Sunday, 01 November 2020

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कहीं भारतीय रेलवे स्टेशन आतंकवादी पनाहगाह तो नहीं?


Writer - Nirmal Rani

गुलाबी नगरी के नाम से प्रसिद्घ भारत का सुप्रसिद्घ पर्यटक स्थल एवं राजस्थान राज्य की राजधानी के रूप में प्रसिद्घ ऐतिहासिक नगरी जयपुर आखिरकार आतंकवादियों के निशाने पर आ ही गई। 68 लोगों की जान लेने वाले आतंकवादियों के इन क्रमवार धमाकों की जांच पडताल अनेकों कोणों से की जा रही है। कभी सीमापार द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की ओर शक की सुई घूमती है तो कभी बंगलादेश का नया नवेला आतंकवादी संगठन हूजी संदेह के दायरे में आता है। कभी इंडियन मुजाहिद्दीन नामक संगठन का परिचय जयपुर धमाके से जोडकर कराया जा रहा है तो कभी सिमी नामक संगठन पर भी शक की सुई घमती है। कहा जा सकता है कि प्रत्येक ऐसी आतंकवादी घटनाओं के बाद संदेह का दायरा इतना बडा कर दिया जाता है गोया कि यह भूसे में सुई ढूंढने जैसा हो। कौन सा आतंकवादी संगठन अथवा कौन से लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, इस बात का सही-सही पता लग भी पाएगा अथवा नहीं। दोषी लोग कानून की गिरफ्त में आ पाएंगे अथवा नहीं, इन सभी बातों को लेकर संदेह बना हुआ है। संदेह का मुख्य कारण यही है कि देश में होने वाली अधिकांश आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वालों का अब तक कोई सुराग नहीं लग पाया है।

परन्तु प्रत्येक आतंकवादी कार्रवाई में एक समानता अवश्य पाई जा सकती है और वह यह कि ऐसी घटनाओं में अधिकांशतयः बेगुनाह आम नागरिक ही मारे जाते रहे हैं। एक दूसरी समानता यह भी है कि हादसे के तुरन्त बाद होने वाली पुलिस कार्रवाई अथवा जांच पडताल में बेगुनाह लोगों को ही जांच पडताल व तफतीश का भी सामना करना पडता है तथा ऐसी घटनाओं में संलिप्त होने के संदेह मात्र से ही संदेह के दायरे में आने वाले अनेकों लोगों को सामाजिक रूप से गहन मानसिक उत्पीडन के दौर से भी गुजरना पडता है। इन बेगुनाह शहीदों तथा संदेह के दायरे में आने वाले बेगुनाह लोगों के व इनके परिजनों के मानसिक उत्पीडन की भरपाई न तो कोई सरकार कर सकती है न ही कोई संगठन। उदाहरण के तौर पर राजस्थान सरकार ने जयपुर बम विस्फोट के बाद राज्य में अवैध रूप से रहने वाले बंगलादेशी नागरिकों के विरुद्घ एक बडा अभियान छेडने का फैसला किया है। बंगलादेशी नागरिकों की जांच पडताल के नाम पर चलाई जाने वाली इस मुहिम का कारण केवल यह बताया जा रहा है कि जयपुर विस्फोट में हूजी नामक जिस संगठन के शामिल होने का संदेह जताया जा रहा है, वह संगठन मूलतः बंगलादेश से संचालित होता है। माना जा रहा है कि यदि हूजी ने इस आतंकवादी कार्रवाई को अंजाम दिया होगा तो संभव है कि उसे जयपुर में अवैध रूप से रहने वाले बंगलादेशियों द्वारा संरक्षण अथवा पनाह दी गई हो। मात्र इसी संदेह को लेकर अवैध बंगलादेशी नागरिकों के विरुद्घ राजस्थान में राज्यव्यापी मुहिम छेडी गई है।
प्रश्ा* यह है कि क्या मात्र बंगलादेशी नागरिक ही भारत में अवैध रूप से रहकर आतंकवाद के फैलने में सहायक साबित हो रहे हैं अथवा कुछ और भी जीते जागते उदाहरण हैं जोकि आतंकवाद को सुरक्षा, संरक्षण तथा सूचना आदि सब कुछ उपलब्ध करवा सकते हैं। इस पर भी गौर करना बेहद जरूरी है। दरअसल भारत, पाकिस्तान व बंगलादेश के लोगों में शारीरिक रूप से प्राकृतिक तौर पर ऐसी समानताएं हैं जिसके कारण पहली नजर में इनमें अंतर कर पाना आसान नहीं हो पाता। वैसे भी मात्र 6॰ वर्ष पूर्व यह सभी एक ही देश, भारत के अंग हुआ करते थे। अतः इन तीनों देशों के लोगों का रहन-सहन, चेहरा, रंग रूप, पहनावा तथा काफी हद तक भाषा भी मिलती जुलती सी हुआ करती है। यही कारण है कि यह लोग भारत जैसे विशाल देश में भीड भरे बाजारों, धार्मिक स्थलों, रेलगाडियों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, पार्क, अस्पताल आदि कहीं भी बडी आसानी से मामूली सा भेष बदलकर अथवा बिना भेस बदले ही घुल मिल जाते हैं। और यही समानता तथा इनका आम भारतीयों जैसा ही दिखाई देना किसी भी बडे हादसे का कारण बन जाता है। यही विशेषता इन अपराधियों के बचकर निकल भागने में भी सहायक होती है।

