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जल संकट के वर्तमान हालात और उपाय

04 Jan 2012      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

Author : Shyam Narayan Ranga

जल ही जीवन है। जल जीवन का सार है। प्राणी कुछ समय के लिए भोजन के बिना तो रह सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं। जल के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। अतः जल जीवन की वह ईकाई है जिसमं जीवन छीपा है। वर्तमान में इस जल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जल की कमी ने मानव जाति के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। जल के लिए दुनिया के कईं राष्ट्रों में हालात विकट है।

Water is Life, Save Itअगर हम विश्व परिदृश्य पर गौर करें तो कईं चौकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। विश्व में 260 नदी बेसिन इस प्रकार के हैं, जिन पर एक से अधिक देशों का हिस्सा है, इन देशों के बीच जल बंटवारे को लेकर किसी प्रकार का कोई वैधानिक समझौता नहीं है। दुनिया के कुल उपलब्ध जल का एक प्रतिशत ही जल पीने योग्य है। हमें पीने का पानी ग्लेश्यिरों से प्राप्त होता है और ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी का तापमान बढा है और इस कारण भविष्य में जल संकट की भयंकर तस्वीर सामने आ सकती है। दुनिया में जल उपलब्धता 1989 में 9000 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति थी जो 2025 तक 5100 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति हो जाएगी और यह स्थिति मानव जाति के संकट की स्थिति होगी। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में आधी से ज्यादा नदियाँ प्रदूषित हो चुकी है और इनका पानी पीने योग्य नहीं रहा है और इन नदियों में पानी की आपूर्ति भी निरन्तर कम हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियाँ जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर है। विश्व में 1.10 अरब लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर है और साफ पानी के बगैर अपना गुजारा कर रहे हैं। 

Water is Life - Save Itइसी संदर्भ में अगर हम भारतीय परिदृश्य पर गौर करें तो हालात और भी विकट है। वर्तमान में 303.6 मिलियन क्यूबिक फीट पानी प्रतिवर्ष एशियाई नदियों को हिमालय के ग्लेशियर्स से प्राप्त हो रहा है। जल विशेषज्ञों का अनुमान है कि सन् 2100 के समाप्त होते होते हिमालय के आधे ग्लैशियर सूख चुके होंगे और ऐसी स्थिति में पेयजल की क्या स्थिति होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 4.4 करोड लोग भारत में बेहद प्रदूषित जल का सेवन करने को मजबूर है। हमारे देश में सिंचाई कार्यों के लिए 70 प्रतिशत जल भूमिगत जल स्रोतों से प्राप्त होता है और घरेलू कार्यों के लिए 80 प्रतिशत जल की आपूर्ति भूमिगत जल स्रोतों से की जाती है। वर्तमान में देश की राजधानी दिल्ली में चार घण्टे व देश की औद्योगिक राजधानी माने जाने वाले मुम्बई में लगभग 5 घण्टे जलापूर्ति की जा रही है। भारत की तीसरी लघु सिंचाई जनगणना के आंकडों के अनुसार   1.90 करोड कुऍं और गहरे ट्यूबवेल है। भारत में 39 प्रतिशत परिवारों को ही घरों में पेयजल की सुविधा उपलबध है और 22 प्रतिशत परिवारो को ही नल द्वारा जलापूर्ति की सुविधा उपलब्ध हो रही है। राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान द्वारा करवाए गए एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में 2 लाख से भी अधिक स्कूल ऐसे हैं जिन्हें पीने का पानी आज तक उपलब्ध नहीं करवाया जा सका है। एक अनुमान के मुताबिक 28.6 प्रतिशत परिवारों को पीने का पानी लाने के लिए 500 मीटर से अधिक का फासला तय करना पडता है।

ऊपर लिखे गए तथ्यों से ये स्पष्ट होता है वर्तमान में भी जल संकट अपने विकराल रूप में आ चुका है। मानव सभ्यता के लिए वर्तमान में यह सच है कि पर्याप्त विकास के बावजूद भी करोडों लोग आज भी पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। पेयजल की यह स्थिति न जाने कितने लोगों का जीवन समाप्त कर देती है और न जाने कितने लोगों को बीमारियाँ दे जाती है। 

