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13 October 2008
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अंतिम इच्छा
पद्मा राय

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बडी मुश्किल से बुआ जी की आँख लगी है। लगता है आज कुछ ज्यादा तकलीफ में ह-‘‘ रसोई के रोशनदान से छनकर आयी हुई आवाज दुलहिन की थी। वे सुन सकती थीं। आधी नींद में और आधी जगी हुईं अपनी आँखें बन्द करके बुआ जी लेटी थीं। किसी चलचित्र की तरह उनका पूरा जीवन उनके दिलो-दिमाग में घूम रहा था। वे अपने आप से ही बातें कर रहीं थीं-
’’तकलीफ तो हमें है, पर यह तकलीफ तो होनी ही थी। दुर्गा भवानी, भइया को खुश रखें, जिनके कारण यह तकलीफ आधी रह गयी है। खूब फलें-फूलें, यही हमारी कामना है। उन्होंने हमें कभी महसूस नहीं होने दिया कि वे हमारे बेटे नहीं हैं। किसे मालूम कि बेटा होने पर कोई सुख मिलता भी कि नहीं, परन्तु भइया ने बेटे से बढकर हमारी देखभाल की। आज सबरे ही वे देर तक हमारे पैताने बैठ हमारा हाल-खबर पूछते रहे। हमारी बडी फिकर है उनको। बीमारी लम्बी खिंच गयी है हमारी, इसीलिए भइया परेशान हैं। वे हमें बहुत मानते हैं। पिछले जनम जरूर कोई अच्छा कर्म हम किये होंगे, जो भइया हमारी जन्दगी में आये।
’’बीमारी-अमारी तो आती रहती है। जी भी बहुत चुके। अब ऊपर वाले का बुलावा, लगता है आन पहुँचा है। हम तो उसी दिन समझ गये थे, जिस दिन यूनिवर्सिटी के बडे डाक्टर आये थे। हमारी नाडी देखते ही उनके माथे की शिकन गहराने लगी थीं। आला लगाकर देखते समय उनका चेहरा कुछ ठीक नहीं लगा था।‘‘
हमसे पूछे भी, ’’बुआ जी ठीक तो हैं न ?‘‘
’’न जाने क्यों उस समय हम कुछ बोल नहीं पाये थे, केवल मुस्कुराने की कोशिश करते रहे।
’’डाक्टर साहब को बाहर तक छोडने भइया गये थे। लौटे, तब उनका मुह लटका था। हम क्या समझते नहीं ? अब इतने नादान भी नहीं रहे। पहाड सी उमर ऐसे ही नहीं बीत गयी। जाने कितनों ने इन्हीं आँखों के सामने जनम लिया और पता नहीं कितने परलोक सिधारे।
’’एक दिन मरना तो हमें है ही, कोई अमरित की घरिया पीकर तो आये नहीं थे कि अजर-अमर हो जाएँगे। अब ये तो नहीं मालूम कि अमरित जैसी कोई चीज होती भी है या नहीं। गूलर के फूल की तरह इसे भी किसी ने नहीं देखा। भगवान के घर अगर हमारी पूछ हुई है, तब जाना तो पडेगा ही। उसकी इच्छा सर्वोपरि है, यह तो सब जानते हैं। उस पर किस का वश है ?
