डूब मरो हिंदुस्तांवालो, लानत इस खामोशी पर...
Posted: 09/08/2007 22:10:26
कर्नल वी . वसंत ने भारत - पाक सीमा पर आतंकवादियों से लड़ते हुए जान दे दी। लेकिन मीडिया के लिए यह खबर नहीं बन सकी। आम भारतीय को जैसे इन विषयों में कोई दिलचस्पी नहीं रही। हो सकता है , सैनिक जान देने के लिए ही सेना में जाता है इसलिए किसी सैनिक की मौत पर न तो कोई हल्ला होता है और न ही कोई पॉलिटिशन बयान देता है। हमारा सैनिक आज जवाब चाहता है , आखिर उसके त्याग की इस देश के लिए कोई कीमत है या नहीं ? पिछले तीन दिनों में तीन सीन भारतीय पटल पर उभरते हैं। तीनों ही दृश्यों में आतंकवाद स्थायी भाव है। संजू बाबा यानी संजय दत्त 1993 के बम्बई के सीरियल बम ब्लास्ट के सिलसिले में खतरनाक हथियार एके-56 राइफल रखने के दोषी पाए जाने पर 6 साल के लिए जेल भेजे जाते हैं , मो. हनीफ लंदन के ग्लास्गो एयरपोर्ट पर हमले के अभियुक्तों के साथ जुड़े होने के कारण ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तारी के बाद भारत वापस आते हैं , और तीसरा दृश्य है सीमा पर आतंकवादियों के साथ लड़ते हुए कर्नल वी. वसंत की अपनी जान न्यौछावर कर देते हैं। आम भारतीय को संजू बाबा और हनीफ के साथ सहानुभूति हो रही है , जिसमें किसी को कोई परहेज़ भी नहीं होना चाहिए। लेकिन कर्नल वसंद ने किसी का क्या बिगाड़ा था , जिनकी मौत पर आंसू बहाने के लिए उनके परिवार के सिवाय कोई नहीं है ? राजकीय सम्मान के साथ तिरंगे में लिपटे हुए कर्नल के पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि हो गई और बेंगलूर के संवेदनहीन शहर में किसी को इस बहादुर की याद नहीं आई। उसी दिन बेंगलूर में हनीफ भी पधार रहे थे , सबको उनका इंतजार था , मीडिया में लंबी-लंबी खबरें छप रही थीं , चैनलों पर 24 घंटे उनके बारे में तमाम रहस्योद्घाटन हो रहे थे , लेकिन कर्नल की बहादुरी की एक भी कहानी किसी की ज़ुबान पर नहीं थी। संजू की सजा पर केंद्रीय मंत्रिमंडल को दुख होता है। हनीफ के साथ अल्पसंख्यकों के वोट का मामला जुड़ा था इसलिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री से लेकर सभी तथाकथित सेक्युलर दलों के नेता उनके दर पर अपना चेहरा दिखाने से नहीं चूकना चाहते थे। केंद्र सरकार भी लंदन से लेकर ऑस्ट्रेलिया में चले ट्रायल पर नजरें गड़ाए हुए थी कि कहीं हनीफ के साथ कोई अन्याय न हो जाए। संजय और हनीफ के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, इससे किसी की असहमति नहीं हो सकती लेकिन एक सैनिक जो देश के लिए आतंकवादियों से लड़ रहा था, उसके प्रति भी अन्याय तो नहीं
yes dear I am agree with you and slute your imotion. and I am very sorry for it because I am a Indian. and we salute our army and always slute our soldier. thanks for it.
हम भारतीय शायद अपनी तरक्की सिर्फ बढ़ते सेंसेक्स से जोड़ कर देखते हैं । अपने रणबांकुरों की कुर्बानियों के साथ साथ कुपोषण, गरीबी आदि समस्या को हमने भुला दिया है और दिखावे को भारत की तरक्की मान कर खुश हो रहे हैं । हाल ही में वेबपत्रिका www.raviwar.com पर पढ़ी एक रिपोर्ट से ये बात और भी पक्की हो जाती है ।