अब हमें जब यह पता है कि जल संकट का विकट दौर चल रहा है तो हमें यह समझना होगा कि जल का कोई विकल्प नहीं है, मानव का अस्तित्व जल पर ही निर्भर है, जल सृष्टि का मूल आधार है, जल है तो खाद्यान है, जल है तो वनस्पतियाँ हैं, जल का कोई विकल्प नहीं है, जल संरक्षण से ही पर्यावरण संरक्षण है, जल का पुरर्भरण करना ही जल का उत्पादन करना है और हमें कुल मिलाकर ये समझना ही होगा कि जल है तो कल है। हमें यह मानना ही होगा कि मानव की जल की आवश्यकता किसी अन्य आवश्यकता से काफी महत्वपूर्ण है। हमें यह समझना और समझाना होगा कि जल सीमित है और विश्व में कुल उपलब्ध जल का 27 प्रतिशत ही मानव उपयोगी है। अब हमें यह गौर करना होगा वर्तमान में इस जल संकट के प्रमुख कारण क्या है।

  • जल का अंधाधुंध व विवेकहीन प्रयोग जल संकट का सबसे बडा कारण है। 
  • औद्योगिकरण व जल प्रदूषण के कारण हमारी नदियाँ व जल स्रोत प्रदूषित होते जा रहे हैं और इस कारण पेयजल का संकट उत्पन्न हो रहा है। 
  • बढती आबादी के कारण व औद्योगिकरण के कारण जल की मांग बढी है और इस कारण भी जल संकट सामने आया है। 
  • बरसाती पानी का समुचित संरक्षण नहीं होने के कारण भी जल संकट की स्थिति बन रही है।
  • परम्परागत जल स्रोतों के संरक्षण नहीं होने के कारण जल का समुचित भण्डारण नहीं हो पा रहा है और इस कारण भी जल संकट की स्थिति बन रही है।
  • भूमिगत जल के रिचार्ज न होने  के कारण भूमिगत जल का स्तर चिंताजनक स्थिति में घट रहा है और यह जल संकट का महत्वपूर्ण कारण है। जल बंटवारे को लेकर देश में कानून का अभाव है और इस कारण भी जल संकट की स्थितियाँ बन रही है। 
  • पारिस्थतिकी में हो रहे अनियंत्रण ने पारिस्थितिकी तंत्र में गडबड पैदा की है जिस कारण प्रकृति में अकाल व सूखे और बाढ जैसे हालात बन रहे हैं इस कारण पेयजल का संकट उत्पन्न हो गया है। 

इन तथ्यों पर गौर किया जाए तो हमारे सामने काफी भयंकर हालात उत्पन्न होते हैं और स्थितियॉ नहीं बदली तो जल का यह संकट मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर देगा। अतः मानव जाति को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए जल संरक्षण के उपाय करने ही होंगे। जल संरक्षण के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातों पर हम यहाँ चर्चा करेंगे। यह बात गौर करने की है कि प्रकृति हमें इतना पानी देती है कि अगर हम उस पानी को ठीक ढंग से सहेज कर रखें तो कभी भी हमारे सामने जल संकट की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। जब बरसात होती है तो बरसात का यह पानी बेकार न जाए इसके हमें मजबूत व पुख्ता इंतजाम करने होंगे। हम अपने घरों की छतों का निर्माण इस प्रकार करें कि बरसात का सारा पानी घर में ही बने एक कुण्ड में इकट्ठा हो जाए। सभी पक्के घरों की छतों की नालियों को पाइपों की सहायता से कुओं, बावडयों और तालाबों से जोडकर इनका पुनर्भरण किया जा सकता है। इससे बरसात के पानी की एक भी बूंद बेकार नहीं जाएगी और यह पानी हमारे काम भी आएगा। हमारे पूर्वजों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी और परम्परागत जल स्रोतों का विकास किया था लेकिन हमने इन परम्परागत जल स्रोतों की अनदेखी की और इनको ठुकराया। हमें अपने आस पास के परम्परागत जल स्रोतों को सुधारना होगा और इनके पायतन व आगोर की रक्षा करनी होगी ताकि जल संरक्षण के ये साधन मानव जाति के लिए वरदान साबित हो सके। हमारा दायित्व है कि हम अपने खेतों में व खुले क्षेत्रों में ऐनिकट का निर्माण करे और हमारे आस पास जल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण करें ताकि बरसात का सारा पानी भूमि के अंदर जा सके और भूमिगत जल का स्तर भी बढ सके क्योंकि भूमिगत जल अब समाप्त होता जा रहा है और डार्क जोन का क्षेत्र हमारे देश में बढता ही जा रहा है। 