’’छठी के दिन विधाता अपनी कलम से सबका भाग लिखते हैं। हमने अक्सर लोगों को कहते सुना है कि हम फूटी किस्मत के साथ पैदा हुए। लेकिन हमारा भाग भी तो उसी ने लिखा होगा, जो सबका भाग लिखता है और उस दिन जो लिख दिया होगा, वही हम अब तक जीते आये होंगे। उसकी लीला वही जाने, लेकिन अगर हमसे विधाता की कभी मुलाकात हुई, तब उससे एक बात हम जरूर पूछना चाहेंगे-कि आखिर उसने हमारा भाग ऐसा क्यों लिखा। लोग कहते हैं कि जैसी करनी, वैसी भरनी। लेकिन तब तो हमारी उम्र भी ऐसी नहीं थी कि हमने कोई पाप किया होगा। शायद अनजाने में कोई कर्म बिगड गये हों। या कि शायद पूर्व जनम का कोई फल मिला हो। अब ये सब कौन जाने ? कर्मों का हिसाब-किताब तो विधाता के पास ही होगा, उसी से पूछेंगे। पीछे मुडकर देखते हैं, तब समझ में आता है कि  कितना लम्बा जीवन पीछे छूट गया। लोग कहते थे कि अकले कैसे बिताएगी इतना लम्बा-पहाड जैसा जीवन ? पर बीत ही गया।
’’ब्याह का मतलब-वतलब तो तब हम जानते नहीं थे, लेकिन जब ब्याह हमारा हुआ था, उस दिन की कुछ बातें हमें अब भी याद हैं, लेकिन न तो हमें अपने मांग में सिंदूर पडने की याद है और न ही भांवरों के घूमने की। पंडित सात बचन पढकर सुनाते हैं और उसे अपने मन में गाँठ बाँधकर रखना होता है, लेकिन अपनी बारी में तो हम वो भी नहीं सुन पाये थे। नऊनियां की गोदी में गुडमुडया कर सोये पडे थे उस बखत हम। जब सब कारज खतम हुआ, तो वही हमें उठायी थी। हमारे पैर में झुनझुनी चढ गयी थी। जो सिंधोरा हम अपने हाथ में पकड कर बैठे थे, वो नींद में हमारे हाथ से छूट कर गोद में पहुँच गया था। कुम्भकरण जैसी नींद भी तो होती थी तब हमारी। जब हम खडे हुए, तो सिंधोरा गोद से उछल कर जमीन पर गिर गया था। हम हडबडा गये थे। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। सारी जमीन सेंदुर से लाल हो गयी थी। जिस अग्नि-कुण्ड के सामने भाँवरें पडीं थीं, कुछ सेंदुर उसमें भी गिर गया था। अब सबसे डाँट पडेगी, सोचकर हम बहुत डर गये थे। हम तो बच गये, लेकिन नऊनियां को खूब डाँट पडी थी। आजी और अम्मा तो अपने सभी देवता, पितरों को मनाने लगीं थीं। अपशकुन हुआ था। किसी अनिष्ट की आशंका से बाबूजी का भी मुँह उतर गया था।
अपशकुन था कि नहीं, नहीं जानती, लेकिन दूसरे दिन जब बारात वापस आ रही थी, तब जिसने एक दिन पहले हमारी मांग भर हमें अपनी ब्याहता बनाया था, उसे ही लू लग गयी थी और उसके घर पहुँची थी, उसकी मिट्टी। तब शादी ब्याह जेठ-वैसाख में ही ज्यादा होते थे और उस समय सूरज तपता भी बहुत है। हमारा लगन भी जेठ के महीने में ही हुआ था। लू के थपेडे दिन भर चलते थे।
