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आसमान का चेहरा थकान से लाल होकर हाँफने लगा था। धरती के शोर ने और उजाले के आखिरी छोर ने उसका रंग बदल दिया था। सूरज का गोला क्षितिज के दलदल में फँस गया था, जो लगातार नीचे धँसता जा रहा था। उसकी लाचारी से उदास चिडयों ने अपने शोर से आसमान को काला कर दिया। धरती के पिच को बचाने के लिए रात की चादर तान दी गयी थी, जिससे रोज की तरह अगले दिन का खेल भी जारी रह सके। धरती के उजाले के खिलाडी, रात होते ही अँधेरे के भूकम्प से बचने के लिए अपने शरण-स्थल की ओर दौडने लगे थे।
दौड वह ट्रेन भी रही थी-अँधेरे की पगडण्डी पर। आसमान की तरह वह भी हाँफ रही थी। सिस्टम और कुछ अशिष्टतम लोगों की छेडखानियों के कारण समय के पीछे रह जाने की विवशता से, वह इस वक्त पीछा करते हुए समय को पकडने को आतुर थी। वह पकड भी लेती, पर समय को रुकना नहीं था और उसे बार-बार रुकना पडता था। अँधेरी रात में इस तरह ठौर-बेठौर रुकने को मजबूर करना अच्छी बात नहीं थी। अपनी बेचैनी वह सीटी की तेज चीखों में व्यक्त करती रहती थी, जिसकी गूँज खेतों और गाँवों से होती हुई आसमान में गुम हो जाती थी।
भागती हुई ट्रेन ने एक तेज सीटी मारी और रास्ते में रुक गयी। ट्रेन में बैठे लोगों ने तेज धुकधुकी जैसी हरकत करते हुए पाया कि उनकी ट्रेन को आगे बढने के लिए सिगनल नहीं मिला था। वहाँ से स्टेशन ज्यादा दूर नहीं था, पर नजदीक भी नहीं था। लोगों की बेचैनी गन्दे पानी की तरह फैलने लगी। आसपास के गाँवों के उतावले लोग वहाँ उतरने लगे। वे लोग, जो घण्टे-आध घण्टे पहले बैठने की एक सीट के लिए लड रहे थे, वे अब उतरने के लिए औरों को धकियाने पर तुल रहे थे। लोगों की ऐसी हडबडी इस परम इत्मीनान वाले देश में आश्चर्यजनक ही कही जा सकती है।
अँधेरे ने ट्रेन को न सिफर् दबंग हिजडों की तरह घेर रखा था, बल्कि बेहयाई से दूर तक अपना लहँगा भी पसार रखा था। अँधेरे को ठेलते हुए, पास के कुछ गाँववाले अपनी-अपनी गठरी और धोती सँभाल कर ट्रेन से उतरने लगे। सीढयों से नीचे रोडयों का असमतल यथार्थ था, जिस पर पाँव धरकर लोग लाइन की बगल की डण्डीनुमा पगडण्डी पर पहुँचे, जो माफिया की तरह डरावनी थी। उस पर चलते हुए, किसी के बिवाई-भरे पाँवों में मोच आयी, तो कोई मजबूत इरादों के बावजूद ठोकर खाकर गिरा। मंजल के पास आकर कुछ लोग गिरते भी हैं, यह कोई नयी बात नहीं थी। बस फकर् यही था कि कुछ लोग गिरते हैं, तो वहीं बिछ जाते हैं और कुछ ऐसी जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ उन्हें खुद अपनी ख्ाबर नहीं मिलती, जैसा अभी एक भारतीय आत्मा के साथ हुआ, जिसकी पवित्र कथा, काल के इस अपवित्र माहौल में मैं सुना रहा हूँ।
