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भारतीय मुसलमानों ने लिया आतंकवाद का विरोध करने का संकल्प

26 Feb 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

चाहे इसे एक बडी अन्तर्राष्ट्रीय साजिश का प्रमाण माना जाए या इसे वास्तविकता समझा जाए परन्तु हकीकत तो यही है कि इस समय विश्व में कहीं भी आतंकवादी घटना घटित होती है तो सहसा दुनिया का ध्यान इस्लामिक आतंकवाद की ओर ही जाता है। और जब बात इस्लामी आतंकवाद की हो तो आसानी से इसकी जडें इस्लामिक मदरसों से जोड दी जाती हैं। यह आरोप लगाया जाता है कि इस्लामी मदरसे कट्टरपंथी विचारधारा की नर्सरी का काम करते हैं। आरोप है कि मदरसों से शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे बडे होकर मौलवी अथवा अन्य पदवीधारी धर्मगुरु बनकर अपने अनुयाईयों के मध्य ऐसे विचारों का प्रसार करते हैं तथा उन्हें ऐसी धार्मिक वैचारिक सीमाओं में बांध देते हैं जिससे कि वह लोग कट्टर विचारों को अपना लेते हैं तथा उनकी नजर में मात्र इस्लाम ही सबसे बेहतरीन व सच्चा मजहब रह जाता है तथा मुसलमान ही अल्लाह के सच्चे बंदे। और यही कट्टरपंथी विचारधारा अन्य धर्मों व धर्मावलम्बियों के प्रति नफरत का सबब बन जाती है। फिर समय पडने पर अथवा राजनैतिक कारणों से वातावरण में साम्प्रदायिकता फैलने पर यही वैमनस्य साम्प्रदायिक आधार पर इन्सान को इन्सान का दुश्मन बना देता है। और यही रास्ता आगे बढता हुआ आतंकवाद, आतंकवादियों तथा आतंकवादी घटनाओं से जा मिलता है।
  भारत को दुनिया की सबसे बडी मुस्लिम आबादी वाला देश माना जाता है। इतना ही नहीं बल्कि इस्लाम में मुसलमानों का एक विशेष वर्ग जिसे देवबंदी वर्ग कहा जाता है, उसका दुनिया का सबसे बडा और सबसे प्राचीन केंद्र भी भारत के देवबंद कस्बे में ही है। दारुल उलूम के नाम से प्रसिद्घ 1866 में स्थापित किया गया यह दुनिया का सबसे प्राचीन तथा सबसे बडा मदरसा माना जाता है। आरोप है कि इनहीं मदरसों से पढकर निकलने वाले तमाम धर्मगुरु आज दुनिया के कई हिस्सों में कहीं सरेआम तो कहीं लुकछुप कर मुस्लिम युवकों को पथभ्रष्ट कर उन्हें आतंकवाद के रास्ते पर चलाने का काम अंजाम दे रहे हैं। जाहिर है इन परिस्थितियों में दुनिया के इस सबसे बडे इस्लामिक मदरसे की ओर से अधिकारिक रूप से दुनिया को यह बताना जरूरी हो गया था कि वास्तव में दारुल उलूम देवबंद के इस्लामी आतंकवाद के संबंध में क्या विचार हैं तथा इस विषय पर वह अपना क्या नजरिया रखता है।
  इसी उद्देश्य से गत् दिनों दारुल उलूम द्वारा पूरे भारत के लगभग 6॰॰॰ मदरसा प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन दारुल उलूम देवबंद में बुलाया गया। इस सम्मेलन में यह घोषणा की गई कि दारुल उलूम तथा उसके अन्तर्गत आने वाले मदरसों का आतंकवाद अथवा आतंकवादियों से कोई लेना-देना नहीं है। सम्मेलन में उपस्थित मुस्लिम विद्वानों व मदरसा शिक्षकों से यह अपील की गई कि इस्लाम विरोधी तथा राष्ट्र विरोधी ताकतों से न तो प्रभावित हों, न उसे संरक्षण देने का प्रयास करें। बल्कि जिस हद तक हो सके इसका प्रबल विरोध किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश के देवबंद कस्बे में आयोजित हुए इस सम्मेलन को भारत का अब तक का सबसे