Monday, 10 August 2020
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हिंसा में क्यों सफल हो रहे हैं माओवादी


अंतर केवल एक है। 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ में सुकमा जिले के झीरम घाटी में जहां चारांे ओर से घिरे कांग्रेस के नेता कार्यकर्ता और उनके सुरक्षा गार्ड थे वहां इस बार सुरक्षा बलों के जवान थे। तोंगपाल थाना क्षेत्र के अंतर्गत तकबाड़ा गांव के करीब माओवादियानें ने सुरक्षा बलों पर घात लगाकर ठीक उसी तरह हमला कर दिया जिस तरह उनने पहले किया था। पहले से योजना बनाकर एके 47 समेत अन्य अत्याधुनिक हथियारों से लैस 200 से ज्यादा नक्सली आसपास के खेतों, पेड़ों के ऊपर और उनके पीछे छिपे हुए थे और उनने आसपास के क्षेत्रों में बारुदी सुरग भी बिछा रखा था। कुछ गोली से मरे तो कुछ बारुदी सुरंग की विस्फोट में उड़ गए। सरकार कह रही है कि तोंगपाल और झीरम गांव के करीब जो सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है उसको माओवादियों से सुरक्षा दिया जाना अपिहार्य था। इसलिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और जिला बल के लगभग 50 जवानों को वहां तैनात किया गया था। माओवादियों ने सामने चल रहे 15 जवानों की टीम पर हमला किया। माओवादियों ने पहले धमाका किया और फिर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाने लगे। दूसरी टीम करीब 50 मीटर पीछे थी, जिसे माओवादियों की दूसरी पार्टी ने फायरिंग करके रोके रखा। इनने जवानों पर हमले से पहले एक पोकलेन मशीन में भी आग लगा दी, ताकि उस क्षेत्र में आवाजाही रोकी जा सके। पूर्व की घटना में भी उनने सड़क बाधित करने के लिए पेंड़ गिरा दिए थे। 
इसमें पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि ज्यादा संख्या में होने तथा पहले से पूरी तैयारी के कारण इतने जवानों और निर्दोष ग्रामीणों की बलि चढ़ गई। स्थिति देखिए। 25 मई को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला करके इनने 30 लोगांे का मौत की नींद सुला दिया लेकिन एक भी माओवादी हताहत नहीं हुआ। ठीक वैसे ही वर्तमान हमले में भी हुआ। तब भी माओवादी पेड़ों और पत्थरों की आड़ में छुपकर बैठे थे। वे यात्रा को देख सकते थे, लेकिन दूसरी ओर से उन्हें देख पाना संभव नहीं था। आज हुए हमले में भी वैसी ही स्थिति थी। पूरे इलाके में घना जंगल होेने के कारण माओवादी हमला करके आसानी से भाग जाते हैं। यह जिला इसलिए भी माओवादियों के लिए मुफिद है, क्योंकि यहां तीन राज्यों की सीमा लगती है, और उन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने में परेशानी नहीं होती। दरभा घाटी जोनल कमेटी माओवादियों की सबसे माओवादियों की सबसे सक्रिय कमेटी मानी जाती है। प्रश्न है कि आखिर माओवादी इस तरह की खूनी पुनरावृत्ति करने में सफल कैसे हो गए? क्या 80 किलोमीटर का वह क्षेत्र माओवादियों का सबसे सशक्त गढ़ है यह बताने की आवश्यकता है? क्या माओवादी वहां किसी प्रकार के निर्माण कार्य के विरुद्ध हैं यह सूचना प्रशासन को पहले से नहीं थी? क्या वे सुरक्षा बलों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की योजना बना रहे हैं इसकी सूचना भी सरकार को नहीं थी?
