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RSS Friday, September 03, 2010




Editorial

देशभक्त के भरोसे पर ठेस

क्रिकेट के नाम पर करोडो -अरबों रूपये लुटा देनी सरकार हो या भारत की आजादी को कैश करने वाली व्यावसायिक कम्पनीयाँ और या हो खुले आम लोगों से देश सेवा के नाम पर करोडो रूपयों बटोकर वाले स्वयं सेवी संगठन इन कीसि को भी कश्मीर सिंह और ऐसे ही अन्य देशभक्तों की तरफ ध्यान ही नही गया कि उसकी जान की कीमत पर हम सब सुरक्षित होकर प्रगति के पथ पर आगे बढ रहे है। रिहाई के अगले दिन हुए एक पत्रकार वार्ता मे जब...

धैर्य रखिये, सांसद साहब जरूर आएगें

बीकानेर वासियों को शुभकामनाएं, जनवरी में जरूर आऊंगा-धर्मेन्द्र और धर्मेन्द्र की शुभकामनाएं, ये खबर दो स्थानीय अखबारों मे पढने को मिलि, यदा कदा तीज त्योंहार और नये दिन ऐसी खबर पढने को मिल ही जाती है। आप समझ गये होंगे की हम किस बात पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहे है, जी हाँ बिल्कुल शहर की पीडा - और ”अपने“ सांसद साहब की बेइंतहा बेरूखी का और नये दिन पर जले पर नमक छिडकने जैसे व्यवहार की। voter of Bikaner

संतुलन रखिए नहीं तो .......

  संतुलन जीवन का अनिवार्य पहलू होने के साथ जीवन के उद्भव और विकास का  सबसे सुन्दर स्वरूप है। जीवन में संतुलन का होना जीवन की समग्रता और सांझा प्रवृति का प्रमाण

असमंजस का उदार चेहरा

धर्म निरपेक्ष मूल्यों पर संकट का सैलाब और प्रभावी होता जा रहा है। क्योंकि पिछले कुछ लम्बे समय से भारतीय मुसलमान इन मूल्यों की विश्वसनीयता पर संदेह करने लगे हैं। जाति मुखर है पर उसका अंतरतम मौन। सच्चर कमेटी की रिर्पोट के बाद से तो इन संदेहों की प्रमाणिकता और पुष्ट होगी। पहले भी कई आयोग यह कह चुके हैं कि अपने मजहबी कठमुल्लेपन की शिकार यह जाति पिछडी हुई है। अतः राजिन्दर सच्चिर कमेटी से यह बात और प्रमाणित होती है तो कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। असल...

कितनी सार्थक है ज्ञान आयोग की सिफारिशें

डॉ. मनमोहन सिंह देश के ही नहीं वरन् विश्व के जाने माने अर्थशास्त्री हैं। ज्ञान के प्रति सम्मान और शिक्षा के प्रति उनकी सजगता उनकी निजी पहचान भी है। सैम पित्रोदा की अगुआई में ज्ञान आयोग का गठन उनकी ज्ञान निष्ठा और शिक्षा के प्रति संवेदनशीलता का प्रमाण है। ज्ञान आयोग ने कुल ही प्रधानमंत्री को अपनी अंतिम रिर्पोट सौंपी है। आयोग ने जो सिफारिशें की हैं वे राष्ट्र के शिक्षा और ज्ञान क्षेत्र के सुधार की कमियों को तो उजागर करती ही हैं साथ ही उसमें परिवर्तन की संभावनाओं...

भाषा प्रौद्यौगिकी पर भी गौर करें

मानव निर्मित सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भाषा की अहम भूमिका है। अन सभी क्षेत्रों के कार्य व्यवहार को संपूर्ण प्रतिनिधित्व देते हुए भाषा अपना बहुआयामी व्यक्तित्व गढती है। इस प्रक्रिया में भाषा स्वयं संस्कारित, परिष्कृत और परिवर्धित होती है। उसका लचीला व्यवहार उसे नये परिवेश में नये आयाम स्थापित करने की शक्ति देता है। अगर भाषा अपने व्यवहार में ऐसा परिवर्तन न लाए तो ही वह ’’भाषाई ब्लैक होल‘‘ का ग्रास बनने से बच जाती है। अंग्रेजी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। इस प्रौद्यौगिकी बहुत समय में...