’’अब जब सोचते हैं, तो समझ में नहीं आता कि उस समय की अपनी हरकतों पर हँसे या रोयें। हर तीज-त्यौहार पर चुडहारिन जरूर आती थी। आलता और नहन्नी लेकर नाऊन भी आती थी। चाची, भौजाई सभी रंग-बिरंगी चूडयाँ पहनते और फिर नऊनियां से अपने हाथ-पैर के नाखून कटवाकर आलता से अपने पैर रँगवाते। पैरों पर नऊनियां चिरई बनाती। हम पहले चुपचाप सबको यह सब करते देखते रहते और अपनी बारी का इंतजार करते, लेकिन जब हमारी बारी अंत तक नहीं आती, तब हम पूरा घर अपने सर पर उठा लेते थे और अड जाते कि हमें भी भर हाथ चूडी पहनना है और पैर रँगवाना है। अम्मा हमारे भाग को कोसती जातीं और धोती के छोर से अपनी आँखें पोंछती रहतीं। लेकिन बडे होते जाने के साथ-साथ हम सब कुछ अपने आप की समझ गये थे। अपने मन को दबाना हम सीख लिये थे। भौजी की कलाई में चूडयों के खनकने की आवाज सुनकर कलेजा टीसता था। मन मसोस कर हम अपनी कोठरी में घुस जाते थे। अपनी सूनी कलाइयों को देखते रहते और रोते रहते। मन हल्का करके, जब हम अपनी कोठरी से बाहर आते, तब चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं होता था, जिससे किसी को हमारी हालत का भान भी हो पाता। हमारी डंडे जैसी कलाइयों को देख अम्मा बहुत दुखी होतीं थीं। एक बार तो बाबूजी के सामने वो जिदिया गयीं। तभी हमारे लिये सोने की चार चूडयाँ बाबूजी ने बनवायीं थीं। वही चूडयाँ हमारे हाथ में अब भी हैं।
’’ससुराल में कैसे रहा जाता है, हमें इसका कोई अनुभव नहीं। होता भी कैसे, जब कभी ससुराल गये ही नहीं। बाबूजी ने जाने ही नहीं दिया। हम नइहर में अपनी पूरी जिन्दगी बिता जरूर दिये, पर मालकिन बन कर रहे। हमारी मर्जी सबसे ऊपर रही। पहले भगवान को भोग लगता और फिर हम खाने बैठते। अपने घर का क्यों पूरे गाँव में किसी के घर जच्चगी हो, मुंडन हो या कोई भी काज-परोजन हो, बिना हमारी राय के पूरा नहीं होता। घर की बडी तिजोरी की चाभी हमारे आँचल में हमेशा बँधी रहती। सबने बहुत मान दिया हमको। नइहर का सुख तो हम बहुत उठाये, अब रही ससुराल की बात तो जो हमारे भाग में ही नहंी लिखा था, वो भला हमें कैसे मिलता। राज किया हमने जीवन भर। मजाल नहीं किसी की, जो हमारी बात टाल जाय। कभी-कभी हमें न जाने क्या हो जाता था। हम पगलाने लगते थे। बिना वजह चिढने लगते थे। सारी दुनियाँ हमें तब अपनी दुश्मन लगने लगती थी। जब तक  हमारा दिमाग ठीक नहीं होता था, सब डरते रहते थे। कितनी बार तो केवल हमारे ही कारण घर में बवण्डर उठा। हमें पता है, मन ही मन प्रभा, अरे वही शेखर की दुलहिन, हमें खूब कोसती होगी। हम भी तो कई बार बिना कारण उस पर नाराज हो जाते हैं। बडकी दुलहिन सावित्री के सामने वो हमें अच्छी ही नहीं लगती। कई बार तो उसके सही काम भी हमें गलत लगते हैं। इस मामले में हम गलत हैं, यह हम जानते हैं, पर क्या करें ? अब तो चाहें भी, तो उसे ठीक नहीं कर सकते।