उस वक्त वहाँ जो लोग मौजूद थे, उन सबके कानों में एक धप्प की आवाज आयी। लोगों के चौंकने के पहले ही उन्हें चौंकाते हुए एक चीख्ा सुनाई दी-’’अरे बाप रे ! मर गये रे ! अरे ओ किसुनवा, जरा हमें निकारो, हम इहाँ गिर पडे हैं।‘‘
कुछ पल आवाज सुनाई नहीं पडी, तो उस गिरे हुए ने फिर ताकत से गुहार की-’’अरे ओ किसुनवा हमें निकारो।‘‘
अँधेरे से एक दूसरी आवाज साँड की तरह घबराहट में दौडती हुई आयी-’’कहाँ गिर पडे ? बुढापे में साथ छोडकर छिनरिया की तरह छिटकोगे तो यही होगा।‘‘
’’हम यहाँ गड्ढे में गिर पडे हैं। हाय राम ! इस गड्ढा करने वाली की जवानी में दरोगा लग जाए।‘‘
’’गड्ढा ? यह गड्ढा कितना बडा है ?‘‘
’’बहुत बडा। बिलकुल पहलवान गड्ढा है। अकेले निकलना हमारे बस में नहीं।‘‘
’’तब ददा ! हम तुम्हें अकेले कैसे निकालें ?‘‘ किसुन ने कहा।
’’बुला लो भैया अउर लोगों को,‘‘ बूढे मिसिर ने चिरौरी की।
किसुन ने हाँक लगायी-’’अरे बडे-छोट भाई लोग। सुकुलपुर के बुढऊ मिसिर गड्ढे में गिर पडे हैं। जरा आकर उन्हें निकालने में मदद कर दें।‘‘
मगर वह गुहार अँधेरे में भटक गयी। लगा, वह खुद किसी गड्ढे में गिर पडी हो। जाडे की रात। अँधेरा व्यभिचारियों, चोरों, दलालों और कवियों के लिए मुफीद। बूढों और बेराजगारों के लिए ऐसी रातें सन्ताप का कौडा तापने की मजबूरी बनकर आती हैं। पता नहीं, किसी ने किसुन की आवाज सुनी कि नहीं। जिसने सुनी भी, उसने अनसुनी कर दी। वैसे भी गड्ढों से निकालने वाले लोग बिरले ही होते हैं। अफसोस, सरकार ऐसे लोगों को बचाने का कोई उपाय नहीं करती।
किसुन ने देखा, कोई नहीं आया। उसे महात्मा गाँधी के जल्दी मर जाने का अफसोस हुआ। फिर, उसे बूढे मिसिर पर भी बहुत गुस्सा आया। उसने कहा, ’’ददा, सब तुम्हारा नाम सुनकर ऐसे भागे, जैसे गंगा तिवारी की बुढापे की बीवी बिजली भागी थी।‘‘
मिसिर ने कहा, ’’वक्त-वक्त की बात है। हम गड्ढे में मजबूर पडे हैं। पता नहीं इस देह का कौन पुर्जा सलामत है, कौन टूटा। अब बताओ भैया, लाइन किनारे गड्ढा खोदने का कौन-सा तुक है और इसमें गिरना भी था, तो हमीं को था। सब तकदीर और सरकार का खेल है। दोनों पार्टी ने हाथ मिला लिया है।‘‘.... मिसिर कुछ पल चुप रहकर काँखे। बोले, ’’जा बेटा झटपट गाँव चला जा। लोगों को प्रेम से मना कर ले आ। जब विपत्ति में आदमी हो, तो मीठा बोलना चाहिए। इस वक्त शीरे की तरह खूब मीठा बोलना। मौका हो तो गुड बने रहने में भलाई है। जा बेटा ले आ सब लोगों को।‘‘
किसुन ने कहा, ’’घबराओ मत, जा रहे हैं। ठीक से बताओ, हाथ-पाँव तो सलामत हैं ?‘‘
