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विरासत पर्यटन का दूसरा नाम है। बीकानेर

21 Dec 2006      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

U.C.Koacherप्रत्येक जिले के प्रशासन द्वारा अपने क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाता है एवं पर्यटन के लिहाज से उसे उस ढांचे मे ढाला जाता है कि वहां पर्यटक आए तथा वह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण  स्थानों में गिना जाय। राजस्थान अपनी वीरता, त्याग आदि के लिए प्रसिद्व रहा है जो पर्यटन के लिहाज से यह भी अति महत्त्वपूर्ण है तथा वे अपने आप में इतने सुन्दर बन पडें हैं कि उनको देखने के लिए पर्यटक का ध्यान बरबस ही उनकी तरफ चला जाता है। इस प्रकार के क्षेत्रों में प्रभुख नाम आता है बीकानेर का। वैसे तो बीकानेर शहर को भुजिया रसगुल्ला व पापड के लिए विश्व प्रसिद्व माना जाता है। लेकिन आज इसके महत्त्वपूर्ण पहलू पर्यटन पर हम बात करें तो बीकानेर पर्यटन के क्षेत्र में किसी भी अन्य जिले या क्षेत्र से किसी भी लिहाज से पीछे नहीं है और यदि हम ये कहे कि बीकानेर को पर्यटन विरासत में मिला है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और न ही कोई बेमानी । पर्यटन बीकानेर को विरासत में मिला, इस बारे में यदि हम जॉच करें तो देखेंगे कि बीकानेर के महत्वपूर्ण किले जूनागढ, लालगढ, आदि बनाए गए तो राजा महाराजाओं के शानों शौकत एवे सुरक्षा की दृष्टि से लेकिन आज जूनागढ पर्यटकों के लिए किसी भी लिहाज से कम नहीं है। जूनागढ की ही बात करें तो इसके अंदर विभिन्न दर्शनीय स्थल, पदम् महल, अनूप महल, गंगा निवास आदि बनाये गये है। इनके अलावा शाही रूप से पेंटिग व सोने की नक्काशी, कांच पर सोने की कलाकारी आदि अपने व्यक्तिगत सुखों आराम के लिए बनाए गये थे । लेकिन ये सब महल आदि आज पर्यटाकों को बहुत ही लुभाते हैं। यह पर्यटन क्षेत्र में हमारे लिए विरासत है इसे कोई नकार नहीं सकता। इसी प्रकार लाल संगमरमर से बना लालगढ स्वीडन जैकब द्वारा बनाया गया था । आज भले ही होटल हो वह भी पर्यटन क्षेत्र के लिए विरासत के रूप में मिला गहना है। पर्यटन विभाग को विरासत में मिले पर्यटन क्षेत्रों की फेहरिस्त बीकानेर में जो हवेलियां पुराने जमाने से सेठों द्वारा बनाई गई थी की उनमें महत्वपूर्ण रूप से रामपुरिया हवेली, कोठारियों की हवेली, रिखजी बागडी की हवेली, मोहतों की हवेलियां आदि करीब एक हजार से अधिक हवेलियां बीकानेर में हैं जिनमें स्थापत्य कला का बेजोड नमूना पेश किया गया है कि देखने वाला दंग रह जाय। बीकानेर की प्रत्येक हवेली जाली - झरोखे, कोरनी का काम, फूल-पत्तियां, सोने की नक्काशी, उस्ता कला इतनी शानदार है कि पर्यटक बहुत ही ध्यान से इन्हे देखता है। पर्यटन विभाग का इसके लिए किसी प्रकार को श्रम की जरूरत नहीं पडी । हालांक हवेलियां के निर्माताओं ने इन हवेलियो को अपनी सामाजिक इज्जत, अपनी हैसियत के लिए बनाई थी। जिनके प्रत्येक हिस्से, प्रत्येक जाली-झरोखें, कोरनी, नक्काशी आदि की कीमत विदेशों में करोडो रूपये मिलती है। आज वूंकि सीमित मात्रा में ही हवेलियां बनी है लेकिन पर्यटकों के लिए इतनी आकर्षक है कि बीकानेर आने वाला प्रत्येक पर्यटक इसे बडे ही ध्यान से निहारता, देखता है इनको अपने कैमरे में कैद करता है। ये हवेलियां बीकानेर मे पर्यटक के लिए विरासत है जिसे केवल सुरक्षित रखने की ही आवश्यकता है। इनके अतिरिक्त बीकानेर में कई धार्मिक स्थल भी इतने आकर्षक हैं जिनमें लक्ष्मीनाथजी का मंदिर में बाग बगीचे उसकी बनावट बेमिसाल है जो प्रकृति का आनन्द भी देती है, इसके पास ही जैन धर्म के सेठ भांडाशाह का ऐतिहासिक मंदिर भी पर्यटन के क्षेत्र में बेमिसाल है। इसकी नींव घी से भरी गई थी एवं जिसका निर्माण दुलमेरा पत्थरों से किया गया था। ये मंदिर भी स्थापत्य की दृष्टि से इतने शानदार हैं कि बीकानेर आने वाला प्रत्येक पर्यटक यहां आता ही है। ये धार्मिक स्थल भी बीकानेर को विरासत में मिले हैं। बीकानेर को चूंकि छोटी काशी कहा जाता है तो यहां पर वर्षपर्यंत तीज त्यौहार के मेले होते हैं जिनमें प्रमुख गणगौर का मेला होता है। कहते हैं कि इस दिन राजा महाराजाओं के समय गणगौर की दौड हुआ करती थी जो आज भी जारी है तो ये जो विरासत है वह पर्यटकों को लूभाती हैं। इसके अलाावा बीकानेर में ऊंट उत्सव होता है वह भी पर्यटकों के लिए महत्त्वपूर्ण है इसके लिए कई दिन पहले विदेशी पर्यटक बीकानेर आ जाते हैं। बीकानेर से ३० किलो मीटर दूर गजनेर में गजनेर पैलेस बहुत ही शानदार जिसके पास झील है यह क्षेत्र भी पर्यटकों को बहुत आनंद देता है। इसके अन्दर भी स्थापत्य व शिल्प कला का बेजोड कार्य तत्कालीन राजा द्वारा कराया गया था । इसी क्रम में देशनोक की करणीमाता का मंदिर है। जो विश्व में काबो(चूहो) के लिए प्रसिद्व है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बीकानेर विरासत पर्यटन क्षेत्र बनाने के लिए किसी प्रकार की मशक्कत विभाग को  नहीं करनी पडी । यहां पर प्रत्येक किला, हवेलियां, मंदिर आदि विरासत में मिले हैं। जो आज हमें विदशी मद्रा भी उपलब्ध करा रहे हैं एवं दिन व दिन पर्यटकों में वृद्वि ही हो रही है। समय की मांग है कि इस विरासत को संभाल कर रखें एवं इसे संवारे।




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