Wednesday, 21 August 2019
khabarexpress:Local to Global NEWS

यहाँ पुरूष गाते हैं गणगौर के गीत


Shyam N Rangaगणगौर का त्यौंहार राजस्थान में बडे धूमधाम से मनाया जाता है। जयपुर, बीकानेर, चुरू, नागौर सहित राजस्थान के कई जिलों में गणगौर की सवारी शाही लवाजमें के साथ गाजे बाजे से निकाली जाती है। घर घर में लडकियाँ और नववधू महिलाऍं गणगौर की पूजा करती है और अपने सुहाग व परिवार की खुशहाली की कामना करती है। गणगौर का यह त्यौंहार राजस्थान की संस्कृति में रचा बसा है। शिव पार्वती के इस रूप की पूजा व अर्चना बीकानेर में महिलाओं के साथ पुरूषों के द्वारा भी भक्ति व श्रद्धा के साथ की जाती है।

होली के अगले दिन धुलण्डी के समाप्त होते ही रात को ही बारहगुंवाड चौक में जुगल किशोर ओझा ’पुजारी बाबा‘ के सानिध्य में फूंभडों के पाटे के पास चौक के पुरूष गणगौर के गीत गाते हैं। इसी तरह हर्षों के चौक में, मोहता चौक में, आचार्यों के चौक में, व्यासों के चौक में पाटों पर पुरूष शाम ढलते ही गणगौर के गीत गाना शुरू कर देते हैं और देर रात तक गणगौर  के गीत गाते हैं। सामान्यतः गणगौर का यह त्यहार महिलाओं द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है और यह माना जाता है कि यह त्यौंहार महिलाओं का ही है लेकिन इस त्यौंहार में पुरूषों का इस तरह से जुडाव इस बात का प्रतीक है कि पुरातन समाज में स्त्री के साथ पुरूष भी हर त्यौंहार में उसका भागीदार रहा है। गणगौर के इन गीतों में पुरूष जहाँ पार्वती स्वरूपा माँ गणगौर की पूजा अर्चना करता है वहीं गणगौर के श्रृंगार का भी वर्णन किया जाता है। इसमें यह बताया जाता है कि माँ गणगौर का रूप कितना सुंदर है और कितना मनमोहक है। हर्षों के चौक में पाटे पर गीत गाने वाले अबीरचन्द हर्ष उर्फ कैपली के अनुसार यह परम्परा बीकानेर में सैंकडों वर्ष पुरानी है और आज भी चौक के लोग इस परम्परा का पूरे मनोयोग से निर्वाह कर रहे हैं। इसी पाटे पर गीत गाने वाले बुजुर्ग पन्नालाल हर्ष बताते हैं कि इन गीत में गणगौर के सगुण स्वरूप व निर्गुण स्वरूप दोनों के गीतों को गाया जाता है। चूंकि गणगौर पार्वती का रूप है और शिव की पत्नी है और शिव सगुण रूप व निर्गुण रूप दोनों ही तरह से पूजा जाता है। अतः गणगौर की भी इन दोनों रूपों में ही पूजा होती है।

जब चौक के पाटों पर पुरूष यह गीत गाते हैं तो इन गीतों को सुनने के लिए आस पास से निकलने वालों के कदम बरबस ही ठहर जाते हैं। पुरूषों के मह से ठण्डी रातों में निकलने वाले ये गीत लोगों का ध्यान उनकी ओर खींचत है। यह माना जाता है गणगौर अपने पीहर आती है और फिर पीछे पीछे गणगौर का पति ईसर उसे वापस लेने आता है और आखिर मे चैत्र शुक्ल द्वितीया व तृतीया को गणगौर को अपने ससुराल वापस रवाना कर दिया जाता है और इन्हीं दिनों में जब गणगौर अपने पीहर होती है, गणगौर को खुश करने के लिए गणगौर के सामने गीत गाए जाते है और माता से कामना की जाती है वह देश, शहर, परिवार व कुल की समृद्धि करे उसकी रक्षा करे। पुरूषों द्वारा भी इन गीतों में माँ गवरजा से यही कामना की जाती ह। साथ ही साथ इन गीतों में वीर रस के गीत भी गाए जाते हैं और ईसर द्वारा यह दर्शाया जाता है कि वह गणगौर के लिए योग्य वर है और वह गणगौर को प्राप्त करने की कामना रखता है। इसी तरह गीतों में यह भी दर्शाया जाता है कि गणगौर ईसर को ताने मारती है और कहती है कि अगर तूने मेरी तरफ देखा तो तुझे मेरी बहन दातुन में, मेरा भाई खाने में जहर दे देंगे लेकिन ईसर नहीं मानते और आखिर वह अपनी गणगौर को अपने साथ लेकर ही जाते है। गणगौर की बहनों की तरफ से यह भी गीत गाया जाता है कि अब ईसर जी आप आ तो गए ही हो और गणगौर को लेकर ही जाआगे तो कुछ दिनों के लिए तो इसे छोड दो ताकि यह जब तक यहॉ है हमारे साथ रह सके। यह भक्ति, श्रृंगार व वीर रस के सारे गीत चौक में पाटों पर पुरूषों द्वारा गाए जाते है। आखिरी दिन पूरे चौक में गणगौर के प्रसाद स्वरूप दूध से बने राबडये का भोग लगाया जाता है और पूरे चौक में बाँटा जाता है और भक्ति भाव से गणगौर को विदाई दी जाती है।

परम्पराओं के शहर बीकानेर में सैकडों वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है और आज भी इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है। और सच भी है कि त्यौंहार वह चाहे पुरूषों का है या महिलाओं का इसे श्रद्धा, भक्ति के साथ मनाकर देश, समाज की खुशहाली की कामना करने से भाईचारा ही बढता है।


श्याम नारायण रंगा
पुष्करणा स्टेडियम के पास, बीकानेर