’’अभी तक तो हैं। आगे की भगवान जाने।‘‘-मिसिर ने दार्शनिक की तरह कहा। किसुन चला गया। मिसिर ने एक गहरी साँस ली। आसमान के अँधेरे का कुछ हिस्सा उसके भीतर के अँधेरे में चला गया। मिसिर गाँव में अकेले ही रहता था। वैसे भी शहर में अपने बेटों-बहुओं से उसकी पटती नहीं थी।
गाँव उतना ज्यादा दूर नहीं था, पर अँधेरे में किसुन को लग रहा था कि वह काफी दूर चला गया था। वह इस तरह टटोलता हुआ बढ रहा था, जैसे कोई नौजवान चिन्तातुर होकर अपनी सम्भावनाएँ टटोलता है या कामातुर होकर स्त्री के बदन को। तभी उसे एक ठोकर लगी। मगर महँगाई के झटके की तरह उसने अपने को सँभाल लिया। किसुन ने सोचा, सब संयोग की बात है। वह जल्दी से जल्दी अपने घर पहुँचकर आराम करना चाहता था, गाँव के पास गाडी खडी होते देखकर उसकी बाँछें खिल गयी थीं, वह हडबडाकर उतरा भी था। गाँव के और संगी-संबंधी आगे बढ गये थे। मगर वह मिसिर के चक्कर में पड गया। ऐसे मिसिर के चक्कर में, जिनके चक्कर में कोई पडना नहीं चाहता। डेंगू के मच्छर की तरह लोग मिसिर से बचते थे। मगर किसुन का मन बूढे मिसिर को इस तरह असहाय छोडकर जाते नहीं बना। लिहाज ने उसे फँसा दिया।
किसुन जब अपने गाँव पहुँचा, तब गाँव खर्राटे भर रहा था। वैसे भी गाँवों में रात जल्दी होती है। शहर की रातें लोगों की इच्छा पर शुरू होती हैं। रातें वहाँ गुलाम होती हैं, पर गाँवों में नहीं। वहाँ रातों का अनुशासन होता है। गाँवों में वे माफया की तरह व्यवहार करती हैं।
जाहिर है, किसुन के गाँव में सब सो चुके थे। पर उसकी भाभी जाग रही थी। वह किसुन से भी ज्यादा किसुन के भैया के सन्देशे के इन्तजार में थी। किसुन का भाई शहर में नौकरी करता था। मामूली। मगर वह नौकरी उसकी मजबूरी थी। किसुन अपने भाई से मिलने शहर गया था। जब जरूरत पडती, जाकर मिल आता। शहर से लौटते हुए किसुन अपनी भाभी के लिए कुछ सामान लाया था, जो उसके भाई ने दिया था। किसुन ने भाई की राजी-खुशी की ख्ाबर के साथ वे सामान भाभी को थमा दिये। भाभी ने पूछा, ’’तुम्हारे भैया ने घर आने के बारे में भी कुछ कहा है?‘‘ किसुन ने कहा, ’’छुट्टी नहीं मिलती। मगर मौका लगते ही आ जाएँगे।‘‘ किसुन की भाभी फिर कुछ नहीं बोली। अपने सामान सहेजकर सपाट चेहरे से अन्दर वाली कोठरी में चली गयी। किसुन ने कमरे में धीमे उजाले वाले उस लालटेन की ओर देखा, फिर एक गहरी साँस ली। गाँव में बिजली के तार आ गये थे। मगर बिजली अभी घरों में नहीं आयी थी। वहाँ अभी लालटेन की रोशनी में ही लोग आगे बढ रहे थे।
अचानक किसुन हडबडाकर उठा। उसने कहा, ’’भाभी, दरवाजा बन्द कर लो। मैं निकल रहा हूँ, जरूरी काम है। अपने रामलोचन मिसिर गड्ढे में गिर पडे हैं, स्टेशन के पास। मुझे अभी कुछ लोगों को लेकर वहाँ पहुँचना है।‘‘
