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3
Apr
क्या है चौथे मोर्चे का मकसद!
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आखिरकार यूपीए बिखर ही गया और मोर्चे बनने के दौर में एक और मोर्चा बन ही गया। उ.प्र. में कांग्रेस से हनीमून खत्म होने के बाद मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी, लालू प्रसाद प्रसाद यादव के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली लोकजनशक्ति पार्टी ने एक मंच पर आकर यूपीए से इतर अपना मोर्चा बनाने की घोषणा की है। यूं तो चुनावी मौसम में रोज ही मोर्चे बन बिगड रहे हैं लेकिन उ.प्र. बिहार की क्रान्तिधर्मी धरती पर इस मोर्चे का अपना अलग ही महत्व है। हालांकि इस मोर्चे का शुद्ध मकसद चुनाव बाद बनने वाले समीकरणों के मद्देनजर अवसरवादी राजनीति और उससे भी ज्यादा व्यक्तिगत असुरक्षा की भावना है।
 इस मोर्चे की धोषणा के साथ ही जो पहला संदेश गया है वह एकदम साफ है कि यूपीए नाम का गठबंधन बिखर गया है और अगर रह गया है तो उसका मतलब सिर्फ सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस से रह गया है, जिसके प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार फिलहाल १६ मई २००९ तक मनमोहन सिंह हैं, बाद में समय तय करेगा कि कौन प्रधानमंत्री पद की दौड में है। दूसरा संदेश जिसकी गूंज साफ सुनाई दे रही है, यह है कि कांग्रेस हिन्दी पट्टी में मृत दल है जिसके पास अब चुनाव लडने के लिए 120 उम्मीदवार नहीं हैं।
 जाहिर है कि जब यह चौथा मोर्चा देश भर में कुल जमा 120 सीटों पर ही चुनाव लड रहा है और लालू मुलायम दोन ही कह चुके हैं कि वे प्रधानमंत्री बनने की दौड में शामिल नहीं हैं तब इस मोर्चे का मकसद देश में सरकार बनाना तो नहीं है! फिर इसका उद्देश्य क्या है?
 चौथे मोर्चे का पहला लक्ष्य जो समझ में आ रहा है, उससे साफ लगता है कि यह गठबंधन चुनाव के बाद बनने वाले समीकरणों में स्वतंत्र रास्ता बचा कर चलने का प्रयास है और तीसरे मोर्चे की बनने वाली संभावित सरकार में शामिल होने का विकल्प खुला रखने का प्रयास है। हालांकि इस मोर्चे के बनने से कांग्रेस काफी असहज स्थिति का सामना कर रही है और उसका सारा गणित बिगड गया है। भले ही अमर सिंह और अभिषेक मनु सिंघवी लाख दावा करें कि यह मोर्चा यूपीए का ही हिस्सा है लेकिन देखने वाले साफ देख रहे हैं कि यह मोर्चा यूपीए की कब्र खोदने के लिए ही बना है।
 कांग्रेस के साथ जाने पर उ.प्र. में मुलायम सिंह काफी नुकसान उठा चुके हैं और परमाणु करार पर उनकी कांग्रेस से दोस्ती का खमियाजा उन्हें भुगतना पड रहा है। दूसरा मुलायम सिंह देश की राजनीति से ज्यादा उ०प्र० की राजनीति करते हैं और वहां उनका मुकाबला उनकी जानी दुश्मन मायावती के नेतृत्व वाली बसपा से है जिन्हें मुलायम की हरकतों से नाराज उनके पुराने मित्र, वामपंथियों ने प्रधानमंत्री पद का रातों रात दावेदार बना दिया था। मुलायम सिंह के सामने सबसे बडी चुनौती न भाजपा को रोकना है और न कांग्रेस को , उनके सामने सबसे बडी चुनौती मायावती हैं। उ.प्र. में राजनीति सिद्धांतों पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत दुश्मनी पर चल रही है जहां मुलायम और मायावती एक दूसरे को एक सेकण्ड के लिए भी बर्दाश्त करन को तैयार नहीं हैं।
 इसी प्रकार बिहार में राजनीति लालू बनाम नीतीश के इर्द-गिर्द धूम रही है और वहां भी लालू अभी नुकसान में थे। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी की शरद यादव से मुलाकात  के बाद लालू के कान खडे हो गए और उन्होंने भी भांप लिया कि एनडीए लडाई से बाहर है और  भाजपा थके हारे सिपाहियों की फौज है, यूपीए भी नुकसान में है, ऐसे में अगर वामपंथी दल अपनी कोशिशों में कामयाब हो गए तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की स्थिति में नीतीश एनडीए से नाता तोडकर तीसरे मोर्चे के साथ जा सकते हैं। इसी डर ने लालू मुलायम को एक होने और कांग्रेस से नाता तोडने के लिए मजबूर कर दिया है। चर्चा है कि लालू ने वामपंथियों से कहा है कि हमने आपका क्या बिगाडा है?
 लालू मुलायम का दांव यह है कि किसी भी तरह मायावती और नीतीश को अगली सरकार में शामिल होने से रोका जाए। चूंकि उ०प्र० में विधानसभा चुनाव होने में अभी तीन साल बाकी हैं और अगर मायावती केन्द्र में भी सत्ता में शरीक हो गईं तो मुलायम सिंह के लिए काफी मुश्किल हो जाएगी, चूंकि तब मायावती के जुल्म मुलायम के परिवार और उनके कार्यकर्त्ताओं पर बेइंतिहा बढ जाएंगे। इसी लिए मुलायम किसी भी तरह उ०प्र० में जंग जीतना चाहते हैं और उसके लिए किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं।  इसी तरह लालू के सामने समस्या यह है कि नीतीश ने बेशक बिहार में पटरी से उतरी कानून व्यवस्था पर काफी हद तक अंकुश लगाया है और विकास की तरफ भी ध्यान दिया है जिसे लालू ने अपने राज में तबाह और बर्बाद कर दिया था। मगर लालू के लिए सुकून अभी तक यह था कि उनके सारे कलंक पर उनका रेल मंत्रालय का कार्यकाल भारी पड गया। अब अगर नीतीश ने लालू को केन्द्र में आने से रोक दिया तो लालू की बिहार से हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी।
 इसी घबराहट का नतीजा है कि पासवान को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त न कर पाने वाले लालू ने उनसे हाथ मिला लिया है, और लालू मुलायम की हरचंद कोशिश यह है कि किसी भी तरह उनके मोर्चे की सीटें मायावती और नीतीश से ज्यादा आएं, ताकि जब मायावती का नाम प्रधानमंत्री के लिए चले तब चौथे मोर्चे की तरफ से रामविलास पासवान का नाम आगे बढाया जा सके और मायावती व नीतीश को सरकार में शामिल होने से रोका जा सके। ऐसी स्थिति में कांग्रेस भी पासवान को नाम पर सहमत हो जाएगी क्योंकि मायावती के आगे बढने से उसे देशभर में नुकसान होगा जबकि पासवान से यह खतरा नहीं होगा।
 ऐसी स्थिति बनने पर वामपंथी भी तमाम कडवाहट के बावजूद लालू मुलायम को ही तरजीह देना पसन्द करेंगे क्योंकि मायावती की अशिष्टता को बर्दाश्त करना किसी भी सभ्य आदमी के लिए मुश्किल है। अब देखना यह है कि क्या लालू मुलायम की जुगलबन्दी से रामविलास पासवान का नसीब जागेगा???


-- अमलेन्दु उपाध्याय
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और पाक्षिक पत्रिका ’प्रथम प्रवक्ता‘ के संपादकीय विभाग में हैं)




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