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’वर्तमान साहित्य‘ का अप्रैल, २००७ अंक की ’अपनी बात‘ नमिता जी की ही नहीं, अधिकांश बूढे-बूढयों और सेवानिवृत्त व्यक्तियों की ’आपबीती‘ लगी। अनेक प्रबुद्ध  जनों को मैंने इसे पढवाया और उनकी आकृति के बदलते रंगों को पढा। अनायास ही उनकी आवाज सुनाई पडी की यही मेरी दास्तान है।
अब्दुल बिस्मिल्लाह ने ’सज्जाद जहीर होने का अर्थ‘ लिखकर वे स्वयं की कमजोरियों से लडने का साहस जुटा रहे है। पद, स्वार्थ और सस्ती लोकप्रियता को दूर रखकर लक्ष्य के प्रति निष्ठा और सर्मपण से ही सज्जाद जहीर की राह पर बढा जा सकता है।
हामिदा सालिय की कलम ने लगा स्याही की जगह अपने रक्त और आँसुओं को अपने भीतर संजोया है। भाई की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करने के लिए उन्हें बधाई।
’समय संवाद‘ स्तंभ में अप्रैल १९३६ से अप्रैल २००७ तक के प्रगतिशील आंदोलन के आकलन से ’वर्तमान साहित्य‘ की प्रासंगिकता को आपने चरितार्थ कर दिखाया है। उद्देश्य से दूर अंधे की तरह साहित्यिक आंदोलन को  नहीं चलाया जा सकता। प्रगतिशीलता को अपने अपने चौखटे में कैद की राजनैतिक पार्टियाँ, चाहे वह वाम, वाम.... वाम के नारे के नाम पर ही क्यों नहीं हो-आज सार्थकता खो रहीं हैं। प्रेमचंद आज भी उदाहरण ही नहीं आदर्श हैं।
इस आलेख का आशय मेरी निगाह में यही है। यही कारण है कि मैं सबसे पहले इस पत्रिका के इसी स्तंभ को पढता हूँ। इस पर राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चा हो, इसकी जरूरत है।
सभी रचनाएँ पठनीय हैं।
राजेन्द्र राजन, बेगूसराय

’वर्तमान साहित्य‘ (अप्रैल, ०७) की दो ख्ाास बातें जो अन्यत्र अलभ्य हैं, बहुत भायीं-अपनी बात और समय संवाद। ’प्रगतिशील आंदोलन‘ पर और विस्तार से विवादी विवेचन होना जरूरी है। लखनऊ में सन् १९३६ में हुए भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन के सभापति के रूप में दिये गये संबोधन कमोबेश आज के लिए प्रेरक प्रासंगिक हैं। आगे की तब्दीलियों, दरारे-तकरारें आंदोलन को मरियल-सा बना चुकी हैं। खैर, राजनीति-पीडत हर आंदोलन की यही नियति है, दुर्गति है।
र. श्योरिराजन, के.के. नगर, चैन्नई

’वर्तमान साहित्य‘ अप्रैल अंक मिला। धन्यवाद। आफ संपादकीय में बहुत सारी बातें सिमट आयी हैं। जीवन के मूल्यों में जिस गति से तब्दीली आ रही है, वह नये सिरे से सोचने का तकाजा करती है। मजाज ने कहा था ’’हमारे बाद अँधेरा नहीं उजाला है‘‘। कम से कम ऐसे ख्वाब वर्तमान साहित्य को भविष्य की ओर ले जाने का सहारा तो बनते हैं।
निदा फाजली, वरसोवा, मुम्बई