’’बहुत नेम धरम से रहे हम। पुरोहित जो पूजा-पाठ करने को कहते थे, वो सब हमने की। कोई कह तो दे कि हमने कोई ऐसा काम किया हो, जो हमारे लिए वर्जित हो। अब मरती दायीं भगवान झूठ न बुलाये, मन तो हमारा भी कई बार करता था सजने-संवरने का। लेकिन हमने अपनी कोठरी में आईना तक कभी नहीं रखा। बनारस चाली चाची बडी सुघड थीं। बडे घर की बेटी थीं। घर में सिंगारदान की कमी उन्हें खटकती। दिमाग भी क्या चलता था उनका। अपनी कोठरी में उन्होंने दीवार पर एक बडा सा शीशा टाँग दिया था। उसी से सिंगारदान का काम चला लेतीं थीं। एक बार हमें भी मौका मिला, जब हम उनकी कोठरी में किसी काम से गये थे और वहाँ उनकी सुहाग पिटरिया खुली देख लिये थे। वे वहाँ नहीं थीं। हम बस चुफ से, उसमें से एक टिकुली निकाल कर अपने माथे के बीचोंबीच चिपका लिये थे और फिर शीशे में अपने आपको कुछ देर निहारते रहे थे। उस दिन, हम बहुत देर तक रोते रहे थे। अम्मा ने बहुत पूछा था, लेकिन उनसे हम अपने मन की बात छिपाना तब तक सीख गये थे। भगवान हमें नरक में भी जगह न दे, जो हम झूठ बोल रहे हों। यह काम हमने बस वही एक बार किया था। लडकपन था, इसलिए ऐसी गलती हमसे हो गयी थी, अब इस गलती की चाहे जो सजा भगवान हमको दें।
’’अपनी जिम्मेदारी से हम कभी पीछे नहीं हटे। कब बडी-मुगौडी पडनी है, कितने आमों का पाल पडेगा, किस पेड के आम का कितना अचार पडना है, बगीचे में से बीने हुए आमों का क्या करना है-अमहर पडना है कि अमचूर बनवाना है, तालाब में से सिंघाडों को तुडवाया गया या नहीं-सब हमें ही फिकर करनी होती है। शादी-ब्याह के समय पितरों को निमंत्रित करना होता है, तब एक हम ही हैं, जिसे पितरों का नाम याद है। हमारे न होने पर क्या होगा ? तब ये सब कौन करेगा ? यही चिन्ता सताती रहती है। इस धरती पर जो आता है, वह अपनी मौत भी साथ में लिखवा कर आता है। उसे वापस जाना ही होता है। यही विधाता का दस्तूर है, प्रकृति का नियम है और परम सत्य भी है। यह सब जानते हैं। हम भी जानतें हैं और किसी के सगे के गुजर जाने पर, यही कह कर हम उसे दिलासा भी देते रहे हैं। इसके बावजूद, न जाने क्यों हमारा मन यह मानने को तैयार नहीं होता। अपनी गैरमौजूदगी में दुनियाँ की कल्पना करना भी मुश्किल है। भला ऐसा भी कभी हुआ है ? किसी के आने-जाने से कभी दुनियाँ रुकी है भला, जो हमारे न होने से रुक जाएगी ! अब तो जाना ही होगा। जाने की सोचकर कैसा-कैसा तो हो रहा है।
’’बुआ रो रही हैं!‘‘ कहती हुई फुल्लन उनकी आँखों के कोर पोंछ रही थी। फुल्लन पडोस में रहती थी और अक्सर उनका हाल-चाल लेने चली आती थी।
’’नहीं तो,‘‘ धीमी आवाज में बुआ जी बोलीं। पता नहीं कब और कैसे, उनकी आँखों के किनारे से पानी बह निकला था।
’’तकलीफ हो रही है ?‘‘ बडकी दुलहिन पूछ रही थीं।
’’नहीं। तकलीफ नहीं, बस ऐसे ही। जरा बिटिया हमारा बक्सा यहाँ मँगवा दो।‘‘
’’क्या करेंगी उसका ?‘‘
’’कुछ काम बाकी रह गया है, जरा उसे मँगवा दोगी।‘‘
’’अभी मँगवाती हूँ।‘‘
थोडी देर में बक्सा उनके सामने था।
’’मेरे सिरहाने इसकी कुंजी पडी है, जरा इसे खोलना फुल्लन।‘‘
फुल्लन ने बक्सा खोला। उस बक्से के खुलने की खबर सबको हो गयी थी। सब काम छोड-छाड, घर के सभी सदस्य वहाँ पहुँच गये थे।
’’इसमें एक छोटी सी तिजोरी है। बिटिया, जरा उसे हमें थमा तो।‘‘
फुल्लन उनके कहे अनुसार सब काम कर रही थी।
