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20
Jun
विधाता से शिकायत
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    एक बार कुछ खरगोश गर्मी के दिनों में झरबेरी की एक सूखी झाडी में इकट्ठे हुए।
खेतों में उन दिनों अनाज न होने से वे सब भुखे थे और सुबह और शाम गांव से बाहर घूमने वालों के साथ आने वाले कुत्ते भी उन्हें बहुत तंग करते थे। मैदान की झाडयां सूख गई थी। कुत्तों के दौडने पर खरगोशों को छिपने का स्थान बहुत परेशान होने पर मिलता था। इन सब दुःखों से वे बेचैन हो गए थे।¬
       एक खरगोश ने कहा विधाता ने हमारी जाति के साथ बडा अन्याय किया है। हमको इतना छोटा और दुर्बल बनाया। हमें उन्होंने न तो हिरन-जैसे सींग दिए न बिल्ली-जैसे तेज पंजे। अपने शत्रुओंे से बचने का हमारे पास कोई उपाय नही। सबके सामने से हमें भागना पडता है। सब ओर से सारी विपति हम लोगों के सिंर पर ही विधाता ने डाल दी हैं।
       दूसरे खरगोश ने कहा-मैं तो अब इस दुःख और आश्ंाका भरे जीवन से घबरा गया ह। मैंने तालाब में डूब मरने का निश्चय किया है।
       तीसरा बोला-मैं भी मर जाना चहता हूं। अब और कष्ट मुझसे नहीं सहा जाता। मैं अभी तालाब में कूदने जाता हूं।
       हमस ब तुम्हारे साथ चलते हैं। हमस ब साथ जीए हैं तो साथ ही मरेगें। सब खरगोश बोल उठे। खरंगोश एक साथ तलाब की ओर चल पडे।
      तालाब के पानी से निकलकर बहुत-से मेंढक किनारे पर बैठे थे। जब खरगोश के आने की आहट उन्हें हुई तो वे छपाछप पानी में कूद पडे। मेढकों को डरकर पानी में कूदते देख खरगोश रूक गए। एक खरगोश बोला- भाइयो ! प्राण देने की आवश्यकता नहीं है आओ लौट चलें। जब विधाता की सृष्टि में हमसे भी छोटे और हमसे डरने वाले जीव बडे मजे से जीते हैं तब हम जीवन से क्यों निराश हों ?
      उसकी बात सुनकर सभी खरगोशों ने आत्महत्या का विचार छोंड दिया और अपने घर लौट आए।




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Comments to this Article

kahani achchhi hai, very good., Tarachand malethia (31/07/2008 19:07:52)


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