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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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जोखिमों से खेलता हंगरी कवि : अतिला यूसुफ
चयन : उमा

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मेरा कोई पिता नहीं, न माँ, न ईश्वर, न देश, न झूला, न कफन, न चुंबन और न ही प्यार। तीन दिनों से मैंने खाया नहीं, कुछ भी नहीं। मेरे २० साल एक ताकत हैं। मेरे ये बीस साल बिकाऊ हैं। यदि खरीदनेवाला कोई नहीं, तो शैतान उसे खरीद ले जाएगा। मैं सच्चे दिल से फूट पडूँगा। जरूरत हुई तो मैं किसी को भी मार डालूँगा। मैं कैद कर लिया जाऊँगा और जिस घास से मेरी मौत आएगी, विस्मयकारी ढंग से वह मेरे सच्चे दिल पर उग आएगी। ये पंक्तियाँ हैं-२०वीं शती के उस महान हंगरी कवि की, जिसके पिता ने तीन साल की उम्र में घर को छोड दिया, १४ साल की उम्र में माँ गुजर गयी, कविताओं के कारण स्कूल-कॉलेजों से निकाला गया, मारक आलोचना के कारण फैलोशिप जाती रही, प्रेमिकाओं ने दगा दिया, वैचारिक स्वतंत्रता ने कम्यूनिस्ट पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। अतिला यूसुफ नाम के इस हंगरी कवि का जन्म ११ अप्रैल १९०५ को एक साबुन फैक्ट्री के मजदूर ऐरन यूसुफ और किसान की बेटी बोलबला पोज के परिवार में हुआ था। तीन साल की उम्र में पिता के घर त्याग देने के बाद, दो बेटियों और एक बेटे के निर्वाह में अक्षम माँ बोलबला ने बच्चों को अनाथालय में दे दिया। यहाँ अतिला को सूअर चराने तक का काम करना पडा। यहाँ के नारकीय जीवन से उकताकर बालक अतिला माँ के पास आ गया। लाचार और अशक्त माँ काम के बोझ और कैंसर से सिफर् ४३ साल की उम्र में चल बसीं। बीच के दिनों में, नर्वस ब्रेकडाउन के शिकार बालक अतिला ने नौ साल में ही खुदकुशी की कोशिश की थी। रोज-ब-रोज बचने के इस दौर की जद्दोजहद को याद करते हुए अतिला आत्मवृत्त में लिखते हैं कि कई बार ऐसा हुआ कि भोजन के लिए कतार में नौ बजे रात को लगने के बाद, दूसरे दिन साढे आठ बजे बारी आने पर पता चलता कि खाना ख्ात्म हो चुका है। जीविका में अपनी माँ की हरसंभव मदद की। विलाग सिनेमा में ताजा पानी बेचने का काम किया। जलावन के लिए कुछ भी न रहने पर लडकी और कोयला चुराया। अपनी उम्र के बच्चों के लिए रंगीन कागज के खिलौने बनाकर बेचे। टोकरी और पार्सल ढोये। अतिला के इन हालात के बरअक्स हिंदी कथाकार शैलेश मटियानी, पंजाबी के कज्जाक जहीर ही याद आते हैं। सामाजिक व्यवस्था में संतुलन की जिस चाहत से इन लोगों की आस्था समाजवाद या माक्र्सवाद से जुडती है, वह जीवन से उनका मानवीय सरोकार है। यह विचारणीय है कि लगभग ऐसी ही स्थिति से निकले दलित लेखकों में, वैसी आस्था की जगह प्रतिशोध और आवेश क्यों होता है ? भला ऐसी त्रासद व कारुणिक स्मृति की छाप अमिट कैसे न रहे। इन्हीं अनुभवों ने अतिला की रचनाशीलता का भावलोक तैयार किया। आकस्मिक नहीं कि लागोस हटवानी ने इनकी कविताओं को, पूरी युद्धोत्तर