होली का त्यौंहार। भारतीय संस्कृति में रंगों का त्यौंहार। होली का नाम आते ही एक मस्ती एक उमंग मन में छा जाती है और लगता है जैसे सारी कायनात ही रंगों में खिल उठी है। क्या है होली और क्यों मनाते हैं होली का त्यौंहार। आईये कुछ पडताल इस बारे में ः-
एक तो एक सर्वज्ञात तथ्य है कि होलीका राक्षस हरिण्यकश्यप की बहन थी जो अपने ही भतीजे व हरिण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को मारना चाहती थी। होलीका प्रहलाद को मारने के लिए आग में बैठी और होलीका को वरदान था कि वह अग्नि स्नान कर सकती है और आग उसे जला नहीं सकती। लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था और प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई और इसी दिन से शुरू हुई होली को जलाने की परम्परा जो आज तक अनवरत निभाई जाती है।
रंगों के इस त्यौंहार पर भांग पीने व अश्लील बोलने की भी परम्परा रही है। हमने जाना कि आखिर होली के मौके पर यह परम्परा क्यों निभाई जाती है और क्यों भांग पीने और अश्लील बोलने को सामाजिक मान्यता मिली हुई है।
बीकानेर के पंडित श्याम सुन्दर व्यास से बात करने पर पता चला कि होली पर भांग पीना व अश्लील बोलना उन्माद से जुडा हुआ तत्व है। पंडित व्यास के अनुसार ऐसा करने से उन्माद पर नियंत्रण होता है।
होली का त्यौंहार फाल्गुन माह में व बसंत के मौसम में मनाया जात है। पंडितों का मानना है कि यह एक ऐसा मौसम है जब पूरी प्रकृति उन्मादी रूप में होती है और प्रकृति के कण कण में उन्माद छाया रहता है। प्रकृति के इस उन्माद को कम करना मनुष्य के लिए जरूरी है क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और उसकी मर्यादाऍं है जिससे बाहर रहकर वह जी नहीं सकता। इन्हीं मर्यादाओं के पालन के लिए होली के मौके पर भांग पी जाती है और कोई और नशा किया जाता है तथा अश्लील भाषा का प्रयोग किया जाता है।
हम देखते हैं कि बसंत के मौसम में पतझड के बाद पेडों में नए पत्ते आते हैं और इन पत्तों का रंगा सुर्ख लाल व पीलापन लिए होता है। यह रंग यौवन व कामुकता का प्रतीक है। इसका मतलब प्रकृति पर भी इन दिनों में यौवन छाया रहता है। माना जाता है कि इन्हीं दिनों में मनुष्य के शरीर का रक्त बदलता है और नया खून बनता है। यह नया खून नया जोश व उमंग लिए होता है। इस जोश पर उमंग पर नियंत्रण करना भी जरूरी होता है। हमने अपने बडे बुजुर्गों से सुना है कि इन दिनों में नए पत्ते को खाने से खून साफ होता है और डॉक्टर भी ऐसा मानते हैं। प्रकृति मनुष्य के इस उन्माद पर नियंत्रण करने का पूरा प्रयास करती है।
मनुष्य ने भी अपने इस उन्माद की स्थिति को समझा व प्रयास किया कि इस उन्माद को रोका जाए और इसी लिए होली के अवसर पर भांग पीने की परम्परा पडी। भांग एक पौराणिक व सात्विक नशा है जिसे करने से मनुष्य उन्मादी नहीं होता। हमने देखा है कि शराब पीने से व अन्य प्रकार का नशा करने से मनुष्य क्रोधी हो जाता है और उन्माद करता है लेकिन भांग एक ऐसा नशा है जो मनुष्य को उन्मादी नहीं बनाता। भांग एक सात्विक नशा है और भांग पीने से मनुष्य की सारी कि्रयाऍं शिथिल हो जाती है। भांग की यही प्रकृति मनुष्य के शारीरीक उन्माद पर नियंत्रण करती है और शायद इसीलिए होली पर भांग पीने की परम्परा शुरू हुई जो आज तक निभाई जा रही है।
होली के अवसर पर अश्लील बोलने की भी परम्परा रही है। इसके पीछे भी उन्माद पर नियंत्रण की बात सामने आती है। इन दिनों में सैक्स को लेकर शारीरीक व मानसिक उन्माद भी अपने चरम पर होता है। इस उन्माद पर भी नियंत्रण करना जरूरी होता है वरना यह उन्माद असामाजिकता पैदा कर सकता है और यही कारण है कि होली के अवसर पर खुल कर अश्लील भाषा का प्रयोग किया जात है और अपने मन व शरीर की इस अश्लीलता को बोल कर निकाल दिया जाता है। ऐसा करने से शारीरीक सैक्स शिथिल पड जाता है और मानसिक सैक्स पर भी नियंत्रण होता है। इसी कारण होली पर अश्लील बोलने की परम्परा पडी है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि होली उन्माद पर नियंत्रण का त्यौंहार है जो एक सामाजिक समरसता को पैदा करता है व मनुष्य के सामाजिक होने की सार्थकता को साबित करता है।
श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘
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