विकास के साझीदार सब बनें

भारत विविध धर्मों, संस्कृतियों और जातियों का संगम है। इसके बारे में कहा भी जाता है कि यही विविधता हमारी भावात्मक एकता को अखण्ड बनाती है। लेकिन जब तक यह बात सामाजिक संरचना में मजबूती से व्यावहारिक रूप में पूरी होती नहीं दिखाई देगी। तब तक इसे आधार मानकर चलना भी ज्यादा समझदारी नहीं होगी। मुद्दा चाहे प्रधानमंत्री उठाए अथवा कोई अन्य पार्टी पर सच्चाई यह है कि देश में निवास कर रहे बहुसंख्यक मुसलमान पिछडे हुए है। जबकि हम इस तथ्य से भी भली  भातिं परिचित है कि जब...

बाबा का बडबोलापन

हिन्दुस्तान अध्यात्म संस्कृति को जीवन व्यवहार में ढालकर चलने वाला देश है। यहाँ का नागरिक अपनी आध्यात्मिक उन्नति के प्रति भी उतना ही सजग, सतर्क और संवेदनशील है जितना जीवन जगत् से जुडे दूसरे अनेक पक्षों के प्रति। यह हमेशा होता आया है कि संस्कृति में विकृति लाने का काम सत्ताएँ ही करती रही है। अब वह सत्ता चाहे धर्म की हो या अर्थ की अथवा राजनीति की इससे विकृति को व्यवहार में लाने की प्रकृति और प्रक्रिया  पर कोई अधिक फर्क नहीं पडता । मध्यकाल से लेकर अब तक का इतिहास...

हे ईश्वर इन्हें माफ कर दों।

 यह खबर युग है। हम खबर समय में खबरों के साये में पल-पढ रहे हैं। खबर का हिस्सा होना हमारी नियति हो गया है। बाजार के लिए खबर ब्रह्मास्त्र है। जिसका संधान वह अपने हित में अपनी छुपी हुई रणनीति के तहत करता है। खबर युग में खबर  ही  सर्वोपरि धर्म है। बाजार इस धर्म का नियामक है क्योंकि प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष खबर के प्रभाव से जो...

नारी, गरीबी और निराशा

आजकल विकास, विकसित जैसे पदों का प्रचलन बढता जा रहा है । आपको यह जानकर शायद आश्चर्य हो गांधीजी ने अपने समग्र चिंतन में ’’विकास‘‘ पद का इस्तेमाल कभी नहीं किया। क्यों नहीं किया या इससे जुडे प्रश्न अनेक हो सकते हैं। लेकिन यह तय है कि विकास की ओट में छिपे उस दानव को अपनी दूरदृष्टि से देख चुके थे जो आज मानव और मानवता के लिए अभिशाप बनता जा रहा हैं।   विकास ने गरीबी, भूखमरी और नारी को अपने निशाने पर...

छात्र राजनीति के सरोकार

 छात्र किसी सभ्यता और संस्कृति की ऊर्जा के अक्षय भंडार हैं। यही ऊर्जा समाज के समग्र विकास के पथ को प्रशस्त करती है । ऐसे में युवाओं संस्कारित करने की आवश्यकता तो है ही साथ एक उत्तरदायी समाज के पहचान की कसौटी भी यही ही है कि वह अपने आने वाले कल को अपनी परम्परा, अनुभव और ज्ञान से इस प्रकार दीक्षित करे कि वे जीवन की जटिल राहों को आसान बना सके...

अब नहीं तो कब जागेंगे

घटना की नियति है घटित होना। घटित व्यक्तिगत नहीं सामूहिक होता है । अतः घटना का प्रभाव संपूर्ण समाज पर समान रूप से पडता   हैं। लिंग अनुपात इस समय समाज के सामने आ रही मुख्य परिघटना है । आए दिन समाचार पत्रों चैनलों एवं मीडिया के अनेक-अनेक माध्यमों के जरिये हम लिंग अनुपात की असमानता के मुख्य कारण भूण हत्या पर कुछ न कुछ देखते, पढते और सुनते हैं। पिछले दिनों पंजाब के पताडा कस्बे के कुंओं में दर्जन भर से ज्यादा कन्या भूण मिले।...

सही समय, सही निर्णय

 सुप्रीम कोर्ट ने आज आंध्रप्रदेश के राज्यपाल श्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा एक कांग्रेसी कार्यकर्ता के अपराध क्षमादान के निर्णय को रदद् कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल व राष्ट्रपति को दिया गया क्षमादान का अधिकार उनका विशेषाधिकार नहीं है। न्यायालय उनके द्वारा किए गए फैसले की समीक्षा कर सकेंगे। इन दिनों अफजल को क्षमादान दिए जाने के संवेदनशील मुददे पर पूरे देश में कई  नई मत सामने रहे हैं। एक पक्ष का मामला है कि बुद्द,गॉधी  की इस धरती पर मानवता व करुणा जैसे मूल्यों के प्रसार के...