भाभी के मुँह से ’हाय राम‘ की आवाज निकली। बोलीं, ’’खाना खाकर जाते। इसमें भी काफी वक्त लग जाएगा। रात में इस गाँव में पता नहीं, कौन साथ जाए। सब कठकरेज हो गये हैं।‘‘
किसुन ने कहा, ’’खाना लौटकर खाऊँगा। अभी खाते नहीं बनेगा।‘‘ कहकर वह बाहर चला गया। भीतर कोठरी में एक गठरी रखी हुई थी। अब वह हिली और किसुन की माँ बनकर बोली, ’’बहुरिया, किसुन शहर से आ गया है क्या ?‘‘
बहू बोली, ’’हाँ, लाला आये जरूर थे, मगर अब परोपकार करने निकल गये हैं। खाना भी नहीं खाया।‘‘ गठरी कुछ देर तक बडबडाती रही। फिर दिये की तरह आवाज बुझ गयी और कुछ देर धुआँ निकलता रहा।
किसुन गाँव के बन्द घरों का दरवाजा खटखटाने लगा। हाँक भी लगायी। मगर जल्दी कोई आवाज नहीं आयी। हर घर में आवाज पर पहरे लगे थे। फिर भी दो-चार लोगों ने जवाब दिया। कुछ घर के विद्रोही बाहर भी निकले।
उधर मिसिर को गड्ढे में पडे-पडे ऊब भी होने लगी। आसमान में सितारे निकल आये थे, जो उस गड्ढे से नजर आ रहे थे। मिसिर उन सितारों को एकटक देखता रहा। वह उन सितारों में खो गया। बचपन से वह उन सितारों को देखता आया था। मिसिर की माँ ने उसे उन सितारों से परिचित कराया था। वह रहे सप्तर्षि ! उनके नाम भी मिसिर जानता था। और वह रहा कोने में ध्रुव। कैसा चमकदार तारा है। मिसिर एक-एक सितारे को देखने लगा और उनके नाम याद करने लगा। और हाँ वह अरुन्धती भी नजर आ रही है। मिसिर की निगाह अरुन्धती तारे पर टिक गयी।... उसके जीवन म भी कभी एक अरुन्धती आयी थी। विधवा थी। मिसिर उसके पीछे पड गया। तभी पहली बार गाँव में उसकी थू-थू हुई थी। अरुन्धती ने बदनामी के डर से आत्महत्या कर ली थी। मिसिर को भी उसके घर वालों के कोप से शहर भागना पडा था। तब मिसिर को पहली बार अपनी माँ से बिछुडने का बडा दुख हुआ था। मिसिर अपनी माँ को बहुत चाहता था। हालाँकि माँ की अच्छी बातों का उस पर ज्यादा असर नहीं होता था, फिर भी उसने जीवन में जो भी भले काम किये, माँ के कारण ही किये। इस वक्त मिसिर को अपनी माँ की बहुत याद आयी। उसने सोचा, उसकी माँ आज जन्दा होती, तो यह ख्ाबर सुनकर क्या करती।.... अचानक मिसिर की आँखों में आँसू आ गये। उसने जो चोटें माँ के दिल को पहुँचायी थीं, उसे आज पहली बार मिसिर ने खुद महसूस किया। माँ की बात न मानकर, आज वह गिरते-गिरते किस गड्ढे तक आ पहुँचा था।
अचानक उसके मन में क्या आया, वही जाने। मिसिर जोर से चिल्लाने लगा-’’भैया, इधर एक गड्ढा है, बहुत बडा। सँभलकर जाना। मैं सँभल नहीं पाया, गिर पडा। मैं सुकुलपुर का मिसिर हूँ। इधर मत आना ख्ातरा है।‘‘