बडकी दुलहिन कुछ समझीं, बोलीं ’’अभी इसकी क्या जरूरत है बुआ जी। इस तिजोरी को फुल्लन, वापस बक्से में रख दो। यह सब कहीं भागा जा रहा है क्या ?‘‘
’’जरूरत है। यह काम तो करना ही है। फुल्लन तिजोरी खोल तो।‘‘ सधी, किन्तु धीमी आवाज में उन्होंने कहा। बुआ जी अपने गहने, एक-एक करके जब सबको बाँट चुकीं तब अंत में अपने हाथ में पहनी चूडयों को देखते हुए बोलीं,’’ये मेरे हाथ में चार चूडयाँ हैं। बाबूजी बनवाये थे, तब से मेरे हाथ में ही हैं। कभी निकाला नहीं। मरने पर दुलहिन इन्हें निकाल लेना और इसे बेचकर मेरे क्रिया-कर्म में तुम लोग लगा देना।‘‘
इस बीच फुल्लन उठी और बक्से को जहाँ से उठाकर लायी थी, वहीं ले जाकर रख आयी।
’’आप भी बुआ जी क्या कह रही हैं। हम लोग अब इतने गये-गुजरे भी नहीं।‘‘
’’नहीं, नहीं बिटिया, ऐसी कोई बात नहीं, पर हम नहीं चाहते कि हम अपने सिर पर किसी का कर्जा चढाकर इस दुनियां से विदा लें-‘‘कहकर उन्होंने अपनी आँखें दोबारा बन्द कर लीं। फिर किसी ने कुछ नहीं कहा और बुआ जी की नींद में खलल न पडे, इसलिए सब उस कमरे से बाहर आ गये।
’’लगता है अब बुआ जी के ज्यादा दिन नहीं बचे,‘‘ प्रभा बुदबुदाई।
’’भाई साहब कब तक आएँगे दीदी? जाने क्यों डर लग रहा है-‘‘प्रभा ने सावित्री से पूछा।
’’अब तक तो आ जाना चाहिए था,‘‘ कहकर बाहरी दरवाजे की तरफ सावित्री ने देखा।
तभी बाहरी दरवाजा खुलने की आवाज सुनायी दी। लगता है, कमला प्रसाद आ गये थे। सत्तर-पचहत्तर के तो होंगे ही, परन्तु बुआ जी उन्हें भइया कह कर ही बुलाती हैं और उनकी धर्मपत्नी सावित्री को दुलहिन। बुआ जी के बारे में सुनकर वे सीधे उनके पास पहुँचे। वे आँख बन्द करके लेटी थीं, किन्तु उनके पैरों की आवाज सुन कर बोलीं-
’’आ गये बचवा।‘‘
’’कैसा लग रहा है आपको ?‘‘
’’ठीक ही है। बस थोडी कमजोरी सी लग रही है।‘‘
’’कल डाक्टर तो आये थे, क्या कह गये?‘‘
’’कुछ खास नहीं। कह रहे थे बस थोडी कमजोरी है। खाने-पीने में भी अब परहेज करने की कोई जरूरत नहीं। लम्बी बीमारी ने आपको कमजोर बना दिया है। अब ठीक से खाना पीना करेंगी, तो ठीक हो जाएँगी,‘‘ कहकर वे कुछ अनमने से हो उठे और बुआ जी से नजरें बचाते हुए खिडकी से बाहर देखने लगे।
बुआ जी सब समझ रहीं थीं। उनका आखिरी वक्त नजदीक है।
’’जाओ थोडा तुम भी आराम कर लो। थके हुए लग रहे हो,‘‘ कहकर बुआ जी ने अपनी आँखें बन्द कर लीं। दो बातें करने में ही वे काफी थक गयी थीं। लम्बी बीमारी ने उन्हें कमजोर कर दिया था।
बडे कमरे में प्रभा-कमला प्रसाद के छोटे भाई शेखर की पत्नी-सावित्री के साथ धीमे-धीमे बात कर रही थी।
’’जीजी, लगता है बुआ जी अब नहीं बचेंगी, यह बात वे स्वयं भी समझ गयी हैं। इसीलिए शायद अपने जेवर-जेवरात उन्होंने हम सबमें बाँट दिये हैं।‘‘
’’हाँ, लगता तो कुछ ऐसा ही है।‘‘
’’मर जाएँगी तब घर में कितनी शान्ति रहेगी। कोई हर समय सीख देने वाला नहीं होगा। जैसे हमें तो कुछ आता-जाता नहीं,‘‘ प्रभा मुँह बनाते हुए बोली।
’’ऐसा नहीं कहते प्रभा।‘‘