 गृह मंत्रालय ने कहा है कि घटना के चार दिनों पूर्व ही प्रदेश सरकार को आगाह किया गया था। ध्यान रखिए कि यह हमला लोकसभा चुनाव के पहले हुआ है। माओवादी विधानसभा चुनाव में कोई बड़ी वारदात नहीं कर पाए थे इसकी टीस उनके अंदर रही होगी। उन्होंने चुनाव बहिष्कार और नोटा का इस्तेमाल करने के लिए फरमान जारी किया था। उनकी धमकियों के बावजूद राज्य में 77 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसे लेकर माओवादियों के अंदर एक खीझ थी और वह पिछले कुछ समय से किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में थे। इतनी सूचना के बावजूद यदि माओवादियों ने सुरक्षा देने वालों को ही मार डालने की क्रूर योजना को साकार कर दिया तो इसे उनकी सफलता कहें या प्रशासन की विफलता? पिछले 28 फरवरी को भी माओवादियों ने दंतेवाड़ा जिले के बचेली में इसी तरह पुलिस पार्टी पर हमला कर पांच जवानों को मारा था। उनके लिए तो यह ऐसी विजय है जिसे वे बराबर अपने लड़ाकों का हौंसला बढ़ाने और आगे की हिंसक योजना की रणनीति बनाते समय चर्चा करेंगे। हमले में शहीद सारे जवानों के हथियार, वायरलेस सेट और बाकी सामान लूट लिया। लूटे गए हथियारों में एके 47 से अलावा अंडरबैरल ग्रेनेड लांचर और लाइट मशीनगन जैसे हथियार हैं। यानी सुरक्षा बलों का खून बहाने का सफल कारनामा और बोनस में इतने ज्यादा हथियार...! उनके लिए तो उन्मादित होने का समय है। निस्संदेह, जिस तरह उनने मई में कांग्रेस नेताओं को मारने के बाद हथियार लेकर नृत्य किया था वैसे ही कर रहे होंगे। इन सारी स्थितियों को समझने के बावजूद यदि वे इस तरह सफल हमला करने और बिना किसी खरोंच के बच निकले हैं तो यह हमारी विफलता ज्यादा है। 
वास्तव में यह दुःखद और क्षोभ पैदा करने वाला सच स्वीकारने में कोई समस्या नहीं है कि मई में एक पार्टी के समस्त नेतृत्व को गंवाने के बावजूद जितनी तैयारी और चौकसी होनी चाहिए थी उतनी नहीं है। जब हम जानते हैं कि एक छोटी चूक उनके लिए भयानक सफलता का कारण बन सकता है तो फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया। गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सहित नौ राज्यों को जो अडवाइजरी भेजी थी, उसमें माओवादी हमले की आशंका जाहिर करते हुए अर्धसैनिक बलांें पुलिस को सुरक्षा बढ़ाने का निर्देश दिया गया है। करीब चार वर्ष पूर्व 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में पहली बार माओवादियों ने  ने गश्त करने निकले जवानों पर ऐसे ही हमला कर दिया था जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे और तीस से ज्यादा जवान घायल हुए थे। उस घटना के बाद संख्या में तो ये जवानों को मौत के घाट उतारने में सफल नहीं हुए, लेकिन यह ऐसी दूसरी वारदाता है जिसका स्थान दूसरे नंबर पर आएगा। हां, 12 जुलाई 2009 को राजनांदगांव में तीन हमलों में इनने 30 जवानों की हत्या कर दी थी। सुरक्षा बल माओवादियों के निशाने पर हमेशा से रहे हैं। 2010 में सबसे ज्यादा 168 जवान और पुलिसकर्मी मारे गए। उस संख्या को वे पार करने की कोशिशें लगातार करते हैं। 
ध्यान रखिए माओवादियों ने 6 अपै्रल 2010 के हमले को बड़ी उपलब्धि बताते हुए हमले की सीडी भी जारी की थी जिसमें जवानों को घेरकर उन पर हमला करने, शहीदों के शवों को ले जाते सुरक्षा बल के जवानों की क्लिपिंग शामिल की गई थी। ऐसा ही उनने कांग्रेस नेताओं के हमलों का भी किया था और संभव है इसकी भी वे इसी तरह सीडी बनाएं। वास्तव में ऐसी एक सफलता उनका हौंसला और संगठन की आयु बढ़ाने में बहुत बड़ा योगदान कर देता है। यदि वे हिंसा की योजना में सफल नहीं हों तो उनका अंत हो जाएगा, क्योंकि साथी ही निराश होकर भाग खड़े होंगे एवं नए लोग उनके साथ न आएंगे न समाज उनसे डरेगा। इसलिए ऐसे हमले का परिणाम केवल जवानों के खून बहने तक सीमित नहीं होता, माओवादियों की ताकत बढ़ाने का मुख्य आधार बन जाता है। अगर इस दृष्टि से देखें तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि लगातार कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ताकत बनी रहने और नए लड़ाकों के उनके साथ जुड़ने का कारण हम स्वयं हैं। माओवादी चाहे जो भी दावा करें, उनकी उत्पत्ति के पीछे समाज के निचले तबके को आर्थिक व राजनीतिक ताकत देने का भाव भले रहा होगा, उनकी हिंसा को अब समाज में आम स्वीकृति नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में लाख कठिनाइयां झेलकर और जान पर खेलकर भी लोगों का मतदान के लिए निकलना वस्तुतः उनका नकार ही था। किंतु इसको प्रशासनिक चुस्ती और सतर्कता से जितना सुदृढ़ किया जाना चाहिए था, नहीं किया गया है। यह समझ से परे है कि लगातार प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, गृह सचिवों.... द्वारा आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताने और हर संभव सुरक्षा व्यवस्था के दावों के बावजूद वे ऐसे हमले करने में सफल क्यों हो पा रहे हैं!