वर्तमान साहित्य का अप्रैल अंक। इस बार का संपादकीय बुरी तरह झकझोर  गया। ’’बाजार व्यवस्था पर आधारित समाज में वृद्धों के लिये कोई स्थान नहीं‘‘ यही आज का हमारे समय और समाज का घृणित सत्य बन कर रह गया है। इस सत्य को बनाये रखने में आत्मजों की गंभीर भूमिका को नकारा नहीं जा सकता‘‘ और रही सही कसर सरकारी कुनीतियाँ पूरी कर रही हैं। बेचारे वृद्ध जाएँ तो जाँएँ कहाँ। पेंशनयाफ्ता वरिष्ठ नागरिकों के लिये जब उनका खून ही गद्दारी पर उतारू हो जाता है, तो बैंक और डाकरघर जैसे सरकारी उपक्रमों के कर्ता-धर्ता उत्तरदायी लोग ही पीछे क्यों रह जाँएँ, वे तो हैं ही परायी आग पर रोटी सेंककर खाने वाले। सरकार की खूब ख्ाबर ली है, उसे आयना दिखाया है आपने। वृद्धों की समस्याओं और उनकी बेचारगी की जो बाते आपने रखी हैं वे हृदयविदारक हैं, लेकिन यह दारुण दशा बदल नहीं पा रही है। इसके लिये वह संकुचित सोच भी कम जिम्मेदार नहीं जो ’हम दो हमारे दो‘ सीमित परिवार सुखी परिवार‘ कहती है। अब इस सीमा में दो के अलावा किसी की समभाई हो तो कैसे....। हमें अपना दायरा बढाना ही होगा। डॉ. इशाक अश्क के गीत अपने मौलिक तथ्य और उद्भावनाओं को लिये हुए एकदम दिल को छू गये। उन्हें बधाई। रामदेव शुक्ल की कहानी से जानकारी में इजाफा हुआ और मनोरंजक भी लगी। सुषमा मुनीन्द्र की कहानी भी आज के सच को उजागर करने वाली है। ’इंसानियत का शायर....‘‘ शाहबाज अली खां का आलेख अत्यंत रुचिकर रहा। मजाज साहब की गजल के कुछ शेर ’शहर की रात और मैं....‘‘ तलत महमूद की आवाज में बहुत पहले सुन रखा था आज तफसील से उन्हें दुबारा पढना बेहद अच्छा लगा।
दया दीक्षित, १२८/३८७ वाईवन, किदवई, कानपुर

’वर्तमान साहित्य‘ अप्रैल २००७ अंक देखते हुए यह उम्मीद और पुख्ता हो गई है कि ’वर्तमान साहित्य‘ उत्तरोत्तर प्रगति की ओर है। अंक की सभी कहानियाँ पठनीय ह। खासतौर से सुषमा मुनीन्द्र की ’शो फ्लॉप‘ रुचिकर लगी। कहानीकारों ने जीवन की वास्तविक घटनाओं को उजागर किया है।
’अपनी बात‘ में आपने अपने सम्पादकीय के जरिये सबका ध्यान बुजुर्गों की तरफ आकर्षित किया है। जो जन्मदाता हैं आज उन्हीं की क्या दुर्दशा हो रही है? उनकी बेकद्री किस हद तक हो रही है? लोग उन्हें घर की बेकार, जंग लगी ’कल‘ समझकर कबाडखाने में रख देते हैं। यहाँ तक की उन पर कितने गलत आरोप लगाये जाते हैं। यह चित्रा मुद्गल की ’गिलिगडु‘ में देखने को मिला है। हमारे आसपास भी तो ऐसी मार्मिक घटनाएँ आम हो गई हैं।
एक से अधिक कविताओं का समूह देखकर प्रसन्नता हुयी सभी कविताएँ अपनी-अपनी जगह अच्छी हैं। नमिता सिंह और डॉ. नीरज खरे की समीक्षाएं इस अंक को विशिष्ट बनाते हैं। कुल मिलाकर पूरी सामग्री संग्रहणीय है। अच्छा स्वरूप है देखकर प्रसन्नता हुई।
कु. जया सिंह, म.नं. १०/३३, थाने के बगल में
शिव मार्केट, शुक्ल गंज, जिला-उन्नाव