’’क्यों ? क्या उनके कारण हर समय हमारी जान सूली पर अटकी सी नहीं लगती है?‘‘
’’वे हमें अपना समझतीं है, तभी तो कुछ कहती हैं।‘‘
’’आप की सहनशक्ति बहुत ज्यादा है जीजी, ‘‘कह कर प्रभा रसोई की तरफ चली गयी। उसका छोटा बेटा टनटन उसे आवाज दे रहा था। थोडी देर बाद ही, वह अपने हाथ में रसगुल्ले की कटोरी लिए बुआ जी के सामने पहुँच चुका था। वे सो रहीं हैं, इससे उसे कोई फकर् नहीं पडता।
’’उठो, दादी उठो,‘‘ टनटन था। बुआ जी की नींद से बोझल आँखें थोडी सी खुलीं।
’’क्या बात है टुन्नू ?‘‘
’’दादी देखो क्या खा रहा हूँ?‘‘
’’क्या है ?‘‘
’’रसगुल्ले, खाएँगी ? मम्मी ने क्षीर-सागर से मँगवाये हैं।‘‘
’’तुम खाओ।‘‘
रसगुल्ले खाता हुआ टनटन वहाँ से चला गया। उसके पैर एक जगह पर टिकते ही नहीं। एक पल यहाँ और दूसरे ही पल किसी और जगह।
बुआ जी ने फिर से अपनी आँखें बन्द कर लीं। किन्तु, अब उनकी नींद गायब हो चुकी थी। टनटन के हाथ में पकडी हुई कटोरी और उसमें रस भरा सफेद रसगुल्ला बार-बार उनकी आँख के सामने डोल रहा था। उन्होंने रसगुल्ला कभी नहीं खाया था। रसगुल्ला क्या, कोई भी चीनी की बनी मिठाई कभी नहीं खायी थी। खातीं भी कैसे ? कहते हैं कि चीनी बनाते समय गन्ने के रस की सफाई हड्डियों के चूरे से होती है।
’’कैसा स्वाद होता होगा इसका?‘‘ बहुत स्वादिष्ट होते होंगे, तभी तो टनटन को इतना पसंद हैं। हर दिन खाता है।‘‘
होठों पर जबान फेरती हुईं, वे उसका स्वाद महसूस करने की कोशिश कर रही थीं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। वे परेशान हो उठी। कोई सुनेगा, तो क्या कहेगा? अन्त समय, जब भगवान का नाम लेने का वक्त है, तब टनटन के हाथ की कटोरी याद आ रही है। जबान ऐंठ रही है। लगता है, जीवन भर की तपस्या बेकार होने को है। ये जनम तो बिगडा ही था, अब शायद अगला जनम भी जाएगा। पर करूँ, तो क्या करूँ ? आँख के आगे से ये हट जाये, इसके लिए भगवान से मनौती भी मान ली, किन्तु कहाँ ! ग्रामोफोन के घिसे हुए रिकार्ड की तरह सुई एक ही जगह जैसे अटक गयी थी और घडी के पेन्डुलम की तरह रसगुल्ले आँख के आगे डोल रहे  थे। इतना लम्बा जीवन उन्होंने कठोर नियमों में  बांधकर बिता दिया था। मांस-मछली तो दूर की बात है, उन्होंने तो लहसुन, प्याज, मसूर की दाल, चीनी और न जाने क्या-क्या कब का खाना छोड दिया था। लेकिन अब, इस समय, उन्हें न जाने क्या हो गया है? नियम-कायदा सब याद होने के बावजूद, उनका मन उसी को याद कर रहा है। सांसों की डोर जब छूटने को है, तब टनटन के हाथ में देखे हुए रसगुल्लों की याद सता रही है। अंत समय, राम नाम की जगह रसगुल्ले याद आ रहे हैं। कभी-कभी उनका आकार इतना बडा दिखने लग रहा है, जैसे पूरा ब्रह्माण्ड उसमें समा जाएगा। किससे और कैसे मांगूं ? हलक में आकर उसका नाम नहीं अटक जाएगा ? और सुनकर क्या सब मजाक नहीं बनाएँगे ? तब? बहुत देर तक वे इसी उधेडबुन में रहीं और फिर अचानक, उनके दिमाग में कुछ कौंधा और उनकी निस्तेज होती आँखें चमकने लगीं-
