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20 Feb to 12 March 2007 held at Dharanidhar Mahadev Temple Sports Ground, Bikaner
(Rajasthan)
Contact : 92144-48039, 94600-00188 E-mail: editor@khabarexpress.com
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लक्षचण्डी
महायज्ञ के उद्देश्य के संबंध में महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी
महाराज के विचार भारत को आर्थिक व आणविक महाशक्ति बनाने व अन्य
समस्याओं से मुक्ति दिलाने के पवित्र उद्देश्य को लेकर आगामी १० से १२
मार्च २००७ तक बीकानेर में लक्षचण्डी महायज्ञ का आयोजन धरणीधर मंदिर
के खेल मैदान में आयोजित होगा। इस प्रस्तावित महायज्ञ में डेढ हजार
ब्राह्मण सम्पूर्ण भारत के विभिन्न प्रान्तों से बीकानेर की पावन
मरूधरा पर आकर राष्ट्र के कल्याण व विकास की चेतना के लिए आध्यामिक
ऊर्जा को प्रज्वलित करने के लिए भाग लेंगे। राजस्थान में इस तरह का
यज्ञ ११४३ में प्रथम बार सम्पन्न हुआ था। इस लम्बे समय के उपरान्त
बीकानेर नगरी में इस तरह के यज्ञ का आयोजन हो रहा है। वर्तमान समय में
यह यज्ञ पहले २००० में कानपुर में व उसके बाद २००३ में दिल्ली में
सम्पन्न हुआ था। धार्मिक नगरी बीकानेर में होने वाले इस आयोजन के दौरान
कोलकात्ता के प्रसिद्ध भागवत कथा वाचक पंडित श्रीकान्त व्यास सात दिन
तक श्रीमद्भागवत कथा वाचन करेंगे। इसी दौरान श्री अतुल कृष्ण भारद्वाज
श्रीरामकथा का वाचन १ दिन तक करेंगे। २२ दिन तक चलने वाले इस धार्मिक
आयोजन में विभिन्न प्रदेश के लाखों भक्तजनों के आने की संभावना है।
राजस्थान में अकाल एक भयंकर प्राकृतिक आपदा है। इसके लिए आषाढ के प्रथम
पखवाडे में कारिरी यज्ञ का आयोजन भी करना प्रस्तावित है। इस यज्ञ के
आयोजन के बाद सात वर्ष तक इन्द्र देव राजस्थान पर प्रसन्न रहेंगे व
राजस्थान के किसान धन धान्य से परिपूर्ण रहेंगे। लक्षचण्डी महायज्ञ का
इतिहास भी आपने आप में अनूठा है। श्री करपात्रीजी महाराज ने द्वितिय
विश्व यु,
के दोरान चार लक्ष
चण्डी महायज्ञ सम्पन्न करवाए थे। यही कारण था कि भारत को द्वितिय विश्व
युद्ध की विभिषिका प्रभाव नगन्य रहा। लगभग ३६ वर्ष पहले कानपुर में
गंगामैया उन्नाव की तरफ बहने लगी थी। गंगा की धारा के घाटों को छोडकर
अलग बहाव हो जाने से वहा के पण्डों का रोजगार एक तरह से छिन गया। वहीं
कानपुर के धर्मपरायण जनता का गंगा स्नान भी दुर्लभ हो गया था। गंगामैया
को घाटों की ओर लाने के लिए सरकारी स्तर पर भी काफी प्रयास हुए लेकिन
सफलता नहीं मिली। इसके बाद स्वामी परमानन्द जी महाराज ने एक लाख कार
सेवकों को लेकर एक समातान्तर नहर की खुदाई करवाई। स्वामी जी का प्रयास
सराहनीय था लेकिन गंगामैया घाट पर नहीं आई। इस दौरान कानपुर के
बुद्धिजीवियों का एक शिष्ट मण्डल स्वामी श्री प्रखर जी महाराज से सम्फ
किया व उनसे गंगामैया के द्वारा ही पोषित है। आज गंगामैया के द्वारा ही
ऊर्जा का सबसे बडा स्त्रोत टिहरी बांध के द्वारा बिजली उत्पन्न की जा
रही है। जो एशिया महाद्विप का सबसे बडा बिजली उत्पादन केन्द्र है। गंगा
मे दैनिक जीवन को जिन्दा रखने की आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों ऊर्जा
विद्यमान है। एक वर्ष के चिंतनके बाद इस आदिशक्ति को नियंत्रित करने के
लिए एक यज्ञ के आयोजन का निर्णय लिया गया। श्री प्रखर जी महाराज ने
जनवरी १९९६ में पांच सौ ब्राह्मणों को लेकर गंगा की धारा को घाट पर
लाने के उद्देश्य से अयुतचण्डी यज्ञ का आयोजन किया । राष्ट्रीय मीडिया