हमें हमारी दैनिक दिनचर्या में भी परिवर्तन करेन होंगे। जैसे कुल्ला करते वक्त टोंटी या नल बंद करके पानी काम में ले और अच्छा तो ये हो कि हम मग में पानी लेकर कुल्ला करें, इसी तरह सीधा नल से नहाने की बजाय हम बाल्टी में पानी भरकर नहाऍं, इसी तरह पाखाने में पानी फ्लश से न चलाकर बाल्टी भर कर पानी फक दे और अपने बाग बगीचों में पाइप की बजाय बाल्टी से पानी दें, इसी तरह कार, मोटरसाईकिल, स्कूटर जैसे अपने वाहनों को पाइप की बजाय बाल्टी भर कर धोये। हम अपने घरों में पानी को लीक न होने दें, अगर किसी भी प्रकार का लीकेज हो रहा हो तो उसे तुरंत सुधारें क्योंकि हम लीकेज दिन भर में सैंकडों लीटर पानी व्यर्थ बहा देता है। हमारे किसान भाईयों को भी हालात को समझते हुए अब कम पानी की फसलों का उत्पादन करना होगा जैसे बाजरा, मूंग, मोठ आदि आदि। किसान भाई बूंद बूंद सिंचाई पद्धति व फव्वारा सिंचाई पद्धति अपनाकर भी पानी की बचत में अपना महत्वपूर्ण योगदान  दे सकते हैं। 

इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि हम एक ही जल का बार बार प्रयोग करें जैसे जिस पानी से नहाते हैं उस से कच्चा फर्श धोया जा सकता है और ऐसे पानी से ग्रामीण क्षेत्रों में उपले बनाए जा सकते हैं इसी प्रकार औद्योगिक इकाईयो में पानी को साफ करने के प्लांट लगाए जा सकते हैं ताकि खराब पानी वापस काम आ जाए। इस तरह दैनिक जीवनचर्या में छोटे छोटे सुधार करके मानव जाति के इस महान व पुनीत कार्य में प्रत्येक व्यक्ति अपना योगदान दे सकता है। 

अंत मे यही कहना चाहगा कि जल के प्रति स्वामित्व का भाव रखें और यह बात समझे कि जल का विकल्प नहीं है। समाज का हर वर्ग इसके लिए आगे आए। शिक्षक व विद्यार्थी अपने प्रयासों से समाज में उदाहरण पैदा करें, पत्रकार इस संबंध में लोगों को ज्यादा से ज्यादा जागरूक करें, राजनैतिक दल जल के इस मुद्दे को देश की केन्द्रीय राजनीति में लाए, समाजसेवी संगठन लोगों को जागरूक कर आम जन की सहभागिता इस कार्य में लें और इर तरह प्रत्येक वर्ग अपने अपने दायित्व को समझ कर उसका निर्वहन करें तथा जल संरक्षण की इस बात को घर घर पहचाए। जीवन के इस अमूल्य तत्व की सुरक्षा का दायित्व देश के प्रत्येक नागरिक पर समान भाव से है। एक प्रसिद्ध विद्वान ने कहा था कि विश्व में तीसरा विश्वयुद्ध पानी के कारण होगा और रावला घडसाना जैसे आंदोलन व कावेरी जल विवाद जैसी समस्याऍं कहीं इस इस भावी विश्वयुद्ध की प्रतिध्वनि तो नहीं है। हमें जल संकट ही इस आहट को पहचानना होगा और इसके लिए सतत प्रयास करने होंगें। 
 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘ 
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर 

 



Comments to this Article
Thanks to all of you ki aap sabne es article ko LIKE kiya or es par ye aapka pyar hi hai ki mai next or next article likhta rahta hu thanks again to all of you , SHYAM NARAYAN RANGA (2012-02-12 10:41:10)
Very nice Article containing a lot of facts which prompts us to make proper us of water and Most important the suggestion provided for better utilization of water
, Anurag Sharma (2012-02-23 05:29:28)
आप सबका जिन्होंने मेरा लिखा ये लेख पसंद किया है उनको मेरी और से हार्दिक धन्यवाद और जिन पाठको ने अपने कमेन्ट किये है उनका दिल से आभार और आप लोगो के प्यार के कारण ही मेरे लिखने का होसला रहता है और मई लिख पपात हू और उम्मीद है की आपका ये प्यार मुझे हमेशा ही मिलता रहेगा , SHYAM NARAYAN RANGA (2012-04-02 03:20:32)

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