’’टनटन रोज रसगुल्ला खाता है और खाते समय एक बार मेरे पास जरूर आता है। कल भी आएगा तब उससे जरूर माँगूंगी।‘‘ वे अपने आपको सान्त्वना देते हुए सोने की असफल कोशिश करने लगीं। लेकिन नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी। ये रसगुल्ले तो, लगता है अभी उनकी जान ले लेंगे।
बहुत देर से बुआ जी को देखा नहीं, सोचकर शेखर उनके कमरे में गया, लेकिन वे सो रही थीं।
’’बुआ जी ने कुछ खाया?‘‘ वापस आकर शेखर ने प्रभा से पूछा।
’’सुबह थोडा सा मुसम्मी का जूस दिया गया था।‘‘
’’इस समय कुछ नहीं खाया ? चाय भी नहीं पी ?‘‘
’’नहीं। मैं बनाने जा ही रही थी।‘‘
’’थोडा रुको। मैं उनसे पूछ कर आता हूँ, शायद उनका कुछ और खाने का मन हो।‘‘
’’बुआ जी क्या खाएँगी? डाक्टर ने कहा है कि आपकी जो भी इच्छा हो वे खा सकती हैं।‘‘
शेखर के हाथों का स्पर्श अपने माथे पर महसूस करके बुआ जी ने अपनी आँखें खोलने की कोशिश की। उन्होंने सुना भी कि उसने अभी-अभी खाने के बारे में पूछा था। अचानक रसगुल्ले फिर से उनकी आँख के सामने जीवित हो उठे। अपने सिर को झटका उन्होंने, मानो रसगुल्ले को दिमाग से निकाल फेंकना चाहतीं हों। उन्हें लगा, जैसे उनका दिमाग फिर गया है। खाने के लिए रसगुल्ला माँगू! क्या ठीक होगा ? शेखर क्या सोचेगा ? तब क्या करूँ? टनटन का इंतजार करूँ ? लेकिन टनटन तो अब कल रसगुल्ला लेकर मेरे पास आएगा। तब तक अगर मुझे कुछ हो गया तो? मेरी जान तो जैसे उसी में अटकी है। रसगुल्ला खाये बिना तो मरने पर भी मुक्ति नहीं मिल पाएगी। आत्मा मृत्युलोक में ही भटकती रह जाएगी। पूरी जिंदगी तो व्रत-उपवास में बिताया ही  है, एक  रसगुल्ला  खा  भी लूँगी, तो क्या हो जाएगा ? सुधीजन कहते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना कुछ नही होता। तब क्या यह इच्छा भी ईश्वर ही हममें नहीं पैदा किये हैं? अब जो होना हो, सो हो। खुद को आश्वस्त किया उन्होंने और एक लम्बी सी सांस लेते हुए अपनी पूरी आँखें खोल दीं। सामने शेखर अभी भी खडा उनके कुछ कहने का इंतजार कर रहा था।
’’कुछ खाने की इच्छा है बुआ जी ?‘‘
’’जो भी इच्छा हो वह सब कुछ खा सकती हूँ क्या ?‘‘ थूक गटकते हुए उन्होंने शेखर से पूछा। इस क्षण उन्हें लोक-परलोक किसी का भी ध्यान नहीं था।
’’हाँ-हाँ क्यों नहीं ! सब कुछ खा सकती है। आप कहिए तो सही, क्या खाना चाहती हैं,‘‘ कहकर उसने दरवाजे के पास खडी प्रभा की तरफ देखा।
’’अभी थोडी देर पहले टनटन कुछ खा रहा था। कह रहा था कि उसकी मम्मी ने क्षीर-सागर से मँगवाया है।‘‘
एक क्षण के लिए वे रुकीं, लेकिन फिर लडखडाती जबान से उन्होंने कहा, ’’बेटा, वही मँगवा दो, बडा मन कर रहा है। पहले कभी नहीं खाया।‘‘ दीवार की तरफ मुँह करते हुए उन्होंने कहा और अपनी आँखें फिर से मूँद लीं। बडी मुश्किल हुई थी बुआ जी को इतना कहने में। खुलकर रसगुल्ले का नाम तो अभी भी नहीं बोल पायीं। शेखर से कहने में कितनी तो लाज आ रही थी, परन्तु रसगुल्ला खाने की ललक का वे क्या करें ?