पीढी के लिए दस्तावेज कहा। यथार्थ के गहरे और सघन बोध के साथ वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की प्रखरता से जीवन कभी स्थिर और व्यवस्थित नहीं हो सका। मानसिक अवसाद के घोर दौर में रहते हुए, रचनाशीलता को अक्षुण्ण रखकर, उन्होंने विकट जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। माँ की मृत्यु के बाद जीजा ने अभिभावकत्व निभाते हुए कवि को एक माध्यमिक विद्यालय में डाल दिया। बाद में उसने रोज विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए आवेदन कर दिया। लेकिन शीघ्र ही, एक क्रांतिकारी कविता के कारण उसे वहाँ से निकाल दिया गया। इसी के साथ शिक्षक बनने का सारा ख्वाब जाता रहा। शिक्षक बनने के ख्वाब चूर होने का प्रसंग बेहद दुखद है, जिसका अतिला अपने आत्मवृत्त में उल्लेख करना भूला नहीं। तब तक उनकी कविता ’विद प्योर हर्ट‘ को काफी ख्याति मिल चुकी थी। उस पर सात अखबारों में आलेख छपे। प्रो. लाजोस डेजसी को बेहद गर्व के साथ याद करते हुए कहते हैं कि उनका विचार था कि मैं अपने ऊपर खुद ही शोध करूँ। लेकिन, जैसे ही प्रो. अंटाल होर्जर ने हंगरी भाषा की जाँच ली तो सारा भूत ही उतर गया। प्राथमिक विद्यालय के दो शिक्षकों के सामने, उन्होंने लगभग ताना देते हुए कहा कि तुम्हारी तरह की कविताएँ लिखने वालों को भावी पीढी की शिक्षा कत्तई सुपुर्द नहीं की जानी चाहिए। इतना ही नहीं, उस प्रोफेसर ने इसे मुद्दा बना दिया। उनका कहना था कि वह जब तक वहाँ रहेंगे, उन्हें शिक्षक नहीं बनने दिया जाएगा। यह विडंबना ही है कि तब कक्षा में मिलने वाले साप्ताहिक ५२ पाठों में से २० में अतिला को सर्वोत्तम श्रेणी मिली थी। प्रतिभाशाली होने के कारण छात्रावास का कोई शुल्क अदा नहीं करना पडता था। रहने का सारा खर्च उनकी कविताओं से मिलने वाले मानदेय निकाल ले रहे थे।
प्रो. अंटाल होर्जर का वह ताना इतना जहरीला साबित हुआ कि हंगरी लौटने के बाद भी उन्होंने शिक्षक की परीक्षा फिर कभी नहीं दी। शिक्षक की नौकरी पाने पर तो जैसे भरोसा ही नहीं रहा। फिर उन्होंने विदेशी व्यापार संस्थान में हंगरी-फ्रांसीसी संवाददाता की नौकरी कर ली। यहाँ भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोडा। कठोर जीवन-संघर्ष से अभी उबरना शेष था। नौकरी से बैठा दिये गये। सामाजिक सुरक्षा संस्थान ने उन्हें आरोग्यशाला भेज दिया। वहाँ चिकित्सा के दौरान् अतिला को ’न्यूरस्थेनिया ग्रैविस‘ नामक एक मनोरोग से ग्रस्त बताया गया। वहाँ उन्हें इस स्वीकृति के साथ कि वह संस्थान पर बोझ नहीं बनना चाहते, नौकरी छोड देनी पडी। उनके अनुसार, जीने की जद्दोजहद तो जैसे बालपन से ही शुरू हो गयी थी, पर एक कवि के अर्थ में यहीं से दुविधा, अंतर्द्वंद्व, जोख्ाम, असुरक्षा के रास्ते असंतुलन से होकर मनोविदलता (सिजोफ्रेनिया) तक उनकी यात्रा चलती रही। मनोचिकित्सा होने लगी। उन्होंने शादी तो कभी नहीं की, पर मनोचिकित्सा के क्रम में आने वाली महिलाओं से कुछ प्रेम-प्रसंग जरूर चले। अभिव्यक्ति