’वर्तमान साहित्य‘ के अप्रैल अंक में रामदेव शुक्ल की कहानी ’हिंसा-अहिंसा‘ अपने ’रूप तथा अन्तवर्स्तु‘ दोनों में कथा नहीं बन पाती है।
कहानी के दूसरे भाग में लेखक ने एक भूतपूर्व ’नक्सलवादी‘ कार्यकर्ता जो लेखक की ’शोध छात्रा‘ का पति है, के महत्व से, इस आन्दोलन की विचारधारा, विशेषकर ’हिंसा के दर्शन‘ पर कुछ प्रश्न खडे किये हैं।
अतीत में ’आतंकवादी विचारकों‘ के बीच ’क्रांतिकारी हिंसा‘ बनाम ’आतंकवादी हिंसा‘ के सवाल पर काफी तयशुदा बहसें चल चुकी हैं।
१९६७ में बंगाल के ’नक्सलवादी‘ अंचल से शुरू हुआ आन्दोलन ’सामाजिक प्रयोग तथा व्यवहार में बुरी तरह विफल हुआ, इसके पीछे ’व्यक्तिगत हिंसा‘ एक प्रमुख कारण रही। यह बात अलग है कि आज भी इसके अनेक पैरोकार फल फूल रहे हैं।
लेखक की नक्सलवादी आन्दोलन के बारे में ज्यादातर जानकारी सुनी सुनाई बातों अथवा समाचार पत्रों पर आधारित प्रतीत होती है। नक्सलवादी आन्दोलन में शामिल ज्यादातर नवयुवक आर्दशवादी थे, वे उस मध्यवर्गीय दर्शन से प्रभावित थे, जो बिना  जनता  को साथ लिए ’व्यक्तिगत हिंसा‘ के माध्यम से सामाजिक राजनैतिक क्रान्ति के स्वप्न देख रहे थे।
इस सबके बावजूद वे आतंकवादियों की तरह क्रूर तथा हत्यारे नहीं थे, जो विचारधारा के नाम पर अपने ही साथियों अथवा रिश्तेदारों की हत्यायें करें जैसा लेखक ने कहानी में अपने पत्र के माध्यम से कहा है।
आन्दोलन से अलग हुये ज्यादातर कार्यकर्ता अपने व्यक्तिगत कारणों से संगठन से अलग हुये तथा आज भी अपना निजी जीवन बिता रहे हैं। ये बातें हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख रहे हैं।
स्वदेश कुमार, द्वारा-श्री के.डी. सिन्हा
९०, रामदत्तपुर, गोरखपुर-२७३००१ (उ.प्र.)

’वर्तमान साहित्य‘ का मार्च, ०७ अंक। महादेवी जी को याद किया जाना बेहद अच्छा लगा और प्रो. शिवकुमार मिश्र ने उनके लेखन की शक्ति को प्रभावी रूप से प्रकट भी किया है।
भगतसिंह के बारे में ठीक लिखा गया है कि २०वीं सदी के किसी भी बुद्धिजीवी में इतनी वैचारिक प्रगति नहीं दीखती, जितनी भगत सिंह में.... फिर भी आश्चर्य कि अकादमिक हलकों में सर्वाधिक उपेक्षा उन्हीं को मिली है। बम फोडने और इन्कलाब जिंदाबाद कहने वाले जोशीले युवक की छवि से ज्यादा नहीं है। जबकि उनके विचारों की सबसे ज्यादा जरूरत आज ही है। आपने डॉ. सूरज पालीवाल के लेख और भगतसिंह के विचार छापकर पाठकों को गंभीर सामग्री उपलब्ध करवाई है।
पल्लव, उदयपुर

’वर्तमान साहित्य‘ मार्च, २००७। स्त्री संदर्भ को उकेरता, दो महत्त्वपूर्ण लेख वैचारिक संपन्नता के साथ, पाठकों को नई दृष्टि से लवरेज है। इस संदर्भ में आपका सम्पादकीय स्त्री के पक्ष में उन मौजूँ पहलुओं पर अच्छा विमर्श करता है। कहानी ’कफ्फारा‘ एवं ’मुआर अली‘ जीवतता से भरपूर संवेदनशील लगी। कविताएं ’सरस्वती‘, ’सीमा मासी‘ काफी अच्छी लगी। दोनों कविताएं स्त्री मन की संत्रस्ता वस्था एवं टीस को व्यक्त करती है। दूसरी ओर स्त्री की यह विवशता सिर्फ उसके स्त्री होने की वजह भी है। आखिर वह अपनी क्षमताओं का विस्तार भी कैसे करे ? यह आज भी यक्ष-प्रश्न की तरह घुमड रहा है। वहीं ऋतु वार्ष्णेय की कविता भीतर तक स्पर्श कर जाती है, जबकि उनकी कविता का अंश उभरती है-’’इस पनपते समाज में आज भी/ अजीब सी दहशत है।‘‘ पुस्तक समीक्षा पुस्तक पढने को प्रेरित करती है।
उत्तिमा केशरी, भट्ठा दुर्गावाडी, पूर्णिया-८५४३०१

