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30 August 2008
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पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने अनेक विवादों को जन्म दिया है। पति संतान चाहता है, पत्नी संतान नहीं चाहती। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पति को तलाक की अनुमति प्रदान की है।
मेरा मानना है कि इसे स्त्री अधिकारों के सन्दर्भ में देखने के साथ-साथ पति-पत्नी के सामान्य सामाजिक दायित्व के रूप में देखने की जरूरत भी है। संतान के बारे म पति-पत्नी आपसी सहमति से ही कोई फैसला ले सकते हैं।
सच तो यह है कि औरत हमारे समाज में सिर्फ भोग की वस्तु समझी जाती रही है। मनुस्मृति से लेकर तमाम दूसरी स्मृतियाँ, संहिताएँ लगातार इसी सामाजिक नियम की पुष्टि करते रहे हैं। समस्त धर्मों के धार्मिक ग्रंथ औरत को अपनी इसी स्थिति से अवगत कराते रहे हैं। तसलीमा नसरीन ने बहुत साहस के साथ अपनी पुस्तक ’औरत के हक में‘ में समस्त धार्मिक पुस्तकों से उद्धरण दिये हैं जिसमें औरत का यह प्रथम और अंतिम कर्तव्य है कि वह अपने पति (स्वामी) को सदैव खुश रखे और जब भी वह उसे भोगना चाहे, इन्कार न करे क्योंकि यही उसका धर्म है, यही कर्तव्य है।
भोग के आनन्द के इस दर्शन ने आदमी को जानवरों की श्रेणी  में  ला दिया।  बाल-विवाह का विरोध करने वाले ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और उनके ब्रह्म समाज आन्दोलन का हिन्दू  समाज  ने  भरपूर विरोध किया। दस ग्यारह साल की बच्चियों से विवाह रचाने वाले पुरुषों ने बाल-विवाह पर रोक लगाने को समाज में व्यभिचार की संज्ञा दी और खुद अपने व्यभिचार को अनदेखा किया। उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दौर में १० वर्ष की फूलमनी जो विवाह की पहली ही रात रक्तस्राव से मर  गयी,  उस  को  बाल-विवाह  विरोधियों ने मुद्दा बनाकर आंदोलन किया तो कट्टरपंथियों के विरोध के कारण विवाह की उम्र केवल दस से बढाकर ग्यारह वर्ष की जा सकी। कितने विरोधों का सामना किया गया होगा जब हरविलास शारदा एक्ट में कन्या के विवाह की उम्र १४ और फिर १६ वर्ष कराई गयी।
इसके पीछे सामंती समाज की स्त्री के प्रति भोगवादी मानसिकता ही रही है। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की क्राँतिकारी लेखिका रशीद जहाँ ने अपने नाटक ’पर्दे के पीछे‘ में बहुत मार्मिकता से स्त्री की इस विडम्बना को प्रस्तुत किया है जहाँ मुहम्मदी बेगम कहती है कि उसके शौहर को इससे कोई मतलब नहीं कि वह बीमार है, किस हालत में है, उसे सिर्फ बीबी की देह चाहिये। इन्कार करने पर वह दूसरी शादी की धमकी देता है। नतीजा हर साल एक बच्चे की पैदाइश। केवल एक वर्ष जब उसका शौहर एक साल के लिये विलायत गया था तब उसे सुकून मिला था। रशीद जहाँ की कहानियों से कुपित कट्टरपंथियों ने उनके नाक-कान काट लेने की धमकी थी। यह स्थिति कमोबेश हर समाज में औरत की रही है।