मे श्री प्रखर जी के इस यज्ञ को लेकर कई सवाल उठाए गए लेकिन यज्ञ के
आयोजन के बाद जून में कानपुर में कानपुर पर इन्द्र प्रसन्न हुए व
मूसलाधार वर्षा होने से गंगा के पवित्र पानी का बहाव तीन किलामीटर धरती
को काटकर पुनश्रचः घाटों की ओर हो गया । इस यज्ञ से प्ररित होकर
कानपुरवासियों ने यह वयक्त किया कि कानाुर में एक बडे यज्ञ का आयोजन
होना चाहिए। एक तरफ कानपुरवासियों को सोचना था कि यज्ञ से गंगा के जल
की धारा को पुनश्रचः घाटों की ओर लाया जा सकता है तो वहीं दूसरी ओर इसी
समय प्रखर जी महाराज मंथन कर रहे थे कि यज्ञ के द्वारा उत्पन्न
आध्यामिक ऊर्जा को देश के आर्थिक विकास के लिए भी उपयोग किया जा सकता
है। इसके लिए लक्षचण्डी महायज्ञ का आयोजन करना चाहिए जिससे भारत आर्थिक
व आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप के रूप में विश्व परिदृश्य पर आये ।
आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाने के लिए १०२० तक चार लक्षचण्डी यज्ञ की
श्रंखला प्रारंभ करने का निर्णय लिया । इस क्रम में १६०० विद्वानों
द्वारा १७ जनवरी २००० से ४ फरवरी २००० तक कानपुर के सरसैया घाट में इस
कार्य को सम्पन्न किया गया । कानपुर के प्रथम लक्षचण्डी यज्ञ में भारत
आर्थिक एवं आणविक शक्ति के दृष्टिकोण से विश्व में सबसे शक्तिशाली
राष्ट्र बन जाए इसी संकल्प के साथ यज्ञ का आरंभ किया गया ओर प्रखर जी
महाराज ने यह उद्घोष कर भविष्यवाणी की कि २०१० के अन्दर अन्दर भारत
आर्थिक दुष्टिकोण से सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बन जाएगा। जिस समय महाराज
जी ने यह उद्घोष किया उस समय उत्तर प्रदेश सहित भारत की आर्थिक स्थिति
अत्यन्त दयनीय थी। उत्तर प्रदेश के वित्त कोष में केवल ३६० करोड रूपया
जमा पूंजी के रूप में था जहां उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों का
वेतन ही लगभग एक हजार करोड रूपया हुवा करता है। जहां वेतन देने के लिए
भी बजट नहीं है ऐसी स्थिति में अन्य विकास की बात तो सोचना भी असंभव
है। दूसरी ओर भारत के हर नागरिक के सिर पर लगभग ३०० करोड के विदेशी
कर्ज का बोझ था। भारत को विदेश की पत्र पत्रिकाओं कें कंगाल भिखारी की
तरह कार्टून बनाकर प्रदर्शित किया जाता रहा। भारत को किसी भी
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सम्मान के नजरिये से नहीं देखा जाता रहा।
ऐसे हालात में महाराज जी ने जब कानपुर यज्ञ के प्रारंभ में यज्ञ के
अन्दर यह यंकल्प करवाया तथा भविष्य वाणी किया तब कानपुर के पत्रकार
बंधुओं ने स्वामी जी के सामने यह सवाल उठाया कि भारत की आर्थिक दयनीयता
की स्थिति सामने है ऐसे हालात में आपने कैसे भविष्य वाणी कर दिया कि
२०१० तक भारत विश्व का सबसे सम्पन्न राष्ट्र हो जाएगा। स्वामी जी ने
पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा भारत को सदा से सोने की चिडया
कहा जाता रहा है,
जिसकी आर्थिक स्थिति को
देखते हुए विश्व के सभी लोग भारत की ओर आंख लगाऐ बैठे रहते थे । इतना
ही नही भारत की सम्पति को लूट खसोट कर विदेशियों ने अपने जिविका के
साधनों को बनाया । भारत पर १४०० सदी में प्रथम बार परतुगीज जल दश्युओं
के द्वारा गोवा में आक्रमण हुआ । परतुगीजों ने गोवा में जो संस्कृति
थी उसको नष्ट भ्रष्ट करने का प्रयास किया उसके बाद विदेशी मुगल शासकों
के बात तो किसी से छीपी नही है इसके बाद अंग्रेजों का २०० वर्षों का
शासन काल हमारे सामने ही है। इन लोगों के शासनकाल में हमारे सभ्यता
संस्कृति तथा स्वतंत्रता पर भंयकर कुठाराघात हुआ। धीरे धीरे भारतीयों