खबरम् खबरें खबरामि

यह खबर युग हैं। खबर युग में 'खबर' की खबर रखना हमारे लिए जरुरी होता जा रहा हैं। 'अपनी खबर' इस खबर युग में खोती जा रही हैं। सब जन खबरी हो गए है होते जा रहे हैं। हर घटना या दुर्घटना नहीं रही वरन् एक खबर हो गई हैं। अगर किसी को कुछ मालूम नहीं है तो वह है 'अपनी खबर' क्योंकि खबरशास्त्र का पहला सिद्धान्त है कि खुद को खुदी से हटा और दूसरों पे  ध्यान बंटा। अब समस्या यहीं से खडी होती है कि हमें जमाने भर की...

भाजपा या झगडपा

 इन दिनों प्रदेश भाजपा के सितारे गर्दिश में हैं। भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्त समाज की परिकल्पना को साकार करने वाली पार्टी अपनी अन्तर्कलह से परेशान ही नहीं हतप्रभ भी है। भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ इसकी आवाज जितनी बुलंद थी आज घर के संकट में इन्हीं तीनों की उपस्थिति से वह मन्द से बन्द की ओर अग्रसर है। प्रदेश भाजपा के मुखिया इन दिनों डाँ. महेश शर्मा हैं। वे छल, छन्द् और उठापटक की राजनीति से परे 'मिस्टर क्लीन' की छवि वाले नेताओं में अग्रणी हैं। पर...

महारानी की मुश्किलें

भाजपा सरकार तीन वर्ष पूरे करने जा रही है। जैसे-जैसे सरकार का कार्यकाल बढ् रहा है। वैसे-वैसे समस्यों की सूची में बढोतरी हो रही है। वैसे शासन के सामने चुनौतियॉ  आनी तय है और प्रशासन उनसे सुलटना भी बखूबी जानता है पर प्रदेश का सरकारी तन्त्र पिछले तीन वर्षों में समस्याओं को अपने ही बनाए भटकावों के माध्यम से सुलटाने की बजाय उलझाता ही जा रहा है। हमारी मुख्यमन्त्री थोपी हुई है। बाहर की है। ऐसा संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है। अत: संगठन के गले से आज तक वे...

बन्द क्यों न हो बन्द

 आजकल बंद का बाजार तेज है। समस्याराष्ट्रीय  हो या व्यक्तिगत सत्ता के संबंधों का समीकरण ठीक करने के लिए तकनीक एक ही उपयुक्त है बन्द। असल में बन्द पीछे जो सोच काम करता है वह सार्वजनिक सहानुभूति का है। किसी घटना, हादसे या सैद्धान्तिक प्रतिरोध की यह पद्धति गांधी के सविनय अवज्ञा, असहयोग और् सत्याग्रह के मिले-जुले विचार की व्यावहारिक मिसाल है। क्योंकि जिस घटना, हादसे या प्रकरण पर व्यक्ति अपने आत्मविश्वास को मजबूत नहीं पाता और साथ ही अहिंसक विरोध के माध्यम से अपनी बात भी रखना चाहता है। उसका सबसे...

संकट मे है सरकार

  सरकार और संकट की राशि एक है। दोनों में स्वभाव व प्रकृति में असमानता के बजाए समानता अधिक जान पडती है। इतिहास गवाह है कि सरकारे संकटों के साये में ही पलती रही है। कारण साफ है कि सरकार जब-जब सत्ता  में परिवर्तित होती] तब-तब आम अवाम् की विडम्बनाएँ, विचलन व भय बढते जाते हैं। लोकतंन्त्र का एक फायदा और कायदा यह भी है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के चलते किसी भी किस्म के मानवीय मूल्य के हनन पर हम अपनी बेबाक राय दे सकते हैं। आज मंगलवार है।...

सम्पादकीय

प्रकृति के पालने मे पलते परिवर्तनों की  धारा का नाम ही जीवन है केवल एक  जैविक घटना ही नही है वरन् जगत के कारण कार्य श्रंखला की लम्बी कहानी भी है। जीवन का विस्तार  उससे जुडे विविध पक्षो वं समय की मांग के अनुसार होता जा रहा है|   हम एक ऐसे समय में जी रहे है जो इतिहास में अपने तीव्रतम परिवर्तनों के कारण विशेष महत्व रखता है| एक अनुमान के अनुसार हर चार वर्ष मे ज्ञान दो गुणा होने की गति से बढता जा रहा है| कम्प्यूटर...

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