बडा इस्लामी सम्मेलन माना जा रहा है। इस सम्मेलन की एक और विशेषता यह भी थी कि इसमें मात्र देवबंदी विचारधारा रखने वाले इस्लामिक वर्ग के लोग ही नहीं बल्कि शिया, सूफी, एहले हदीस सहित और भी कई मुस्लिम वर्गों के प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए थे। इस सम्मेलन में पूरी दुनिया में होने वाली सभी आतंकवादी कार्रवाईयों को गैर इस्लामी कार्रवाई घोषित किया गया। समस्त उपस्थित विद्वानों एवं मदरसा शिक्षकों ने हिंसा व आतंकवाद की आलोचना करते हुए एक आतंकवाद विरोधी घोषणापत्र भी पारित किया जिसमें यह घोषित किया गया है कि ‘इस्लाम समस्त मानवजाति के प्रति दया दृष्टि रखने वाला धर्म है। इस्लाम में हिंसा, आतंकवाद व अत्याचार की कोई गुंजाईश नहीं है। सम्मेलन आतंकवाद जैसी गैर इस्लामी गतिविधियों की घोर निंदा करता है। दंगा, फसाद, बेगुनाहों की हत्या, किसी को धोखा देना, कमजोर पर अत्याचार करना आदि बातों की इस्लाम में कोई गुंजाईश नहीं है तथा यह सबसे बडा पाप है।’    इस विशाल इस्लामिक सम्मेलन में इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं तथा मानवीय पहलुओं पर रौशनी डालते हुए यह बताया गया कि इस्लाम सभी मानव जाति के प्रति दयादृष्टि रखने वाला ऐसा धर्म है जो सभी इन्सानों के बीच समानता, करुणा, प्रेम व सौहार्द्र का संदेश देता है। सम्मेलन में मदरसा शिक्षकों से ऐसी सभी गतिविधियों से दूर रहने, ऐसे असामाजिक तत्वों को पनाह न देने, उन्हें बेनकाब करने तथा उनका विरोध करने की सलाह दी गई है। सम्मेलनकर्ता इस बात से व्यथित भी नजर आए कि इस्लाम, आतंकवाद जैसी घटनाओं को लेकर बदनाम हो रहा है। इस सम्मेलन में अन्य मुस्लिम वर्गों के लोगों का भाग लेना भी एक अत्यन्त सकारात्मक व सराहनीय कदम था। अनेकों ऐतिहासिक मतभेदों को लेकर अपना अलग-अलग पंथ चलाने वाले विभिन्न इस्लामिक वर्ग के लोग जो अक्सर एक दूसरे के खून के प्यासे नजर आते हैं, उन सभी मुस्लिमपंथों के प्रतिनिधियों ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने आपसी मतभेद भुलाने व एकजुट होने की भी अपील की। बेशक दारुल उलूम के इस आयोजन की तारीफ की जानी चाहिए। दारुल उलूम द्वारा आतंकवाद का विरोध करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर मुस्लिम एकता स्थापित करने की जो बात कही गई है, वह भी दुनिया में फैले आतंकवाद में कमी लाने में सहायक सिद्घ होगी। परन्तु मदरसे की इस काबिले तारीफ घोषणा व अपील के बावजूद, क्या दुनिया के इस्लामिक मदरसे अपने ऊपर लगे इन आरोपों को नकार सकेंगे कि कट्टरपंथी इस्लामिक शिक्षा का प्रचार व प्रसार अब तक उन्हीं के माध्यम से नहीं किया जाता रहा है? यदि नहीं तो मुशर्रफ को क्यों करना पडा था इस्लामाबाद में ऑप्रेशन लाल मस्जिद? किस विचारधारा से ग्रसित थे उस मदरसे के बच्चे। कहां से और क्यों पहुंचे थे उस मदरसे में इतने खतरनाक हथियार? तालिबानी विचारधारा आखिर किस चीज का नाम है। कहां से पनपती है यह तालिबानी अथवा कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा? कौन है मौलाना मसूद अजहर या उस जैसे और जहर उगलने वाले कठमुल्ले? कहां से ग्रहण की थी इन्होंने जेहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाने की शिक्षा?