ने अपनी अस्मीता के भी खो दिया । फलस्वरूप हमारे सोचने विचारने का
सामर्थ्य भी कुंठित हो गया। ऐसी स्थिति में हमारे अन्दर में दुबारा यदि
सोई हुई चेतना शक्ति को जगा दिया जायेगा तो फिर हम चेतना जागृत होने के
फलस्वरूप सुझ बुझ प्राप्त कर ऐसी स्थिति में पंहुच जायेंगे जो हमारी
पहले की स्थिति थी । ऐसी ऊर्जा को जगाने का एकमात्र उपाय है कि भारतीय
यज्ञ प्रणाली के द्वारा शक्ति सर्जन करने के लिए दुर्गा जी का लक्ष
चण्डी यज्ञ जैसे आयोजन किया जाय। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कानपुर
मे ंराष्ट्र विकास की श्रंखला को प्रारंभ किया गया । दुर्गा सप्तशती
में मंत्र भी आया है भगवती दुर्गा सबके अन्दर में चेतना एवं बुद्धि रूप
में निवास कर रही है। यह बुद्धि ओर चेतना को जगाने की आवश्यकता है। जब
लक्षचण्डी महायज्ञ जैसे विशाल आध्यात्मिक यज्ञ को किया जायेगा इसके
फलस्वरूप भारत के हर नागरिकों में सुझ बूझ का विकास होगा और हम अपने
विकास के लिए रास्ता खोज लेगें । हर व्यक्ति स्वावलम्बी बन जायेगा तो
रोजगार स्वतः उत्पन्न हो जायेगा । उस समय के राष्ट्रीय स्तर के पत्र
पत्रिकाओं में विशेष रूप मे यह भविष्यवाणी प्रकाशित भी हुई थी । चार
लक्षचण्डी की श्रंखला में बुराडी चौक,
रिंग रोड,
राष्ट्रीय राजधानी,
दिल्ली में यह
महायज्ञ २१०० विद्वानों द्वारा ५ दिसम्बर से २२ दिसम्बर २००३ तक
सम्पन्न हुआ। यह अब तक हुए इस यज्ञ का ही परिणाम है कि जब २००४ में
तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने कार्यकाल पूर्ण किया उसी
समय भारत के वित्त कोष में ११० अरब डोलर से ज्यादा रूपया था। आज यह
आंकडा१७५ डॉलर भी पार कर गया । गत वर्ष अमरिका जैसे आर्थिक दृष्टि से
सम्पन्न राष्ट्र के अन्दर फ्लोरिडा,
टेक्सास में जब
साईक्लोन से तबाही हुई तब भारत ने ५०००० डॉलर का वित्तिय अनुदान - जिस
देश को दुनियां के सामने भिखारी की तरह प्रदर्शित किया जाता रहा उसी
भारत देश ने दिया । विगत सुनामी में भारत में जब तबाही मची तब अमेरिका
आदि राष्ट्र ने भारत को आर्थिक मदद की पेश कश की तब भारत के तत्कालीन
कांग्रेस सासन ने इस पेश-कश को ठुकरा दिया । यह हमारी आर्थिक सम्पन्नता
का ही परिणाम है। इतना ही नहीं हमारे युवा पीढयों में इस प्रकार की
चेतना भर गई २००० के बाद आज तक लाखों भारतीयों,
युवक - युवतियां
विदेश के राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियों को मुश्तैदी के साथ संभाल
रहे हैं तथा उनके माध्यम से अरबों की संख्या में विदेशी मुद्रा
प्रतिवर्ष देश में आ रही है। हमारे देश का सोना जो विदेश में बन्धक था
वह भी वापिस आ गया,
हमारे देश के नागरिकों पर जो विदेशी कर्जा था वह भी समाप्त हो गया। यह
सब प्रगति का मूल में आध्यात्मिक यज्ञादि कार्य ही है। इसको कोई नकार
नहीं सकता है। इसी श्रंखला में राजस्थान के बीकानेर में तीसरा
लक्षचण्डी यज्ञ का आयोजन २० फरवरी से १२ मार्च २००७ तक धरणीधर महादेव
मंदिर प्रांगण में सम्पन्न होने जा रहा हैं। इसके फलस्वरूप राजस्थान
सहित सम्पूर्ण भारत का विकास निश्चित रूप से होगा । श्रंखला के चतुर्थ
लक्षचण्डी यज्ञ का आयोजन देहरादून उत्तरांचल में २००८ में सम्पन्न
होगा। लक्षचण्डी महायज्ञ की श्रंखला पूर्ण होते ही हमारी खोई ऊर्जा
निश्चित रूप से जागृत होगी और इस ऊर्जा के प्रभाव से हमारी सुझ बुझ में
विकास होगा। हम स्वरोजगार स्वावालम्बन की दृष्टि से विश्व में
सर्वमान्य राष्ट्र में होंगें।इसमें कोई संदेह नहीं है। |
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