उधर से कोई आदमी गुजरा तो नहीं। रात में कौन गुजरता। पर मिसिर चिल्लाकर उसी तरह सतर्क करता रहा। हाँ दो-चार कुत्ते जरूर उधर से गुजरे। मिसिर की आवाज सुनकर वे सतर्क हो उधर से हट गये और जोर से भौंकने लगे। मिसिर की आवाज दब गयी। वह कुत्तों को गाली देने लगा। इन सबसे एक अच्छी बात यह हुई कि मिसिर की देह गर्म हो गयी। मौसम की ठण्ड उससे दो हाथ दूर सरक गयी थी।
मिसिर अब थक गया था। वह उन भौंकने वाले कुत्तों की तरह ही हाँफने लगा था। मिसिर को लगा, अब वह वाकई बूढा हो गया। कुछ घण्टे पहले ट्रेन से उतरते वक्त, उसे यह बात याद नहीं थी। वह जवानों जैसा जोश महसूस कर रहा था।
मिसिर को कुछ देर बाद किसी के हँसने की आवाज आयी। मिसिर चौंककर खडा हो गया। फिर अगले ही क्षण वह डर के मारे वहीं बैठ गया और काँपने लगा।
अगले ही क्षण मिसिर जोर से चिल्लाया-’’बचाओ, बचाओ*! इस गड्ढे से मुझे बचाओ। सावधान, इधर गड्ढा है।‘‘
तभी अँधेरे में किसी की आवाज आयी। आकाशवाणी की तरह-’’अरे कौन गिर पडा गड्ढे में! क्या ज्यादा चढा ली है आज?‘‘
’’मैं पीता नहीं भैया।‘‘
’’कौन नहीं पीता। सबको पीना पडता है, भैया सबको! सब पीते हैं-कभी खून के घूँट, तो कभी गम के आँसू। हर आदमी पीता है यहाँ, चाहे जन्दगी के गड्ढे में पडा हो, चाहे बाहर! खैर, यह सब छोडो ! अब बताओ भैया, गिरे कैसे ?‘‘
मिसिर ने विस्तार से बता दिया। साथ में अपना नाम भी।
’’तो क्या तुम सुकुलपुरा वाले मिसिर हो ?‘‘
’’हाँ, हाँ, वही।‘‘
’’अरे वही जिसने पारसाल अपने हलवाहे को ऐसा मारा था कि वह जन्दगी भर के लिए लंगडा हो गया।‘‘
मिसिर चुप। सोचा, कुछ बोलें पर बोल नहीं फूटे।
उस आदमी ने फिर कहा, ’’उसकी बेटी को तुमने गाली दी थी। उसी का उसने बुरा माना था। उसी का विरोध किया था उसने। अब बिटिया को गाली दोगे तो बाप बोलेगा ही।‘‘
इस बार मिसिर ने जोर से कहा, ’’कौन हो तुम?‘‘
कोई आवाज नहीं आयी। आसपास कुत्ते जरूर भौंकने लगे।
मिसिर ने कुछ देर इन्तजार किया। उसके मन में हल्की सी उम्मीद थी। फिर कुछ देर बीतने के बाद, वह निराश होकर चिल्लाने लगा-’’अरे कोई है, मुझे निकालो।‘‘ जैसे-जैसे रात की ठण्ड बीमारी की तरह बढ रही थी, उसकी हडबडाहट भी बढ रही थी-’’मुझे निकालो।‘‘
घनघोर निराशा के दौर में फिर किसी की आवाज आयी-’’कौन चिल्ला रहा है ? कहाँ गिरे पडे हो ?‘‘
’’मैं हूँ मिसिर ! सुकुलपुर का रामलोचन मिसिर!‘‘
’’अरे रामलोचन मिसिर !‘‘
’’पहचानते हो मुझे?‘‘ मिसिर के मन में आशा जगी।
’’नहीं पहचानूँगा ? तुम्हारे जैसा बात-बात में जनेऊ की झूठी कसमें खानेवाला और कौन है?‘‘
’’नाहक काहे गरियाते हो? कौन हो तुम ?‘‘-मिसिर ने खीजकर पूछा।