दरवाजे के पास खडी प्रभा ने अपने दिमाग पर जोर डाला। उसे अच्छी तरह याद है, अभी थोडी देर पहले उसने टनटन को हर दिन की तरह रसगुल्ले दिये थे और वह खाता हुआ, बुआ जी के कमरे की तरफ ही आया था। साडी के पल्लू से अपना मुँह दबाकर, उसने अपनी हँसी रोकने की कोशिश की।
’’क्या खा रहा था टनटन? मैं समझ नहीं पा रहा कि बुआ जी किस चीज के लिए कह रही हैं ?‘‘ शेखर ने धीरे से प्रभा के नजदीक जाकर पूछा।
’’रसगुल्ला,’’ कहते हुए प्रभा अपनी हँसी दबाती हुई सावित्री के कमरे की तरफ भागी। कितनी मजेदार बात है, जीजी को जरूर बताएगी।
’’श्.. श्.. श्.. तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?‘‘ फुसफुसाते हुए शेखर ने कहा, लेकिन प्रभा उसकी बात सुनने के लिए वहाँ कहाँ रुकी।
’’बुआ जी की अंतिम इच्छा !‘‘ आश्चर्य से शेखर की आँखें फैल गयीं। बुआ जी की तरफ उसने अविश्वास भरी नजरों से देखा, उनका चेहरा दीवार की तरफ था। वह धीरे से मुस्कुराया।
’’अभी मँगवाता हूँ,‘‘ कहकर शेखर वहां से चला गया।
उनकी आँखें बन्द थीं। लेकिन उनका दिल बहुत तेजी से धडकने लगा था। अब वे उस पल का इंतजार कर रहीं थीं, जब उनके सामने रसगुल्ला होगा और वे उसका स्वाद ले पाएँग। देर हो रही थी, क्या पता शेखर न लाये। लेकिन  ऐसा नहीं हुआ। थोडी देर बाद ही, अपने हाथ में रसगुल्ले की कटोरी लेकर शेखर उनसे कह रहा था-
’’बुआ जी, उठिए।‘‘
’’कौन?‘‘
’’मैं शेखर, लीजिए रसगुल्ला लाया हूँ।‘‘
’’ले आये बेटा?‘‘ मन ही मन उन्होंने शेखर को आशीर्वाद दिया।
’’हाँ बुआ जी,‘‘ शेखर ने सहारा देकर उन्हें उठाते हुए कहा।
बुआ जी की नजरें रसगुल्ले की कटोरी पर जाकर चिपक गयीं। अपने पापा के बगल में खडा टनटन कब से उनकी तरफ बडी उम्मीद से देख रहा था कि दादी उसकी तरफ एक बार देखें, तो वह भी उसमें अपना हिस्सा लगवाये। उसे रसगुल्ले बहुत प्रिय हैं, यह बात दादी जानतीं हैं। कुछ ही मिनटों बाद बुआ जी तकिये का सहारा लेकर अपने बिस्तर पर बैठीं, शेखर के हाथ से रसगुल्ला खा रही थीं। टनटन ने रसगुल्लों की उम्मीद छोड दी थी और थक-हार कर, दादी से नाराज होकर बाहर चला गया था और उसी कमरे की खिडकी और दरवाजे के बाहर से उस घर के बाकी सभी प्राणी मुंह बाये, उन्हें