www.khabarexpress.com : The news portal of North India
www.khabarexpress.com
Bikaner University Exam Results: M.Sc. (P) Physics (new) | M.Sc. (F) Geography (new) | M.Sc. (P) Geography (new) | M.A. (P) History (new) | M.Com. (P) ABST | M.A. (F) Rajasthani | M.Sc. (F) Bio Tech. |
Get Result Alert on your mobile, SMS JOIN khabarexpress to 567678.
Education Special

Education Directory
Exam Results
Who is Who

Article
Tutorial
Information
Quote

Can't see Hindi ?
Welcome Guest Sign In  New user! Sign Up Now | My Favourites (new)
Search Photo  
RSS Feed
09 July 2008
Forum | Wallpapers | Photo Gallery | Business | Entertainment | Education | Sports | Article | City |
Free News on your website
  सम्पादकीय
  बांसवाडा समाचार
  बीकानेर समाचार
  डूंगरपुर समाचार
  हनुमानगढ समाचार
  अर्न्तराष्ट्रीय समाचार
  जयपुर समाचार
  मेड़ता समाचार
  मुम्बई समाचार
  राष्ट्रीय समाचार
  प्रादेशिक समाचार
  श्रीगंगानगर समाचार
  सूरतगढ समाचार
  फोटो दीर्घा
  संग्रहण (new)
--------------------------
 
पुस्तक समीक्षा
 
वर्तमान मुद्दे
 
आर्थिक
 
सम्पादकीय
 
शिक्षा
 
परीक्षा परिणाम
 
प्रदर्शनी
 
खाना खजाना
 
हिन्दुओ के व्रत व त्यौहार
 
इतिहास
 
त्चरित टिप्पणी
 
प्रेरक प्रसंग
 
बातचीत
 
पत्रकारिता
 
व्यक्तित्व
 
दर्शन
 
राजनीति
 
धार्मिक
 
स्मरणांजलि
 
लघु कथाऐं
 
खेलकूद
 
पर्यटन
 
आने वाली फिल्म
--------------------------
  वर्तमान साहित्य
--------------------------
  मतदान
  कार्टून
  फोरम
  ई पत्र
  एस म एस
  वॉलपेपर
  स्क्रीनसेवर
--------------------------
  वर्घीकृत विज्ञापन
  Advertising With Us
  Online Advertising
  व्यापार निर्देशिका
  Rajasthan Webs
  Softwares
 
Hosting Package
  Web Design
 Vartmaan Sahitya :: June, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