  इस्लाम धर्म की विशेषताओं को मुस्लिम विद्वानों द्वारा प्रचारित करने से कुछ अधिक लाभ नहीं होने वाला है। क्योंकि इसकी समानता, करुणा, दया व सद्भाव जैसी शिक्षाओं से तो मुसलमान ही नहीं बल्कि  सारी दुनिया वाकिफ है। परन्तु इस्लामिक विद्वानों को यह स्वीकार करने में कोई गुरेज हरगिज नहीं होना चाहिए कि चाहे वह मदरसे की शिक्षा हो अथवा मदरसे जैसी मां बाप से मिलने वाली घरेलू तालीम। दरअसल इस्लाम धर्म को और वह भी इस्लाम धर्म के भीतर अपने ही पंथ विशेष को सबसे सही मार्ग पर चलने वाला बताना तथा केवल अपने ही पंथ को जन्नती (स्वर्ग का दावेदार) समझने की अवधारणा ही उनमें यह विचार अपने आप पैदा कर देती है कि उनके सिवा दुनिया का शेष समाज न तो अल्लाह वाला है न ही स्वर्ग का अधिकारी। और यही अवधारणा अन्य समुदायों के प्रति नफरत व अनेकों अन्य बुराईयों व मतभेदों को जन्म देती है, यहां तक कि आतंकवाद को भी।
  फिर प्रश्न यह है कि क्या आतंकवाद का विरोध करने की घोषणा मात्र से अथवा इससे अपने संबंध न होने की बात कहने भर से मदरसा शिक्षकों अथवा मदरसे में पढने वाले बच्चों में किसी प्रकार का मानसिक परिवर्तन देखने को मिल सकेगा, यह संदेहपूर्ण है। इसके लिए सबसे पहले इस्लाम के सभी पंथों के पंथ प्रमुखों को एकजुट होना होगा। खासतौर पर शिया-सुन्नी, देवबंदी, बरेलवी, वहाबी, अहमदिया, एहले हदीस, सूफी आदि सभी प्रमुखों को केवल अस्थायी रूप से नहीं बल्कि स्थाई रूप से एकजुट होने के असम्भव से लगने वाले प्रयास को सम्भव कर दिखाना होगा। उसके पश्चात कुरान शरीफ की उस शिक्षा को अपना मुख्य आधार बनाते हुए मुस्लिम बच्चों के मस्तिष्क में धारण कराना होगा कि जिसमें कि कुरान शरीफ ने लकुमदीन कुमे वाली दीन अर्थात तुमको तुम्हारा धर्म मुबारक और हमें हमारा जैसी इंसानों को जोडने वाली बात कही है। प्रत्येक धर्म के सभी धर्मगुरुओं को यह बात अच्छी तरह अपने जेहन में बसा लेनी चाहिए कि जब तक हम किसी भी दूसरे धर्म का सम्मान नहीं करेंगे तब तक कोई दूसरा भी हमारे धर्म का सम्मान नहीं करेगा। और नैतिक रूप से भी यदि हम किसी को आदर व सम्मान नहीं देते तो हमें आदर व सम्मान पाने का भी कोई अधिकार नहीं है। केवल यही शिक्षा इस्लाम को भविष्य में आतंकवाद के आरोपों से बचा सकती है तथा इस्लाम के सच्चे व वास्तविक स्वरूप को दुनिया के समक्ष पेश कर सकती है। अतः मुस्लिम धर्माधिकारियों का कर्त्तव्य है कि वे अपने अनुयाईयों को आतंकवाद का विरोध करने के साथ-साथ अन्य समुदायों के लोगों से भी प्रेम व सद्भाव से पेश आने उनके साथ मिलजुल कर रहने तथा उनके दुःख सुख में, एक दूसरे के त्यौहार व उत्सव में भी शरीक होने का सबक सिखाएं, तभी इस्लाम का मानवीय पक्ष उजागर हो सकेगा।


तनवीर जाफरी - 
tanveerjafri1@gmail.com



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