में बेलौसपन और बेबाकी के साथ वैचारिक स्वतंत्रता के कारण कोई भी संफ भावनात्मक राग-रेशे की हद तक न आ सका। कवि, उपन्यासकार तथा आलोचक मिहाली बैबिट्स पर एक आक्रामक समीक्षा के कारण बामगार्टेन फाउंडेशन ने उनसे सहयोग का हाथ खींच लिया। वह इससे न तो तिलमिलाये और न उनके लिए यह अचरज का विषय बना। मानो वह इस हश्र के लिए पहले से ही तैयार बैठे थे। आख्ार, इस फाउंडेशन के अध्यक्ष भी तो बैबिट्स ही थे। अभिव्यक्ति के जोख्ामों से खेलने की ठान लेने के बाद, कोई किसी की, किस हद तक मदद तक सकता है, इसे भारतीय उपमहाद्वीप निराला, मुक्तिबोध, मंटो, नजरूल, पाश के उदाहरण से अच्छी तरह समझ सकता है। विश्व-साहित्य में अतिला इसके निराले उदाहरण न हों, पर उस तरह से भुलाने लायक तो नहीं हैं, जिस तरह उन्हें उनके जन्म शती वर्ष में भुला दिया गया। १० अक्टूबर, २००६ को तो आत्महत्या पर नियंत्रण का दिवस ही घोषित कर दिया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट तो कहती है कि दुनिया में प्रति घंटा १०४ लोग खुदकुशी कर रहे हैं। इसका कारण अति महत्त्वाकांक्षा, तनाव और हिंसा हैं, लेकिन अतिला के अंत को इस सरलीकृत खाँचे में नहीं बिठाया जा सकता है। उनका अंत तो अभिव्यक्ति के उस ख्ातरे से खेलने के कारण हुआ, जिसके बिना उनकी रचनाशीलता बची नहीं रह सकती थी। पाश के शब्दों में, ’बीच का कोई रास्ता नहीं होता।‘ दूधनाथ सिंह के निराला ः आत्महंता आस्था के इस मार्मिक अंश से अतिला के द्वंद्व और नियति को सहजता से समझा जा सकता है ः कला रचना के प्रति अनंत आस्था एक प्रकार के आत्महनन का पर्याय होती है, जिससे किसी मौलिक रचनाकार की मुक्ति नहीं है। जो जितना अपने को खाता जाता है, बाहर उतना ही रचता जाता है। पर  दुनियावी तौर पर वह धीरे-धीरे विनष्ट, समाप्त, तिरोहित तो होता ही जाता है। महान और मौलिक सर्जना के लिए यह आत्मबलि शायद अनिवार्य है। यह महान और मौलिक सर्जना कबीर की लुकाठी ही तो है, जिसे लेकर वह कहते फिरते हैं ः जो घर जारै आपना चले हमारे साथ। यानी कबीर की तरह आत्मबलि का न्यौता। स्कूल-कॉलेज से निष्कासन, प्रेमिकाओं का तिरस्कार; अचानक उनके जीवन में नहीं आया। यह उनके चुनावों का नतीजा ही तो था। पर मनोविदलता के ख्ातरनाक दौर में हों या अवसाद के घोर क्षणों में, उनकी क्रांतिकारिता कभी क्षीण नहीं हुई। स्कूल से निकाले जाने के बाद कॉलेज के दिनों में अध्ययन की तन्मयता और शोधवृत्ति इस कदर सुरक्षित थी कि इस दौरान् ऑस्ट्रिया और पेरिस में शिक्षार्जन करते हुए, उन्होंने १५वीं सदी के फ्रांसीसी साहित्य के एक विख्यात कवि फ्रैंकोइस विलन की खोज कर डाली। विलन कवि के साथ-साथ शातिर चोर भी था। विश्व विद्यालय से निष्कासन के बाद अतिला अपनी पांडुलिपियाँ लेकर विएना आ गये। यहाँ उन्हें आजीविका के लिए अखबार बेचने से लेकर होटल रेस्त्रां में सफाई तक का काम करना पडा। इसी दौरान् उन्होंने माक्र्स और हीगेल को पढ डाला। इनकी छाप भी उनकी विचारधारा और रचनाओं पर पडी। इस दौर  की  रचनाओं