बुद्धिनाथ मिश्र के गीत

Add comment    Mail this Story     Write to Editor
More Articles

बुद्धिनाथ मिश्र हमारे समय के ऐसे गीतकार हैं जिनके यहाँ जनचेतना के साथ गीतिकाव्य के सारे गुण मौजूद हैं। इनके गीतों में हमें युग की धडकन तथा साधारणजन की पीडा मिलती है। इनके गीतों में गेयता है। कोमल भाव हैं तथा जनविरोधी व्यवस्था के प्रति मुखर स्वर भी हैं। हमारे समय में एक पुस्तक लिखकर कोई भी महत्त्वपूर्ण नहीं बना किन्तु उन्होंने एक काव्य संग्रह द्वारा महत्त्वपूर्ण गीतकारों में अपना स्थान बनाया है। उनके यहाँ विषय की नवीनता तथा शिल्प में निरंतर बदलाव देखने को मिलता है। उनके पास एक किसान का मन है तथा एक संवेदनशील कवि-हृदय भी है। दोनों मिलकर उन्हें अन्य गीतकारों से अलग करते हैं। उन्होंने अपने गीतों में साधारण जन की पीडा उठायी है। जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन १९५३ में हो गया था किन्तु देहात अब भी इससे मुक्त नहीं हुए हैं। सामंती संस्कृति तथा उसकी कार्य-पद्धति आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। आज की पतनशील राजनीति में केवल सत्ता और धन महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। जनता के प्रतिनिधि किस प्रकार बडे सामंत बन जाते हैं, जनता इसे समझती है।
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र के गीतों में व्यंग्य का धारदार प्रयोग होता है। यही व्यंग्य गीतकार को रूप, सौन्दर्य एवं श्ाृंगार के परंपरागत चौखट से निकाल कर ’खुरदुरे मैदान में ले आता है। बुद्धिनाथ जी वर्तमान खुली बाजार व्यवस्था पर व्यंग्य करते हैं जहाँ राष्ट्रीय धरोहर, कोमल भावनाओं और मान-सम्मान को बेच दिया जाता है, शहीदों को नकार दिया जाता है। बुद्धिनाथ जी ने अपने गीतों में रूस की समाजवादी व्यवस्था के पतन के बाद का चित्र खींचा है। बाजारवाद की मार ने वहां भी समाज को झकझोर कर रख दिया।
’शिखरिणी‘ संग्रह के बाद बुद्धिनाथ जी की गीत-यात्रा निर्बाध रूप से आगे बढ रही है। उनकी दृष्टि और अधिक विस्तृत हुई है। वे जनसमस्याओं के चितेरे हैं किन्तु कविता के आधारभूत स्वरूप को बनाये रखते हैं। गीत की संवेदना और भावभूमि अक्षुण्ण रहती है। किन्तु यहीं उनका पडाव नहीं है।  बुद्धिनाथ जी की काव्य यात्रा चलती रहेगी और नयी ऊँचाइयों तक पहुंचेगी। -संपादक)
राजा के पोखर में

ऊपर ऊपर लाल मछलियाँ
नीचे ग्राह बसे।
राजा के पोखर में है
पानी की थाह किसे।

जलकर राख हुईं पद्मिनियाँ
दिखा दिया जौहर
काश कि वे भी डट जातीं
लक्ष्मीबाई बनकर
लहूलुहान पडी जनता की
है परवाह किसे।

कजरी-वजरी चैता -वैता
सब कुछ बिसराए
शोर करो इतना कि
कान के पर्दे फट जायें
गेहूँ के संग-संग बेचारी
घुन भी रोज पिसे।

सूखें कभी जेठ में
सावन में कुछ भीजें भी
बडी जरूरी हैं ये
छोटी-छोटी चीजें भी
जाने किस दल में है
सारे नरनाह फँसे।


निकला कितना दूर

पहले तुम था, आप हुआ फिर
अब हो गया हुजूर।
पीछे-पीछे चलते-चलते
निकला कितना दूर।

कद छोटा है, कुर्सी ऊँची
डैने बडे-बडे
एक महल के लिए न जाने
कितने घर उजडे

वयोवृद्ध भी ’माननीय‘
कहने को हैं मजबूर !
पूछ रहा मुझसे प्रतिक्रिया
अपने भाषण की
जिसको लिखकर पायी मैंने
कीमत राशन की

पाँव नही धरता जमीन पर
इतना हुआ गुरूर !

हर चुनाव के बाद आम
मतदाता गया छला
जिसकी पूँछ उठाकर देखा
मादा ही निकला

चुन जाने के बाद लगा
खट्टा होता अंगूर।


केवल यहाँ सरकार है

बिजली नहीं, पानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।
इस राज की सानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।

यह भूमि है देवत्व की
अजरत्व की, अमरत्व की
कर्ता नहीं, ज्ञानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।

सदियाँ गयीं तटवास में
पैसा न कौडी पास में
धारा कभी जानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।

शिक्षा, चिकित्सा, न्याय भी
है अपहरण व्यवसाय भी
होती है हैरानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।

विश्वास की भाषा मरी
वरदान की आशा मरी
चलती है परधानी नहीं
केवल यहाँ सरकार है।


देख गोबरधन

देख गोबरधन वर्दी कुर्सी
कपडों का सम्मान
और जोर से चिल्ला-
अपना भारत देश महान।

क्या है तेरे पास, कलम का
क्या है यहाँ वजूद ?
काला अक्षर देख, सभी हैं
लेते आँखें मूँद

इससे अच्छा तबला, घुंघरू
खेलों का मैदान
जिनके आगे दाँत निपोरे
पद्मश्री श्रीमान्।

निगल गया ’राबन‘ का चश्मा
गाँधी की ऐनक
अंधे बहरे ब्रह्मा से
क्या माँग रहा तू हक ?