’वर्तमान साहित्य‘ का अप्रेल अंक। सम्पादकीय ’अपनी बात‘ में आपने जो बात उठाई है वह गम्भीर और शोचनीय है। सेवा-निवृत्ति के बाद बुजुर्ग पीढी के साथ होने वाला व्यवहार वास्तव में एक चिंता का विषय है। पूंजीवादी बाजार व्यवस्था ने, सेवा-निवृत्त, नौकरी-पेशा लोगों के लिए जिन्हें या तो पेंशन मिलती है या आजीविका चलाने के लिए फंड मिल जाता है। एक समस्या खडी कर दी है। बाजार व्यवस्था के चलते ही औलाद जल्द से जल्द अपने घर में आराम एवं शानों-शौकत की तमाम वस्तु उपलब्ध कर लेना चाहता है। इसके लिए बाप के फंड या पेंशन पर उसकी नजर रहती है। हमारे शहर में ऐसे तमाम लोग हैं जो फंड का सारा पैसा अपने बच्चों-बहुओं को दे चुके हैं और अब घर से भागे-भागे फिर रहे हैं। बच्चे भी चालाक हो गये हैं। महीनेभर बाप की खबर नहीं रहती है महीने की पहली तारीख को जरूर बाप की तलाश शुरू हो जाती है। हम केवल बाजार व्यवस्था को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं मान सकते। हमारे समाज के मूल्यों में जिस तरह का परिवर्तन हो रहा है वह चिंता का विषय है। ये परिवर्तन भले ही समाज और व्यक्ति के विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हो परन्तु जीवन के लिए एक ख्ातरा ही साबित हो रहे हैं।
समय संवाद ’प्रगतिशील आंदोलन के ७२वीं वर्षगांठ के अवसर पर‘ में कुँवरपाल जी ने प्रगतिशील आंदोलन की व्यवस्था से लेकर अब तक की गतिविधियों और कमजोर होते आंदोलन पर गम्भीर चर्चा की है। अप्रेल १९३६ में जिस समय प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन हुआ था उसी समय ’हिन्दी साहित्य सम्मेलन‘ और ’परिमल‘ नामक साहित्यिक संगोष्ठी के माध्यम से लेखकों को संगठित करने का प्रयास किया जा रहा था। इसी समय ’अखिल भारतीय किसान महासभा‘ की स्थापना भी हुई। ये सारी गतिविधियां, ये सारे अधिवेशन प्रगतिशील शक्तियों को उभार कर सामने ला रहे थे। ये प्रगतिशील शक्तियां अपना कार्य राष्ट्रीय आजादी के लिए सक्रियता से कर रही थीं। प्रो. वीरेन्द्र मोहन ने अपनी पुस्तक ’समकालीन कविता की पहचान‘ में लिखा है-’’राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए छात्रों किसान-मजदूरों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों का यह संयुक्त अभियान था। वस्तुतः १९३६ का वर्ष भारतीय इतिहास के लिए विशेष महत्व का है। परन्तु उस समय के अन्य जनवादी आंदोलनों पर भी चर्चा होनी चाहिए। हालांकि यह स्पष्ट है कि आजादी के बाद राजनीति ने तमाम-जनवादी आंदोलनों को तोडने की साजिश की है और देश का एक बहुत बडा वर्ग संगठित होने के स्थान पर बिखर कर रह गया। हर राजनीतिक दल ने वोटों के लिए किसान-मजदूर वर्ग को लेकर अपने-अपने मोर्चे खोल दिये। फलां किसान मोर्चा, फलां मजदूर यूनियन। तमाम ऐसे छोटे-छोटे किसान मजदूर यूनियन, संगठन, दल बन गये जिसने देश के किसान-मजदूर वर्ग को बांट दिया। बाद में यही छोटे-छोटे संगठन आपस में ही लडने लगे। और जो थोडी कसर बची थी वह राजनीतिक पार्टियों ने धर्म और जाति के नाम पर समाज को बांटकर निकाल ली। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के किसान मजदूर वर्ग को एक बैनर तले एक मोर्चे के नीचे संगठित किया जाये। ठीक उसी तरह जैसा आपने माना कि जन-आंदोलन से जब तक लेखक नहीं जुडेंगे और प्रगतिशीलता की बात करेंगे तो यह अर्न्तविरोध बडा रचनाकार बनने से रोकेगा।
प्रस्तुति-गजेन्द्र नामदेव, सिंघल बिल्डिंग,
१०, सिविल लाइन, सागर-४७०००२ (म.प्र.)

