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Presenting the Special Edition of
Prakharji MaharajShri Laksh Chandi MahayajyaDivine Durga
20 Feb to 12 March 2007 held at Dharanidhar Mahadev Temple Sports Ground, Bikaner (Rajasthan)
Contact : 92144-48039, 94600-00188 E-mail: editor@khabarexpress.com
 

 

लक्षचण्डी महायज्ञ :
भारत भूमि सदा सर्वदा से यज्ञादि कर्मो की विराट वसुंधरा रही है। यह भारतिय संस्कृति के प्रतीक पर्याय और संचालक हैं। हमारे शास्त्र कहते हैं कि जीवन में जब भी ऊर्जा का विघटन हो अथवा विविध समस्या हो तो श्रृद्धा श्री दुर्गा सप्तशती द्वारा यज्ञ करने से समस्त बाधाएँ दूर हो जाती है। और जीवनी ऊर्जा का स्वतः अतिशय भण्डारण होता है।

सृष्टि देवासुरी है, जब दैवी शक्ति प्रभावशाली होकर क्रियाशील होती है तो संसार में सुख, समृद्धि, सौभाग्य, सदाचार तथा सर्वत्र सात्विक वातावरण सुरक्षित रहने से सर्वत्र शांति की अनुभूति होती है। जब आसुरी शक्ति की वृद्धि होती है, तो धर्म पालन से मानव की बुद्धि हट जाने से यज्ञ यागादि कर्म लुप्त हो जाने के फलस्वरूप देवत्व शक्ति को क्रियाशील होने के लिए ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है। फलस्वरूप प्रकृति जीवमात्र की आवश्यकता की पूर्ति में असमर्थ हो जाती है और अकाल, बाढ, चक्रवात, भूस्खलन, अग्नि आदि के द्वारा लोग कष्टों को झेलते हैं। आवश्यकता की आपूर्ति के अभाव के कारण इंसान में लोभ, हत्या, लूटमार आदि की कुप्रवृति जग जाती है। इन्हीं कारणों से आतंकवाद अपना फन फैलाये विश्वशांति को ग्रसित कर लेता है।

जब जब आसुरी शक्तियों के उत्पाद के कारण विश्व भयाक्रान्त हुआ, तब तब उत्पात के शमन के लिए ऋषि महर्षियों ने देवाराधन का आश्रय लिया तथा शास्त्रीय मर्यादा के अनुरूप उत्तम कोटि की यज्ञयागादि के द्वारा सुख समृद्धि और शक्ति को पुनस्थापित किया। उन सब के उदाहरण पुराणों में प्राप्त है। वर्तमान समय में भी आसुरी शक्तियों के प्रभाव के कारण आतंकवाद विश्वभर में अपना विष उगल रहा है। भय ,अराजकता, लुटमार हिंसा के कारण सर्वत्र अशांति है। कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि है। वर्षा आदि के अभाव के कारण धरती की नमी सूख जाने से पेड पौधे भी नष्ट हो रहे हैं। हरे पत्तों से ही जीव मात्र को जीवनोपयोगी प्राणवायु प्राप्त होती है। वहीं हरे पेड पौधें जीव के श्वास तथा यांत्रिक विकास से निर्मित कल कारखाने, मोटरकार आदि वाहनों से निकली कार्बनडाईऑक्साइड को अपने में आत्मस्वात कर प्राण वायु को छोडता है, हरियाली के अभाव के कारण ऑक्सीजन में बदलने की प्रक्रिया वृक्षों के द्वारा सम्पादित नहीं हो पा रही है। कार्बनडाईऑक्साइड की अधिकता के कारण स्वच्छ पर्यावरण, स्वच्छ प्राणवायु के अभाव होने से प्राणी मात्र नाना प्रकार के असाध्य रोगों से ग्रसित हो रहे हैं। पहाड की चोटियों पर शीतकाल में बर्फ जमकर जब गर्मियों में पिघलती है तो वही नदियों के माध्यम से खेती में सिंचाई और पीने के पानी के रूप में प्राप्त होती है। प्रदूषित पर्यावरण से बर्फ की कमी के कारण नदियों का जलस्तर भी कम होता जा रहा है। भारत का मुल आर्थिक केन्द्र बिन्दु खेती ही है, वह भी प्रभावित होने से आर्थिक विषमतायें बढ रही हैं। पीने के पानी का अभाव हो गया है। वर्तमान वैज्ञानिक भौतिक संसाधनों के द्वारा हम यह सब ठीक करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, परन्तु असफलता ही हाथ लग रही है।
शारिरीक, भौतिक तथा दैविक तीन प्रकार के कष्ट से संसार के जीव मात्र व्यथित हैं। शारीरिक कष्ट का निदान औषघि के द्वारा तथा भौतिक कष्ट का निदान परस्पर भाईचारा स्थापन से संभव हो सकता है। परन्तु अनियंत्रित प्रकृति द्वारा उत्पन्न दैवी आपत्तियों के निदान (जैसें - अकाल, अतिवृष्टि तथा चक्रवात आदि) परमात्मा प्रदत्त वैदिक मर्यादा के आधार पर यज्ञ कर्म के द्वारा ही संभव है। ऐसी स्थितियों में इन समस्याओं के समाधान के लिए तपोमूर्ति श्री प्रखर जी महाराज की सद्प्रेरणा तथा सानिध्य में विशाल स्तर का श्रीलक्षचण्डी महायज्ञ बीकानेर, राजस्थान में सम्पन्न हो रहा है। महाराज श्री के संरक्षण में विगत वर्षो में जो आयोजन हुए उनके परिणाम भी प्रभावी ढंग से सामने आये हैं तथा जिन संकल्पों को लेकर वे यज्ञ किये गये , वे भी यथा साध्य पूरे होते हुए दिखाई पडे है।

आतंकवाद का समूल विनाश, भारता को विश्वशक्ति रूप में प्रतिष्ठित करने, आर्थिक स्थिरता, स्वरोजगार स्वावलंबन की संरचना, सांप्रदायिकता सद्भावना की स्थापना, गौवंश संरक्षण एवं संवर्धन, प्राकृतिक आपदाओं से भारत सहित सम्पूर्ण विश्व की रक्षा, पर्यावरण की सुरक्षा आदि के हेतु श्री लक्षचण्डी महायज्ञ का दुर्लभ आयोजन सम्पन्न हा रहा है।

यह प्रदूषण विमुक्ति का सर्वोत्कृष्ट उपाय है जिस धरती पर यज्ञादि कर्मों का सम्पादन होता है, वहाँ ऋतुराज स्वयं उत्तम पर्यावरण की व्यवस्था करते है। घृत तिल और अनेकानेक मूल्यवान औषधियों से मंत्रित हवियों का धूम्र स्वयं देवदूत होता है, यज्ञ साक्षात् देव है, जो द्विजों के आहृान से प्रकट होते हैं इनका अर्चन पूजन और दर्शन सभी अलौकिक और विलक्षण है, तभी यज्ञदेव की भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होतें है। यज्ञ की भस्म सर्वकार्य सिद्धि का साधन है तथा असाध्य रोगादि दुर्घटनाओं से पीडतजनों को अकाल मृत्यु का भय नहीं होने देती।
 

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