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नारी, गरीबी और निराशा

25 Oct 2006      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

आजकल विकास, विकसित जैसे पदों का प्रचलन बढता जा रहा है । आपको यह जानकर शायद आश्चर्य हो गांधीजी ने अपने समग्र चिंतन में ’’विकास‘‘ पद का इस्तेमाल कभी नहीं किया। क्यों नहीं किया या इससे जुडे प्रश्न अनेक हो सकते हैं। लेकिन यह तय है कि विकास की ओट में छिपे उस दानव को अपनी दूरदृष्टि से देख चुके थे जो आज मानव और मानवता के लिए अभिशाप बनता जा रहा हैं।
 
विकास ने गरीबी, भूखमरी और नारी को अपने निशाने पर सर्वाधिक रखा हैं। जिसके चलते नारी और गरीबी को संसार निराशा के आलोक से भर उठा हैं। अब हालत खराब हो रहे है । विकास का  दंभ भरने वाला  यह  समाज के माथे पर हर रोज नारी, गरीबी की हत्या के पाप का बोझ बढ रहा है । हर रोज एक नई कहानी का उदय और अंत गरीबी और नारी के निराशा मय आलोक को ओर जगमगा देती है ।
 
विकास पर इतराने और इठलाने वाले समाज की नारी की निर्मम दशा का ताजा उदाहरण है दिल्ली नगर निगम की पेंशन योजना। जिसमें ६० साल से ऊपर की विधवाओं को हर माह सौ रूपये मदद दी जाती है । खबरनवीशों की जानकारी के आधार पर सामने आया कि पेट की आग के लिए ३० से ४० महिलाओं ने अपने आप को सौ रूपये की विधवा बना लिया। इससे भी गहरे दुःख की पराकाष्ठा तो इसमें है कि इन परिवारों की महिलाओं ने पेट से लडते-लडते अपने जीवन से शादी जैसे संस्कार को भी भूला दिया। वैसे भी यह तय है कि हम कहने को अवश्य ही नारीवादी समय में जी रहे हैं, पर हमारी पाश्विक पुरूष वृत्ति का अहं उसे समाज में दोहरी नागरिकता ही प्रदान करता है ।
 
हम कह सकते हैं कि वैश्वीकरण, उदारीकरण, भूमंडलीकरण के दौर में और कुछ हुआ हो या न हो पर इतना अवश्य ही हुआ वह है नारी का गरीबीकरण । आप और हम ये बेहतर जानते हैं कि जब-जब भी घर-परिवार संकट आता है तो पहली मार नारी पर पडती है और शनि दृष्टि जाती है उसके गहनों-जेवरात पर। वे पहले बिकते हैं, पुरूष नहीं बिकता, उसका स्वाभिमान नहीं बिकता,उसकी इज्जत नहीं बिकती। बिकते हैं तो केवल परवश नारी के आभूषण। तभी तो गुप्त जी को लिखना पडा कि नारी जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल मैं  हैं दwध और आँखों में पानी।
 
दूसरे नारी को मानव या मनुष्य मात्र  के बजाय ’अन्य‘ के खाते में खताकर उसके साथ असमान बर्ताव किया जाता है। उन्हें पुरूष मजदूर के मुकाबले एक तिहाई दियाडी दी जाती है। घर में दूध या अच्छे खाने पीने के मामलें में भी पुरूष आगे है। ऐसी नारी का जीवन गरीबी के अभिशाप से कितना नारकीय हो जाता है। इसकी कल्पना तक हम सिहर उठते हैं।
 
लेकिन नारी निर्बल नहीं हैं। सबल हैं। सक्षम हैं। सशक्त हैं। देर केवल उस पर विश्वास कर उसकी क्षमताओं के सही उपयोग करने की हैं।
 
गुजरात में ’’स्व-नियोजित‘‘ महिला संघ का काम आदर्श है। उन्होंने बतला दिया है कि मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता और पूरा विश्वास अगर मिला जाय तो वे किसी भी अंसभव को संभव बनाने सफल हो सकती हैं।
 
इस संबंध में सरकारी योजनाएं असफल है। क्योंकि नारी की निराशा को उसका अभिशाप बनाने की सोची-समझी रणनीतियों के बैनर तले बनी योजनाएँ अपनी संरचना में उनके उत्पादन पर कम उन पर नियंत्रण का ध्यान अधिक रखती है। जो मानवता के लिए अभिशाप है। हमें ऐसी संकीर्ण सोच का त्याग करना होगा।
डाँ ब्रजरतन जोशी 
 

 




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