’वर्तमान साहित्य‘ का मई अंक। ’अपनी बात‘ में ’आज का दौर आत्म हत्याओं का दौर है‘। यह कटु दुःखदायी यथार्थ है। जिस पर पता नहीं क्यों अधिकारियों व्यवस्थापकों का इसके न्यायिक समाधान की ओर ध्यान दिया जा रहा, हालाँकि ऐसी दुःखद खबरें अक्सर अखबारों में छपती रहती हैं। अभी ५ मई को ऐसी खबर प्रकाशित हुई है कि-’साधन संपन्न समाज व ताकतवर लोगों के जुल्मों से और सालों न्याय की जंग लडते-लडते न्याय न मिलने से, भारतीय सुस्त, महंगी व जटिल न्याय व्यवस्था से तंग आकर श्रीमती बेबी आर्या ने आत्महत्या कर ली।‘‘
राजनीतिक आजादी के बाद वर्षो बाद भी बेरोजगारी नौजवानों से व्यथित नौत्रनाचों की उर्जा अन्य आवारागर्दी में, आतंकवादी गतिविधियों में व्यर्थ जा रही हैं। सोमा बंदोपाध्याय का लेख-’बंग्ला बुद्धिजीवियों की दृष्टि में १८५७ की जनक्रांति म देशवासियों में राष्ट्रीय स्वाधीन चेतना जगाने में बडी भूमिका निभाई। वंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ’आनंदमठ‘ ने भी क्रांतिकारी भूमिका निभाई। कवि काजी नजरूल इस्लाम की प्रगतिशील कविताओं ने क्रांतिकारी चेतना जागृत की। वर्तमान में इंटरनेट वाले इलैक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया वाले इनसे प्रेरणा लेकर आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
कुशल करण, जोधपुर

’वर्तमान साहित्य‘ का अप्रैल अंक। वरिष्ठ नागरिकों पर एक साथ ही समस्या-कडवी वास्तविकता-दम तोडता इंसानी जमीर-सरकारों की किस्म किस्म की लॉलीपॉप नीतियों की चर्चा, और चुटीला व्यंग ’अपनी बात‘ जैसी साफगोई बातें निरंतर उठती रहनी चाहिए। कभी तो हम नींद से जागेंगे। कभी तो अन्तरात्मा झकझोरेगी। कभी तो समझ में आएगा कि कल हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ होगा....।
डॉ. नताशा अरोडा, नोएडा-२०१३०१

’वर्तमान साहित्य‘ अप्रेल एवं मई अंक। दोनों अंकों के सम्पादकीय (अपनी बात) पढकर लिखने को बाध्य हो रहा हूँ। अप्रेल अंक में वृद्ध व्यक्तियों के लिए परिवार से लेकर सरकार तक सभी जो उपेक्षा भाव अपना रहे हैं उसके बारे में आपने जो व्यंग्यात्मक शैली में लिखा है वह इस बहुत बडी विडम्बना का पर्दाफाश करता है। इसी तरह मई अंक में आज के युवाओं की बढती आकांक्षाओं का बहुत सटीक विवेचन किया है।
आपका यह कहना-कोई भी वस्तु या माध्यम  जब मात्रा में अथाह हो जाता है तो गणना में उसका मूल्य शून्य हो जाता है, बहुत सटीक है।
कहानियाँ तो दोनों अंकों में पुरस्कृत व चयनित हैं। कविताएँ भी उत्कृष्ट हैं। अच्छे अंकों हेतु साधुवाद स्वीकारें।



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