निकला कितना दूर
पहले तुम था, आप हुआ फिर
अब हो गया हुजूर।
पीछे-पीछे चलते-चलते
निकला कितना दूर।
कद छोटा है, कुर्सी ऊँची
डैने बडे-बडे
एक महल के लिए न जाने
कितने घर उजडे
वयोवृद्ध भी ’माननीय‘
कहने को हैं मजबूर !
पूछ रहा मुझसे प्रतिक्रिया
अपने भाषण की
जिसको लिखकर पायी मैंने
कीमत राशन की
पाँव नही धरता जमीन पर
इतना हुआ गुरूर !
हर चुनाव के बाद आम
मतदाता गया छला
जिसकी पूँछ उठाकर देखा
मादा ही निकला
चुन जाने के बाद लगा
खट्टा होता अंगूर।
केवल यहाँ सरकार है
बिजली नहीं, पानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
इस राज की सानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
यह भूमि है देवत्व की
अजरत्व की, अमरत्व की
कर्ता नहीं, ज्ञानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
सदियाँ गयीं तटवास में
पैसा न कौडी पास में
धारा कभी जानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
शिक्षा, चिकित्सा, न्याय भी
है अपहरण व्यवसाय भी
होती है हैरानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
विश्वास की भाषा मरी
वरदान की आशा मरी
चलती है परधानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
देख गोबरधन
देख गोबरधन वर्दी कुर्सी
कपडों का सम्मान
और जोर से चिल्ला-
अपना भारत देश महान।
क्या है तेरे पास, कलम का
क्या है यहाँ वजूद ?
काला अक्षर देख, सभी हैं
लेते आँखें मूँद
इससे अच्छा तबला, घुंघरू
खेलों का मैदान
जिनके आगे दाँत निपोरे
पद्मश्री श्रीमान्।
निगल गया ’राबन‘ का चश्मा
गाँधी की ऐनक
अंधे बहरे ब्रह्मा से
क्या माँग रहा तू हक ?
रजनी-सजनी की किताब लिख
मत कर यहाँ गुमान
कविर्मनीषी सिर्फ यहाँ
अफसर, मंत्री धनवान।
कंकरीट के घने जंगलों में
बरसेगी आग
जीना है तो ढूँढ पेड की
छाँह, यहाँ से भाग
नंगा नाच देख रघुकुल का
वाल्मीकि हैरान
असली से नकली है मँहगा
जान, न बन अनजान।
जन्दगी
जन्दगी अभिशाप भी, वरदान भी
जन्दगी दुख में पला अरमान भी
कजर् सांसों का चुकाती जा रही
जन्दगी है मौत पर अहसान भी
वे जिन्हें सर पर उठाया वक्त ने
भावना की अनसुनी आवाज थे
बादलों में घर बसाने के लिए
चंद तिनके ले उडे परवाज थे
दब गये इतिहास के पन्नों तले
तितलियों के पंख, नन्ही जान भी
कौन करता याद अब उस दौर को
जब गरीबी भी कटी आराम से
गर्दिशों की मार को सहते हुए
लोग रिश्ता जोड बैठे राम से
राजसुख से प्रिय जिन्हें वनवास था
किस तरह के थे यहाँ इन्सान भी।
आज सब कुछ है मगर हासिल नहीं
हर थकन के बाद मीठी नींद अब
हर कदम पर बोलियों की बेडयाँ
जन्दगी घुडदौड की मानिन्द अब
आँख में आँसू नहीं काजल नहीं
होठ पर दिखती न वह मुस्कान भी।
पीटर्सबर्ग में पतझर
रात दिन झलते रहे
रंगीन पत्तों से
वृक्ष वे फिर भी रहे
मेरे लिए अनजान।
वे नहीं थे भोजवृक्षों
की तरह अभिजात
मानते थे वे वनस्पति की
न कोई जात।
पत्तियाँ उनकी सभी
होती कनेर-गुलाब
घोर पतझर में दिलाते
फागुनी अनुदान।
उड रहे हैं फडफडा
इतिहास-जर्जर पत्र
दिख रही पतझार की
आवारगी सर्वत्र।
डूबता दिन चंदगहना
चीडवन के पार
लडकियों के सुर्ख
गालों की तरह अम्लान।
गंगोजमन
और सब तो ठीक है
बस एक ही है डर
आँधियाँ पलने लगीं
दीपावली के घर।
हर तरफ फहरा रही
तम की उलटबाँसी
पास काबा आ रहा
धुँधला रही कासी।
मंत्रणा समभाव की
देते मुझे वे लोग
दीखता जिनको नहीं
अल्लाह में ईश्वर।
नाव जर्जर खे रही
टूटी हुई पतवार
अंग अपने ही कटे
शिवि की तरह हर बार।
हम चुकाते रह गये
गंगोजमन का मोल
रंग जमुना का चढाया
शुभ्र गंगा पर।
बँट रही मुँह देखकर
रोली कहीं गोली
मार गुड की सह रही
गणतंत्र की झोली।
बाँटते अँधे यहाँ
इतिहास की रेवडी
और गूँगे हम, बदलते
फूल से पत्थर।