आज वैसी स्थितियाँ नहीं हैं। संविधान ने स्त्री-पुरुष दोनों को समान कानून दिये हैं। जनतांत्रिक प्रणाली में शिक्षा, व्यवसाय के सबको समान अवसर हैं और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का हक है। औरतों के लिये स्वतंत्र भारत में विधायिका और न्याय पालिका दोनों ही धीरे-धीरे संवेदनशील हुए हैं। स्त्रियों में चेतना और स्त्रियों के प्रति चेतना और संवेदना भी समाज में उत्तरोत्तर विकसित हुई है। युगों के दीर्घ अंतराल में निर्मित मानसिकता को बदलने में समय लगता है। कम से कम दो-तीन पीढयाँ इसमें खप जाती हैं। निश्चित रूप से स्त्री आंदोलनों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज स्त्री विमर्श में चेतना के इतने अलग-अलग स्तर हैं कि किसी एक प्रसंग के आधार पर समूची घटना को एक सूत्र में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान के प्रभाव ने एक बडा बौद्धिक वर्ग समाज में निर्मित किया जिसकी आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक एक महत्त्वपूर्ण  भूमिका रही है। लेकिन आज के वैश्वीकृत समाज में एक विशिष्ट  वर्ग  साधारण जन समूह से एकदम अलग दिखाई देता है जहाँ स्त्री-पुरुष समानता का मानक साधारण जन समूह से अलग है। इस वर्ग के सांस्कृतिक परिवेश के नियामक तत्व पश्चिमी सभ्यता और बाजारवादी संस्कृति भी है।
लेकिन बात करें साधारण जनसमूह की। यहाँ आज भी यौनिक संबंध पति द्वारा निर्धारित होते हैं। संतानोत्पति के फैसले पति द्वारा लिये जाते हैं। भ्रूण हत्या के लिये अक्सर माँ को दोषी ठहराया जाता है लेकिन एक सीमा तक यह फैसला पति और पति के संकेत पर पति का परिवार तय करता है। गर्भधारण अथवा निरोध के सभी तरह के फैसले पति द्वारा ही लिये जाते हैं जबकि उसका पूरा दारोमदार स्त्री देह के ऊपर होता है, उसके स्वास्थ्य, जीवन और प्रकृति से होता है। यह भी पुरुषों की वर्चस्ववादी संस्कृति का हिस्सा है।
एक ओर परंपरागत पुरुषवादी मानसिकता और दूसरी ओर समान अधिकार की चेतना से परिपूर्ण समान रूप से शिक्षित, आत्मनिर्भर हो रही महत्वाकांक्षी स्त्री। ऐसे में परस्पर टकराव की स्थिति पैदा होनी ही है जब स्त्री नये बन रहे समाज द्वारा प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करने को तत्पर हो लेकिन परंपरागत पुरुष समाज इसके लिये तैयार न हो।
स्मरण आता है लेनिन और क्लारा जेटकिन का वार्तालाप जो जारशाही से मुक्त हुए नये समाजवादी रूस के भविष्य निर्माण की योजना के संबंध में था। लेनिन ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि रूसी समाज तभी विकास के पथ पर आगे बढेगा जब संपूर्ण स्त्री समाज की हर क्षेत्र में बराबरी की भागीदारी होगी। इसके लिये स्त्री समाज को शिक्षित करना होगा और उन्हें चूल्हे-चौके के बंधन से मुक्त करने के प्रबंध करने होंगे.... कहना न होगा कि उनका संकेत राज्य द्वारा वहन की जाने वाली उन व्यवस्थाओं की ओर था जिनके द्वारा स्त्रियों को घर के काम काज, शिशुओं के पालन पोषण, और उनके बच्चों की शिक्षा व्यवस्था में मदद मिलती। इसका ही नतीजा था कि समाजवादी रूस में बडी संख्या में महिला डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षाविद थीं। उनका परिवार था, बच्चे भी थे और कैरियर भी था लेकिन इस स्थिति के निर्माण में शासन व्यवस्था का पूरा सहयोग था। हाँ, नहीं थी तो आज जैसी बाजार व्यवस्था जहाँ इच्छाएँ होती हैं, आकांक्षाएँ होती हैं, महत्वाकांक्षाएँ होती हैं लेकिन उत्तरदायित्व नहीं होता, जिम्मेदारी नहीं होती। आज विश्वव्यापी बाजार व्यवस्था में हमारी नई पीढी किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी से बचती है चाहे वह पारिवारिक हो, सामाजिक हो या राष्ट्र के प्रति हो या नैतिक मूल्यों के प्रति हो।