की सराहना  तत्कालीन शोधकर्ताओं और नामी-गिरामी समीक्षकों ने भी की। १९७२ में कई फ्रांसीसी पत्रिकाओं ने उनकी कविताएँ प्रकाशित की। १९२९ में प्रकाशित कविता-संग्रह पर फ्रांसीसी अतियथार्थवाद की छाप देखी जाती है। अगले ही साल वे अवैध रूप से हंगरी कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये। १९३१ में आया संग्रह जब्त कर लिया गया और ’साहित्य तथा समाजवाद‘ शीर्षक लेख के कारण उन पर अभियोग तक चला। १९३१ से १९३६ के दौरान् आये संग्रहों से उन्हें समीक्षा-आलोचना जगत् में व्यापक मान्यता मिली। इसी दौरान् भीषण अवसाद के कारण उन्हें अस्पताल में भरती होना पडा। ’मेरी आँखें उछल-कूद करती हैं, इसी बीच लिखी गयी कविता है। अपने मनोचिकित्सक की हौसला अफजाई से प्रोत्साहित होकर उन्होंने ’हवा की एक साँस‘ १९३६ में लिखी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं ः ’वे मेरे सभी टेलीफोन कॉल टेप कर सकते हैं/ (न जाने कब, कौन और किससे बातचीत का)/ मेरे सपनों और योजनाओं की उनके पास एक फाइल है/ और वे उसे पढते हैं/ और कौन जानता है कब उन फाइलों को खोदने के उन्हें पर्याप्त कारण मिल जाएँ/ जो मेरे हकों का उल्लंघन करें। भयंकर गरीबी और असुरक्षा से घिरे होने के बावजूद उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता को अक्षत रखा और अभिव्यक्ति की मौलिकता को अक्षुण्ण। उनकी वैचारिक स्वतंत्रता तथा फ्रायड में दिलचस्पी का नतीजा ही था कि वे फ्रायड के मनोविश्लेषण तथा माक्र्सवाद के संश्लेषण करने की योजना पर गंभीरता से काम करने लग गये थे। दरअसल, यह दोनों ही विचारधाराएँ जीवन में चरम भौतिकता की प्रतिष्ठा करने वाले सिद्धांतों पर टिकी हैं। अपने स्वाभाविक संस्कार के तहत ही कम्यूनिस्ट पार्टी इस नवीनता और मौलिकता की आँच को बर्दाश्त नहीं कर सकी और अतिला को निष्कासित कर दिया। पॉल हेलर ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि उनकी विरल बौद्धिक मारकता और अटूट ईमानदारी से उपजी उग्र अद्वितीयता को पार्टी नहीं झेल सकी। निरंतर बढते अकेलेपन में भयंकर मानसिक असंतुलन और मनोविदलता से वह पार नहीं पा सके। ३ दिसंबर, १९३७ को सिफर् ३२ साल की उम्र में अतिला ने एक मालगाडी से कटकर अपनी जान दे दी। उनकी इस नियति को हिंदी के विख्यात कवि रघुवीर सहाय की इस पंक्ति से समझा जा सकता है ः सबसे मुश्किल और एक ही सही रास्ता है कि मैं सब सेनाओं में लडूँ, किसी में ढाल सहित, किसी में निष्कवच होकर-मगर अपने को अंत में मरने सिफर् अपने मोर्चे पर दूँ (’आत्महत्या के विरुद्ध‘ की भूमिका में)। अतिला ने इसी दशक के शुरू साल में खुदकुशी करने वाले विख्यात रूसी कवि मायकोव्स्की की कविता ’सेर्गेंई एसेनिन‘ को अपनी मौत से जैसे जीवंत किया ः तुम अगर मुझसे पूछो / मैं पसंद करूँगा पीकर मर जाना बनिस्बत मृत्यु की प्रतीक्षा में ऊबने/ या ऊबते हुए जीने से (सेर्गेनिन ने भी वर्ष १९२५ में खुदकुशी की थी।



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