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अलीगढ से निकलने वाली प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका ’वर्तमान साहित्य‘ के जनवरी, २००७ के अंक में डॉक्टर मुल्कराज आनन्द की एक अंग्रेजी कहानी हिन्दी अनुवाद में छपी है। कहानी का मूल अंग्रेजी शीर्षक-’द बार्बर‘स ट्रेड यूनियन‘ ही यहाँ भी रखा गया है (पृ. ५०-५३)। कहानी में गाँव के एक अनपढ नाई के अनपढ बेटे द्वारा गाँव के अभिजात-वर्गीय लोगों द्वारा अपने अपमान के प्रतिकार स्वरूप और अपना स्वतंत्र और आत्मसम्मानपूर्ण स्थान बनाने के लिए आसपास के सब नाइयों की एक यूनियन बनाने की संघर्षपूर्ण परन्तु सफल कहानी कही गयी है। यह डॉ. मुल्कराज आनन्द की एक शुभाकांक्षा मानी जा सकती है। बहुत से लोग इस प्रकार के समाजोत्थान और शोषण-विरोध के सपने बुनते हैं, कहानियाँ और लेख लिखते हैं और भाषण भी देते हैं। पर, व्यावहारिक स्तर पर कम ही लोग, स्वयं इसे क्रियात्मक रूप दे पाते हैं। इसके लिए विशेष प्रकार की मनोवृत्ति के साथ-साथ साहस और स्वयं कुछ बलिदान करने का दम होना चाहिए। और डॉ. आनन्द ऐसे साहसी भी थे और क्रियाशील भी।
डॉ. मुल्कराज आनन्द पिछली शताब्दी के भारत के श्रेष्ठतम कला-समीक्षकों और कला-इतिहासकारों में परिगण्य रहे हैं। वे विश्व भर के गिने-चुने शीर्ष कला-समीक्षकों में से थे। ’मार्ग‘ जैसी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात कला-पत्रिका के सम्पादक, ललित कला अकादमी के संस्थापक सदस्य और जीवन पर्यन्त अकादमी के कर्त्ता-धर्त्ता और भारत में कला-चिन्तन संबंधी हर संस्थान के संरक्षक, परामर्शदाता और मार्गदर्शक डॉ. आनन्द एक प्रतिबद्ध वामपंथी विचारक और दार्शनिक भी थे। आप प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सदस्य भी थे।
लाहौर से शरणार्थी बनकर चण्डीगढ में फिर से अपना गौरवशाली स्थान बनाने को लालायित पंजाब यूनीवर्सिटी ज्ञान के विविध क्षेत्रों के चोटी के विद्वानों को चुन-चुनकर देश के कोने-कोने से चण्डीगढ लाने में प्रयत्नशील थी। इसी क्रम में कुलपति डॉ. ए.सी. जोशी डॉ. मुल्कराज आनन्द को भी ’टैगोर प्रोफेसर आफ इण्डियन आर्ट‘ के पद पर यहाँ लाने में सफल रहे। डॉ. आनन्द की जीवनशैली, भाषणशैली और कार्यशैली आम प्रोफेसरों से एकदम भिन्न थी। वे नितान्त अनौपचारिक, खुले हुए, बेबाक और मुँहफट किस्म के स्कॉलर थे। पसंद आये तो खुली तारीफ, न पसंद आये तो खुली निन्दा और मुँह पर ही अपना रागद्वेष व्यक्त करने वाले व्यक्ति थे। वे उनका रहना, पहनना, चलना, बोलना सब समाजवादी कस्म का था-सादा, एक विशेष प्रकार की शालीनता से युक्त, परन्तु नितान्त बराबरी वाला।
डॉ. आनन्द केवल एक नौकर के साथ रहते थे, पूर्णकालिक नौकर। नौकर भी उनके लिए मित्रवत और बराबर का पारिवारिक सदस्य था। मुझे अपने गुरुवर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी द्वारा डॉ. आनन्द का कुछ हिन्दी अनुवाद कार्य करने का प्रस्ताव मिला था। उनकी एक पुस्तक यूनेस्को द्वारा अंग्रेजी-हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हो रही थी। उसी सिलसिले में मैं कभी -कभार उनकी कोठी पर जाया करता था और तभी मुझे उनकी जीवन-शैली, कार्यशैली और विचारों को कुछ निकट से देखने