उपरोक्त  प्रसंग  में पति-पत्नी दोनों प्रशासनिक अधिकारी हैं। दोनों समानधर्मा, समान रूप से शिक्षित, योग्य और समान स्तर के हैं। ऐसे में पत्नी का महत्वाकांक्षी होना अस्वाभाविक नहीं है। वह सन्तानोत्पत्ति से इंकार करती है.... अतः पति तलाक की माँग करता है। गर्भ धारण का फैसला पति पत्नी पर नहीं थोप सकता। यह पत्नी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है। पत्नी को अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने का हक हैं।
लेकिन उपरोक्त प्रसंग का एक और पहलू भी है जहाँ पूरे प्रसंग में स्त्री-पुरुष को समान स्तर पर रख कर देखा जाना चाहिये। वैवाहिक जीवन में कुछ संयुक्त फैसले भी होते हैं जिसमें सन्तानोत्पति भी एक है। ऐसे में विवाहपूर्व इन मुद्दों पर बातचीत कर एक निर्णय पर पहुंचना जरूरी है। पति संतान चाहता है, पत्नी नहीं चाहती। पत्नी, पति से अलग भी रहती है। ऐसे में अगर संयुक्त जीवन के मुख्य मुद्दों पर ही असहमति हो तो अलग-अलग अपने रास्तों पर जाना ही बेहतर है।
एक दूसरी स्थिति की कल्पना करें। माना कि स्त्री संतान चाहती है और पति नहीं चाहता। ऐसे में यह बात पत्नी के प्रति पति की क्रूरता समझी जायेगी और यह फैसला दिया जायेगा कि पत्नी को पति से तलाक लेने का पूरा हक है। इसी के अनुरूप पहले प्रसंग को भी देखा जाना चाहिये। अगर ऐसा नहीं होगा तो यह थोथा नारी विमर्श होकर रह जायेगा।
अगर आई.ए.एस. पत्नी गर्भ धारण नहीं करना चाहती तो उसे इसकी पूर्ण स्वतंत्रता है। लेकिन इस स्वतंत्रता के लिये उसे अपने पुरुष को मुक्त करना पडेगा ताकि वह भी स्वतंत्र होकर  अपना जीवन जी सके।
दरअसल स्त्री-पुरुष समानता की यह स्थिति अभी उच्च वर्ग या उच्चमध्यवर्ग तक ही सीमित है। व्यापक स्त्री समूह तो अभी समानता के ककहरे तक ही पहुँचा है।
सस
इस अंक में हम हिन्दी के सुपरिचित समीक्षक डॉ. सूरज पालीवाल का एक समीक्षा लेख दे रहे हैं। सूरज पालीवाल इन दिनों हिन्दी कहानी पर अध्ययनरत हैं और लेखन कर रहे हैं। आगामी अंकों में वे आज के संदर्भों में किसी एक कहानी को केंदि्रत कर उसकी व्यापक पडताल करते हुए आधुनिक कहानी पर टिप्पणी करेंगे।
कमलेश्वर वर्तमान साहित्य कहानी पुरस्कार के आयोजन में पुरस्कृत दो कहानियों के अतिरिक्त दस कहानियाँ सभी प्रशंसा योग्य हैं। हमारे कुछ लेखक-पाठकों को शिकायत है कि हमने चयनित कहानियों का कोई विशेष क्रम नहीं रखा। कहानियाँ एक साथ छाप पाना हमारी इस पत्रिका के लिए संभव नहीं था। पत्रिका में छपने वाली सामग्री की अनेक सीमाएँ होती हैं। हमें यह संतोष है कि पुरस्कृत दो कहानियों के अतिरिक्त अन्य प्रशंसित कहानियाँ हमारे पाठकों द्वारा भी सराही गईं। आज की हिन्दी कहानी की दशा और दिशा को इंगित करने के लिए यह हमारे लिये संतोष की बात है। शेष तीन कहानियाँ जिनके लेखक हनीफ मदार, अनुपम माथुर तथा निशा रविन्द्रन हैं, उन्हें हम अगले अंक में दे रहे हैं।



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