रजनी-सजनी की किताब लिख
मत कर यहाँ गुमान
कविर्मनीषी सिर्फ यहाँ
अफसर, मंत्री धनवान।

कंकरीट के घने जंगलों में
बरसेगी आग
जीना है तो ढूँढ पेड की
छाँह, यहाँ से भाग

नंगा नाच देख रघुकुल का
वाल्मीकि हैरान
असली से नकली है मँहगा
जान, न बन अनजान।


जन्दगी

जन्दगी अभिशाप भी, वरदान भी
जन्दगी दुख में पला अरमान भी
कजर् सांसों का चुकाती जा रही
जन्दगी है मौत पर अहसान भी
वे जिन्हें सर पर उठाया वक्त ने
भावना की अनसुनी आवाज थे
बादलों में घर  बसाने के  लिए
चंद तिनके ले उडे  परवाज थे

दब गये  इतिहास के  पन्नों तले
तितलियों के पंख, नन्ही जान भी

कौन करता याद अब उस दौर को
जब गरीबी  भी कटी  आराम  से
गर्दिशों की  मार को  सहते  हुए
लोग  रिश्ता  जोड  बैठे  राम से

राजसुख से प्रिय जिन्हें वनवास था
किस तरह के थे  यहाँ इन्सान भी।

आज सब कुछ है मगर हासिल नहीं
हर थकन के बाद  मीठी नींद  अब
हर कदम पर  बोलियों की  बेडयाँ
जन्दगी घुडदौड  की मानिन्द  अब

आँख में  आँसू नहीं  काजल  नहीं
होठ  पर दिखती  न वह मुस्कान भी।


पीटर्सबर्ग में पतझर

रात दिन झलते रहे
रंगीन पत्तों से
वृक्ष वे फिर भी रहे
मेरे लिए अनजान।

वे नहीं थे भोजवृक्षों
की तरह अभिजात
मानते थे वे वनस्पति की
न कोई  जात।

पत्तियाँ उनकी सभी
होती कनेर-गुलाब
घोर पतझर में दिलाते
फागुनी अनुदान।

उड रहे हैं फडफडा
इतिहास-जर्जर पत्र
दिख रही पतझार की
आवारगी सर्वत्र।

डूबता दिन चंदगहना
चीडवन के पार
लडकियों के सुर्ख
गालों की तरह अम्लान।


गंगोजमन

और सब तो ठीक है
बस एक ही है डर
आँधियाँ पलने लगीं
दीपावली के घर।

हर तरफ फहरा रही
तम की उलटबाँसी
पास काबा आ रहा
धुँधला रही कासी।

मंत्रणा समभाव की
देते मुझे वे लोग
दीखता जिनको नहीं
अल्लाह में ईश्वर।

नाव जर्जर खे रही
टूटी हुई पतवार
अंग अपने ही कटे
शिवि की तरह हर बार।

हम चुकाते रह गये
गंगोजमन का मोल
रंग जमुना का चढाया
शुभ्र गंगा पर।

बँट रही मुँह देखकर
रोली कहीं गोली
मार गुड की सह रही
गणतंत्र की झोली।

बाँटते अँधे यहाँ
इतिहास की रेवडी
और गूँगे हम, बदलते
फूल से पत्थर।



Discuss this topic on KhabarExpress Forum  

  Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap

Special Edition
:
Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Bikaner Udyog Craft Mela