जवाब में आवाज ने कहा, ’’तुमने हरसवा के ख्ालाफ अदालत में झूठी गवाही नहीं दी थी?‘‘
’’मैंने ? क्या बकते हो?‘‘
’’बक नहीं रहा। तुम खुद भी याद करो-चार साल पहले। तुम्हारी झूठी गवाही से बेगुनाह हरसवा को सजा हो गयी थी। उसका परिवार उजड गया। क्या गलती थी उसकी? वह भूमिहीनों के हक के लिए आवाज उठाता था, यही न ?‘‘
’’कौन हो तुम ?‘‘-मिसिर गड्ढे से तिलमिलाकर चीखा।
कोई जवाब नहीं आया। अचानक चारों तरफ सन्नाटा छा गया। कोई फिर हँसा, लकडबग्घे की तरह।
एक आवाज आयी-’’अरे मिसिर, गिर कैसे पडे?‘‘
मिसिर ने कहा, ’’नजर का फेर समझो, गिर गये।‘‘
क्षण भर की ख्ाामोशी के बाद उस आदमी ने बेहद ठण्डे गले से कहा, ’’याद है, एक बार मेरी बेटी भी नजर के फेर में तुम्हारे बेटे से धोखा खा गयी थी। उसे गर्भ रह गया था। हमने तुम्हारे हाथ-पाँव जोडे। कहा, मिसिर, इसे तुम अपने घर की बहू बना लो। पर तुमने इनकार कर दिया। मुझे पूरे गाँव की जात-बिरादरी की नजरों से गिरा दिया। मेरी बेटी बर्दाश्त नहीं कर पायी। वह कुएँ म कूद गयी। तुमने उसे गिरा दिया। मुझे भी ख्ात्म कर दिया।‘‘
’’मैंने किसी को नहीं गिराया। तुम झूठ बोलते हो।‘‘ मिसिर ने जोर से कहा।
वह ठठाकर हँसा-’’तुम्हें भी एक दिन गिरना ही था मिसिर ! अब यहीं पडे रहो। अपने कर्मों का फल भोगो।‘‘
अचानक वहाँ ठण्डी ओस-सा सन्नाटा छा गया। लगा किसी ने बर्फीले पानी का पोंछा मार दिया हो।
मिसिर का बुरा हाल था। वह पूरी ताकत से सहायता के लिए चिल्लाया। चिल्लाते-चिल्लाते उसका गला बैठ गया। घोर निराशा में मिसिर भी उसी तरह बैठ गया। फिर उसे झपकी आ गयी।
रात अपनी चाल से चल रही थी। उसकी अँधेरे की साडी भी धीरे-धीरे किसी दुःशासन द्वारा खिंचती जा रही थी। वस्त्र-हरण का एक महाभारत जैसे रचा जा रहा था रात में।
एक समय आया, जब अंधेरा खेत मजूरन की तरह झीना पड गया। सुबह के अंग झलकने लगे थे। उसमें बहुतों को नयी सम्भावनाएँ नजर आ रही थीं। सुबह आती भी है हमेशा नयी सम्भावनाएँ लेकर।
मिसिर एक बार पूरी ताकत से चिल्लाया-’’मैं मिसिर हूँ। मुझे इस गड्ढे से बाहर निकालो। रात से इसी में पडा हूँ।‘‘
तभी गड्ढे के बाहर से किसी की आवाज आयी-’’अरे ऐसे क्यों चिल्ला रहे हो मिसिर ! हम लोग तुम्हारी मदद को आ ही रहे हैं। ससुर अपनी रात खराब की और हमारी भी खराब कर*दी।‘‘
मिसिर को लोगों के आने की आहट मिली। ऊपर शोर जैसा हो रहा था।
तभी किसुन ने ऊपर से झाँककर कहा, ’’हम आ गये हैं दादा ! देखो कितने लोग आये हैं।‘‘ मिसिर के दिल को ठण्डक पहुँची। यह रात की ठण्ड से अलग थी।
उसे सन्तोष हुआ, जल्दी ही बाहर निकल आएगा।
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