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यज्ञ का प्रभाव :
दैवाधीनं जगत् सर्व मंत्राधीनं च देवताः
सम्पूर्ण जीव जगत् देवताओं के अधीन है। देवता वह है
जो प्रकृति के विभिन्न अवयवों के रूप में जीव को जीवन का साधन प्रस्तुत
करें। वेदानुसार-वायु, जल, सूर्य, चन्द्र इत्यादि को देवता कहा गयां
है। इन देवताओं का सम्मिलित स्वरूप ही प्रकृति है। ब्रह्माण्ड की सभी
व्यवस्था के सुचारू सम्पादन हेतू प्रकृति को ३३ करोड विभाग में विभाजित
किया गया है। इन सभी विभागों के एक एक अधिष्ठाता है। जिन्हें हम देवता
कहते हैं अतः हमारे ३३ करोड देवता हैं। समस्त देवताओं की अधिष्ठात्री
देवी सत् रज तम् गुणात्मिका महामाया दुर्गा माँ है क्योंकि इन ३३ करोड
देवताओं की उत्पत्ति का मूल कारण भी माँ दुर्गा है। अतः माँ दुर्गा के
पूजन से समस्त देवगण प्रसन्न होते हैं। देवताओं की प्रसन्नता से संसार
रूपी प्रकृति की सम्पूर्ण व्यवस्था सुचारू रूप से सम्पन्न होती हैं।
कलौ चण्डी विनायकौ।।
कलियुग में चण्डी और गणेश का पूजन समस्त कष्टों केा
निवारण करता है। वर्तमान समय मे सभी प्रकार के भौतिक संसाधनों से
सम्पन्न होने के बाबजूद जब डाक्टर ओर वैद्य जवाब दे देते हैं तब
उच्चकोटि के विद्वानों की सलाह से महामृत्युंजय आदि अनुष्ठानों द्वारा
नवजीवन की प्राप्ति होती है। अज्ञानतावश पूजा पाठ, मंत्र, योग और धर्म
आराधनों का उपहास करना युक्ति संगत नहीं।
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्य
सुतान्वितः ।
मनुष्यो मत् प्रसादेन भविष्यति न संशय ।। दु. स. श.
यज्ञ वेदादि शास्त्रों द्वारा प्रदत्त एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिस
प्रक्रिया के द्वारा विश्व की सभी अव्यवस्थाओं को नियंत्रित किया जा
सकता है। जिसके अनेकानेक उदाहरण हैं।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा
पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्यमेष वोऽस्त्विष्ट कामधुक ।।
भगवान कृष्ण स्वयं गीता में कहते है कि यज्ञ के बिना
संसार संचालन के कोई भी कार्य संभव नहीं है, अतः मैंने यज्ञ के द्वारा
सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न किया है, उस सृष्टि में जड चेतन, मनुष्य तथा
देवताओं की उत्पत्ति हुई है। सभी परस्पर सहयोग के द्वारा ही सुखी रह
सकते हैं। वासुदेव ने इस प्रकार मनुष्यों को यज्ञ के द्वारा देवताओं को
प्रसन्न करने के आदेश भी दिया है तथा देवताओं को कहा आप मनुष्यों के
द्वारा सम्पादित यज्ञ से हवि प्राप्त कर शक्तिशाली बन के जड, चेतन व
मनुष्य के लिए जीवनोपयोगी साधनों को व्यवस्थित करें, जिससे यह यज्ञ सभी
के लिए कल्याणकारी बने।
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