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चमत्कारी कटोरे

20 May 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

गांव के लोग ज्यों ही कोई पकवान पूरा करते दर्जनों नए पकवान हाजिर हो जाते अतिथियों ने रूच-रूच भोग लगाया। घर-घर चमत्कारी कटोरे की बात फैल गई। उस गांव में एक अमीर आदमी रहता था। वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं गिनता था। उसने कटोरों के स्वामी किसान और उसकी पत्नी को उसने कई उपहार दिए और जादुई कटोरे मिलने का रहस्य जान लिया। घमंडी अमीर ने सोचा, इसमें क्या मुश्किल है! यह तो बाएं हाथ का खेल है। वह तेजी से घर गया और रसोइए को भांति-भांति के राजसी व्यंजन बनाने का आदेश दिया। अगले दिन सुबह वह पालकी में बैठा और कहारों को भगाते हुए तिराहे वाले बरगद के नीचे पहुंचा। वहां एक बडी टोकरी में महंगे से महंगे पकवान सजा और टोकरी को बरगर के नीचे रख दिया। कहारों को उसने शाम को वापस आने को कहकर लौटा दिया और खुद नींद का बहाना करके लेट गया। पर नींद तो उसने कोसों दूर थी। वह यह देखने के लिए बहुत व्यग्र था कि वनदेवियां कब आती है और क्या करती है। वह देर तक लेटा रहा। आंखिर उस पर नींद हावी हो गई। घडी भर बाद उसकी आंख खुली तो वह हडबडाकर उठ बैठा और इधर-उधर देखा। उसके पास चार अजीब-से कटोरे पडे थे और टोकरी खानी थी। आखिर वह सफल हुआ। वैसे अपनी सफलता पर उसे कभी संदेह नहीं हुआ था वनदेवियों के लिए वह मानवी व्यंजनों में से सबसे स्वादिष्ट और सबसे महंगे राजसी व्यंजन जो लाया था। उसकी इच्छा वे कैसे पूरी नही करती! और देखो, जादुई कटोरे उसे मिल गए। कहारों को पहले से भी तेज भगाते हुए वह घर पहुंचा। उसने घरवालों को आदेश दिया कि वे दौडकर जाएं और गांव के घर में यह खबर पहुंचा दें और भोज का निमंत्रण दे दें।
गांव वाले चारों दिशाओं से उसके भोजनकक्ष की ओर उमड पडे। कुछ ही दिन पहले हुए भोज की याद से उनके मुंह में पानी भर आया। आज फिर भोज, और वह भी साहूकार के यहा! कइयों ने दिन भर कुछ नहीं खाया। ताकि मेजबान की दरियादिली का आनंद उठाया जा सके। जरीदार पगडी, कुंडली और हीरे की अंगूठी डाले हुए नौकरों का मुखिया कटोरों के सामने खडा हुआ। उपस्थित अतिथियों को दिव्य व्यंजन परोसने का आदेश दिया। उसकी आवाज की गूंज अभी विलीन भी नही हुई थी कि कटोरों में से बीसियों आदमी निकले। वे पहलवानों सरीखे लगते थे। उनकी बांहों की मछलियां फडक रही थी। कटोरों से निकलते ही वे मेजबान और भूखे मेहमानों पर झपटे। उन्होंने सबको बारी-बारी से पकडा-झटके से चमचमाते उस्तरे निकाले और बडी तत्परता से उनके सर मूंडने लगे। एक-एक सर की उन्होंने ऐसी जोरदार घूटाई की कि वे तांबे की देगची के पेंदे की तरह चमकने लगे। पहलवानों ने कहा-जो चोरी और चालाकी करके इन कटोरों को पाने की कोशिश करता है उसका यही हाल होता है।




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