तो क्या राजस्थान से बंगलादेशी नागरिकों के निकल जाने मात्र से देश में आतंकवादी घटनाओं में कमी आ जाएगी? भारत में तो बंगलादेशी नागरिकों के विषय को लेकर वैसे भी दो तरह की राजनैतिक धारणाएं हैं। एक का रुख अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों के प्रति काफी सख्त है तो दूसरी विचारधारा इनके विरुद्घ नरमी बरते जाने की पक्षधर है। अवैध घुसपैठियों को तो वैसे भी भारत से इसलिए भी निष्कासित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि भारत स्वयं जनसंख्या, गरीबी, बेरोजगारी जैसे कई बुनियादी संकटों से जूझ रहा है। परन्तु बंगलादेशी घुसपैठियों के विरुद्घ राजस्थान में होने वाली कार्रवाई से एक बात जरूर साफ हो जाती है कि चूंकि अवैध रूप से रहने वाले बंगलादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर जो संदेह की स्थिति उत्पन्न हो रही है, उसके चलते ऐसी कार्रवाई की जा रही है। तो क्या अवैध बंगलादेशियों को राजस्थान से खदेडे जाने के बाद भारत को आतंकवादी घटनाओं से छुटकारा मिल जाएगा? शायद नहीं। इसकी वजह यह है कि अवैध बंगलादेशी नागरिकों से कहीं अधिक पहचान की समस्या उन संदिग्ध व्यक्तियों को लेकर होनी चाहिए जोकि लगभग पूरे भारतवर्ष में रेलवे स्टेशन, प्लेटफॉर्म तथा यात्री विश्राम गृहों, स्टेशन के आसपास, पार्क, मन्दिरों, धर्मशालाओं व रेलवे लाईन के किनारे झोपड पट्टियों में आबाद हैं। सुरक्षा एजेन्सियां यदि इनके विरुद्घ एक बडी मुहिम चलाएं तो निश्चित रूप से आतंकवाद के अतिरिक्त बडे से बडा जुर्म, नशीली दवाओं तथा अन्य संवेदनशील नशीली वस्तुओं के क्रय विक्रय तथा सप्लाई व खपत का भी केंद्र इन्हीं स्टेशन पर पनपता मिलेगा। बडे दुःख का विषय तो यह है कि कहीं-कहीं तो पीला वस्त्र पहने इन भिखारी अथवा साधु संत रूपी अपराधियों का अपराध तो बाकायदा पुलिस संरक्षण में पनपता हुआ भी देखा जा सकता है। यात्रियों के सामानों की लूट में भी इस नेटवर्क का अहम योगदान रहता है।

आम लोगों की भावनाओं, उनकी सहानुभूति तथा उनके भोलेपन का फायदा उठाने वाले यह भगौडे, अपराधी तथा निकृष्ट मानसिकता रखने वाले लोग किसी न किसी असाधारण कारणों से अपने घरों को छोडकर रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक जगहों पर स्वयं तो पनाह लेते ही हैं साथ-साथ मात्र पैसे की लालच में यह किसी भी देशद्रोही गतिविधियों में भी शामिल हो सकते हैं। भारत में कई स्थानों पर रेलवे स्टेशन तथा रेलगाडियों में हो चुके धमाकों में इन साधु अथवा भिखारी रूपी अपराधियों का कभी कोई हाथ नहीं रहा अथवा इन हादसों में काम आने वाले विस्फोटकों को लाने ले जाने अथवा इन्हें विस्फोट स्थल पर स्थापित करने में इन लोगों का कभी कोई हाथ नहीं रहा हो आखिर इस बात की क्या गारण्टी दी जा सकती है। समाचार है कि ऐसे ही आतंकी संगठनों द्वारा भारतीय रेल को पुनः निशाना बनाने की चेतावनी दी गई है।

अतः अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों अथवा पाकिस्तानी घुसपैठियों के विरुद्घ कानूनी कार्रवाई तो अवश्य की जानी चाहिए परन्तु दो करोड से भी अधिक की संख्या में पूरे देश में बेरोक टोक दर-बदर भटकने वाले इन साधु वेशधारियों तथा बहुरूपियों के विरुद्घ भी एक बडी मुहिम ठीक उसी प्रकार अथवा उससे भी अधिक गति से छेडे जाने की जरूरत है जैसी कि इन दिनों दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में इनके विरुद्घ छेडी गई है। हमें इस संभावना को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए कि भिखारियों व बाबाओं के रूप में कहीं रेलवे स्टेशन जैसे अन्य सार्वजनिक स्थलों पर तो आतंकवाद पनाह नहीं पा रहा है।


Nirmal Rani  [email protected]