फर्श के प्रति वफादारी ने
तुम्हें शीशे में पिघला दिया
चमकीले हीरे के पीछे छिपा
पत्थर के नीचे गोबरैले का च-चूँ
ओ, ताजा बने ब्रेड की गंध में खुद को डुबो दो
एक गरीब अभागे, गरीब अभागे
धरती के नालों में बौछार के साथ कीचड
बेकार ही खुद में अपने चेहरे को डुबोते हो
इसे सिफर् दूसरों में ही डुबोया जा सकता है
घास के ऊपर की छोटी पत्तियाँ बनो ः
पृथ्वी की धुरी से बडे
यंत्रो, चिडयो, पेड की डालों, नक्षत्रों !
हमारी बाँझ माँएँ एक बच्चे के लिए चीखती हैं
मेरे दोस्त, मेरे अजीज, सबसे चहेते दोस्त,
चाहे यह भयानक रूप में आये या महत्त्वपूर्ण रूप में,
यह मेरी कर्कश आवाज नहीं, बस पृथ्वी की कडक है। (१९२४)

दूत
अब ट्रेन पटरी से नीचे जा रही है
हो सकता है यही मुझे नीचे लाये
शायद तमतमाये चेहरे आज ठंडे हो जाएँ
आप मुझसे बात कर सकते हैं, कह सकते हैं ः
गर्म पानी बह रहा है, अभी-अभी नहाये
यह तौलिया लेकर पोंछ लें
भट्ठी पर माँस चढा है, आपको खिलाया जाएगा !
जहाँ मैं लेटा हूँ, वहाँ आपका बिछावन है। (१९३३)

मेरी आँखें उछल-कूद करती हैं
मेरी आँखें उछल-कूद करती हैं, मैं फिर पगला गया
ऐसा होने पर मुझे दुखाओ (सताओ) मत, मुझे कस कर पकडो
जब मैं आपे से बाहर हो जाऊँ
तो अपने मुक्के मत तानो, मेरी बिखरी नजर
इसे कभी नहीं ताड पाएगी
मुझे झकझोरो मत, मजाक मत बनाओ
रात के नीरस छोर को दूर करो
सोचो, मैंने सौंपने लायक कुछ भी नहीं छोडा है,
थाम कर रखने वाला भी नहीं
अपना कहने लायक कुछ भी नहीं,
मैं उसकी पगडी खाता हूँ आज
और इस कविता के पूरी होने पर, जो होगी नहीं
टार्च की रोशनी लायक जगह, जिधर से
मैं नंगी आँखों में घुसा हूँ, यह कौन सा पाप है
जो वे देख रहे हैं
कौन बोलेगा नहीं, मैं जो भी करूँ इससे कोई फकर् नहीं पडता
जो भी मुझे प्यार करेंगे मैं उन पर दावा करूँगा।

जिसका मतलब नहीं जानते, उस पाप पर भरोसा करें
मेरे कब्र से निकलने और मुक्त हो जाने तक। (१९३६)

उम्मीद के बगैर
धीरे-धीरे, सुस्ताते हुए
मैं, जैसे कोई आराम फरमाने आया हो
उस उदास, रेतीले, गीले तट पर
और चारों ओर देखता हुआ और घोर दारिद्र्य से मुक्त
समझदारी से भरा सर डुलाता, और इससे अधिक
की उम्मीद नहीं करता
बस इसीलिए अपनी गिरवी को वापस पाने की
कोशिश करता हूँ
बिना किसी छल के लापरवाही से
चिनार पेड की सफेद पत्ती पर
एक चाँदी की कुल्हाडी हल्के-हल्के चलती है
रिक्तता की एक डाल पर
बेआवाज मेरा काँपता दिल बैठा है
और देखता है, देखता जाता है अनगिनत बार
नाजुक सितारे इसे देखने चारों ओर जुट गये
स्वर्ग की नीली गुफा में....
स्वर्ग की नीली गुफा में घूमता है
एक ठंडा और वार्निश किया डायनेमो
शब्द चमकते हैं मरे दाँतों में, तय करते हैं
उफ्फ बेआवाज नक्षत्रो-इसलिए-
अतीत मुझमें पत्थर की तरह गिरता है
हवा की तरह बेआवाज क्षितिज से होकर
काल, मौन, एकांत की धारा
तलवार चमकती है और मेरे बाल
मेरी मछें, एक मोटा प्यूपा
अनित्यता के मेरे मह में जितना स्वाद है
मेरा दिल दुखता है, शब्द ठंढक पहुँचाते हैं इससे होकर
उन्हें, जिन्ह, जिनकी आवाज मतलब पैदा करती है.. (१९३३)

चीत्कार
मुझे वहशियाना प्यार करो, व्याकुलता की हद तक
मेरे भीषण क्लेश को डराकर भगा दो
अमूर्त्तता के पिंजडे में,
मैं एक लंगूर, उछल-कूद करता हूँ,
शाप में मेरे दाँत दिखते हैं
जिसके लिए न तो मुझमें भरोसा है और न ही कल्पना
उसकी त्योरियों के आतंक में
नश्वर, क्या तुम मेरा गाना सुनते हो
या सिफर् प्रकृति की प्रतिध्वनि की तरह

मुझे आगोश में ले लो, अनदेखा करते हुए
सिर्फ टकटकी मत लागाओ
ज्यों ही धारदार छुरी नीचे आती है
कोई अभिभावक जिंदा नहीं
जो मेरे गीत सिसकारी सुनें
उनकी त्योरियों के आतंक में।

जैसे एक नदी के ऊपर लट्ठों का बीडा
स्लाव मांझी, चाहे वह जो भी हो
इसलिए हमेशा के लिए मानव जाति
व्यथित गूँगा, धारा नीचे जाती है-
लेकिन मैं बेकार ही जोर लगाकर चीखता हूँ।

मुझे प्यार करो ः मैं चंगा हो जाऊँगा, मैं थरथराता हूँ
उसकी त्योरियों के आतंक में। (१९३६)

बाढ से बाहर निकालो
मुझे डराओ मेरे छिपे हुए देवता,
मुझे तुम्हारा रोष चाहिए, तुम्हारा कोडा, तुम्हारी कडक
जल्दी करो, आकर बाढ से मुझे बाहर निकालो
ऐसा न हो कि हमें नीचे बुहार दिया जाये
धूल में मेरी नजरों तक, एक अंधा
और अभी तक मैं दर्द की छुरी से खेलता हूँ
इंसानी दिल के झेलने के लिए विकट
कितनी आसानी से मैं सुलग रहा हूँ ! सूरज
झुलसाने की स्थिति में नहीं-डरे रहो-
मुझ पर चीखते हो, आग को अकेला छोड दो
तुमने मेरी हथेली पर इजोत देने वाला बोल्ट दे मारा
मुझमें हथौडे की तरह लगे गुस्से से या अनुग्रह से
यह भोलापन ही दुष्टता (बुराई) है
यही भोलापन मेरा पिंजडा हो सकता है
शैतान से भी बुरी तरह झुलसा सकता है
मैं झूठ बोलता हूँ कि यह भग्न पोत का खंडहर है
उपलाते क्रूर विप्लव के द्वारा उछाला गया है
अकेले ही मैं दुस्साहस करता हूँ, ललकारता हूँ
बमुश्किल कुछ भी शिनाख्त होता है
मरने के लिए मैं अपनी साँसे रोक लूंगा
तुम्हारे छड और कारिंदे इस तरह अवज्ञा करेंगे
और साहस के साथ मेरी आँखों में देखो
तुम रिक्त हो, मनुष्यता से रहित। (१९३७)



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