का अवसर मिला था। डॉ. आनन्द कहीं किसी बैठक आदि के सिलसिले में बाहर गये हुए थे। जब लौटे, तो अपने साथ वाली’बॉल का नैट, बॉल आदि ले आये। अपने नौकर को उन्होंने सुझाव दिया कि उनकी और आचार्य द्विवेदी की कोठियों के बीच वाले खाली स्थान को वह अपने पडोसी मित्रों के साथ साफ करे। वहाँ उनका वाली-बॉल का कोर्ट बन जाएगा। ज्यादा लोग तो साथ नहीं आये, पर आसपास की कोठियों के तीन-चार अन्य नौकरों के साथ मिलकर डॉ. आनन्द के नौकर ने वह स्थान एकदम साफ कर दिया। डॉ. आनन्द की प्रेरणा से चूना मंगवाया गया और उनके निर्देशन में चूने की लकीरें खींचकर वाली-बॉल कोर्ट तैयार हो गया। उन्होंने अपने नौकर के शाम ४ और ६ बजे के बीच अवकाश की घोषणा कर दी और उससे कहा कि वह आसपास की कोठियों के नौकरों को भी प्रेरित-प्रोत्साहित करे कि उनके गृहस्वामी भी उन्हें शाम को छुट्टी दे दें, जिससे उनकी टीम बन सके। शुरू के दिनों में अधिक सफलता नहीं मिली। दो-तीन नौकर ही गृहस्वामियों से अनुमति प्राप्त कर सके। पर डॉ. आनन्द की प्रेरणा चलती रही। वे उन्हें साहस और धैर्य न छोडने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। उन दो-तीन लोगों ने पास के अड्डे के दो-एक रिक्शेवालों और एक दूध सप्लाई करने वाले लडके को गाँठ लिया, और खेल चालू हो गया। उनकी हँसी-मजाक, जीत-हार की खुशी-नाराजगी की आवाजें, और शोर-शराबा जहाँ आसपास की गृहस्वामिनियों को अन्दर ही अन्दर जलाता था, वहाँ पुरुष वर्ग को अपराध-बोध सताने लगा था। किसी-किसी ने पत्नी से अपने नौकर के लिए भी शाम की छुट्टी की दबी-ढकी सिफारिशें कर दीं। अधिक कष्टकर स्थिति तब पैदा हुई, जब वे नौकर जिन्हें अनुमति नहीं मिली थी, दिनोंदिन नाराज, चिढे हुए, काम के प्रति लापरवाह और उद्दण्ड होते गये। मृत्य-संस्कृति में नौकरों पर निर्भर लोग बहुत कमजोर, लाचार और असहाय हो जाते हैं। उन्हें पति या पत्नी की नाराजगी तो सहन हो सकती है, पर नौकर का काम छोड कर चले जाने का नोटिस एकदम नहीं। महिलाओं में कुछ दिनों तक गर्मागर्म सेमिनार का यही विषय बना रहा। परस्पर डॉ. मुल्कराज आनन्द की निन्दा भी होती रही, पर धीरे-धीरे, एक-एक करके उस मुहल्ले के सब नौकर अनुमति पाने में सफल हो गये। मालूम हुआ कि कुछ नौकरों ने तो सचमुच काम छोडने की धमकी दे दी थी। यह वाली-बॉल क्लब उनके लिए अहम का और अपने मान का प्रश्न बनता जा रहा था।
वह वाली-बॉल क्लब चला और खूब चला। आस-पडोस के कुछ जवान लडके भी अधिक उल्लास के साथ इसमें आ जुटे, और जहाँ इसकी सदस्यता बढ गयी, वहीं प्रैस्टिज या मान भी बढता गया, और उसी मात्रा में नौकरों का मनोबल और अपनी स्वतंत्रता का अवचेतन-बोध भी।
वाली-बॉल क्लब डॉ. आनन्द के और उनके नौकर के चण्डीगढ से चले जाने के बाद भी काफी समय तक चलता रहा। यह परम्परा अब लगभग सभी के लिए स्वीकार्य हो गयी थी। नये आने वाले निवासियों के लिए भी और उनके नौकरों के लिए भी। इस प्रकार, डॉ. आनन्द ने वैचारिक और सैद्धान्तिक रूप में और भाषण और लेखन में ही नहीं, व्यवहार में भी मानव-मुक्ति का एक छोटा सा बीज और संगठन और सहयोग का महत्त्व नौकरों के मन-मस्तिष्क में बोकर उसे पुष्पित होने की आधारभूमि बना दी थी।
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