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8
Mar
वागड़ की रंगभीनी होली की बहुरंगी परंपराएं
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...जहां पत्थरों, कंडों और अंगारों से खेली जाती है होली
ऋतुराज बसंत जब मानव सहचरी प्रकृति को हरितिमा प्रदान कर श्रृंगारित करता है तब अहर्निश आजीविकार्जन की चिंता से दबे मानव मन को श्रृंगारित करने के लिए व्यंय-विनोद, हंसी-ठिठौली का एकमात्र मनमौजी त्यौहार होली ही तो आता है। सामाजिक सद्भाव के साथ मनाए जाने वाले लोकोसव होली को राजस्थान के दक्षिाांचल डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में जितना धूमधाम से मनाया जाता है उतना शायद ही किसी अन्य पर्व को , जिसका मुख्य कारण बड़ी तादाद में इस पर्व पर संपादित की जाने वाली अनोखी व रोचक परंपराएं ही हैं।
बसंत को चीरकर आते इस त्यौहार पर आयोजित होने वाली इन्हीं अनूठी व मनोरंजक परंपराओं के सौम्य व परिष्कृत  रूप का दिग्दर्शन इस  अंचल के गांवों में अधिक स्पष्ट रूप से किया जा सकता है।
वागड़ अंचल का डूंगरपुर जिला जहां भीलूड़ा गांव में धुलंडी अवसर पर पत्थरों से खेली जाने वाली राड़ के आयोेजन के लिए देशभर में प्रसिद्ध है वहीं बांसवाड़ा जिला यहां के सैकड़ों गांवों, पालों  के साथ ही बांसवाड़ा शहर में वृहद स्तर पर आयोजित होने वाले गैर नृय के लिए ख्यातनाम रहा है। वागड़ अंचल के इन दोनों आयोजनों के अलावा इस क्षेत्र में पारंपरिक अल्हड़ मस्ती के साथ आयोजित होने वाली कई अजब, अनूठी परंपराओं, खेल स्पर्धाओं के आयोजन ने वषार्ें से प्रदेशभर को तरंगित किया है और  आज भी इन परंपराओंं को उसी पारंपरिक स्वरूप में पूर्ण श्रद्धा के साथ ही आयोजित किया जाता रहा है।

वागड़ की होली अर्थात पत्थर, कण्डों तथा जलती लकड़ियों की राड़ः-
बरसाने की लट्ठमार होली की तर्ज पर इस अंचल के डूंगरपुर जिले के भीलूड़ा गांव में पत्थरमार होली खेली जाती है जिसे स्थानीय बोली में राड़ कहा जाता है। जिले के सागवाड़ा उपखंड क्षेत्र के भीलूड़ा गांव में धुलेंडी के दिन खेली जाने वाली इस पंरपरागत राड़  के आयोजन को देखने के लिए न सिर्फ वागड़ क्षेत्र के अपितु समीपस्थ गुजरात व मध्प्रदेश के सीमावर्ती गांवों से लोग आते है। इस रोचक आयोजन के लिए सायंकाल  गांव के रघुनाथजी मंदिर के समीप मैदान  पर  लोगों की टोलियां दो समूहों में आमने-सामने विभक्त होकर एक-दूसरे पर पत्थरों की बौछार करती है। हजारों दर्शकों की उपस्थिति में दोनों दलों के प्रतिभागी जब पूर्ण जोश व उत्साह के साथ रस्सी से बने गोफनों से लगभग दो घ्ांटों तक एक-दूसरे पर पत्थरों की वर्षा करते हैं तो स्थान रणक्षेत्र से कुछ कम नहीं लगता ।  इस दौरान दोनों दलों के प्रतिभागी परंपरागत ढालों से इस पत्थरवर्षा से बचने का यत्न भी करते है और लहुलूहान होते हुए भी इस परंपरागत आयोजन को पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाते हैं।
भीलूड़ा की पत्थरों की राड़ की तरह ही कण्डों की राड़ भी इस क्षेत्र का विशेष आयोजन है। धुलेंडी पश्चात चार दिनों तक लगातार डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा, गलियाकोट के आसपास के गांवों में तथा  होली के दिन बांसवाड़ा जिले के ख्रोडन के गणेश मंदिर परिसर में कण्डोें की राड़ का आयोजन होता है जिसमें लोग दो दलों में विभक्त हो एक दूसरे पर कण्डों की बौछार करते हैं। इस दौरान उस क्षेत्र में बजने वाले ढोल की अनुगूंज दोनों दलों के प्रतिभागियों का हौसलावर्धन करती रहती है। इस परंपरागत आयोजन में हजारों की तादाद में ग्रामीाजन सम्मिलित होते है व घायल होते हुए भी आनदानुभूति करते हैंँ।
दहकते अंगारों पर चहलकदमी करते है कोकापुरवासी
डूंगरपुर जिलान्तर्गत  कोकापुर गांव में होली के अवसर पर जलती होलिका पर चलने की परंपरा है जो अपने आप में क्षेत्र का अनोखा आयोजन है। परंपरानुसार सैकड़ों ग्रामीणजनों की मौजूदगी में होलिका दहन के दूसरे दिन अलसुबह  कई लोग होलिका दहन स्थल पहुचते हैं और जलती होली के दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलकर प्राचीन मान्यताओं और लोक परम्पराओं का निर्वहन कर उत्सवी श्रद्धा का ईजहार करते हैं। ढोल की थाप के साथ ढूंढ रस्म के आयोजन दौरान होली की प्रदक्षिणा करते हुए जब ग्रामीणजन जलते अंगारों पर चलने का  शौर्य - प्रदर्शन करते हैं तो उपस्थित सैकड़ों लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

संगठन बनाम शक्तिप्रदर्शन का खेल गढ़ भेदन
वागड़ अंचल के अधिकांश गांवों में संगठन बनाम शक्तिप्रदर्शन का एक रोचक खेल खेला जाता हैं जिसे स्थानीय बोली में गढ़-भांगना (गढ़ या किला तोड़ना) कहा जाता हैं। गढ़ राजपूतकालीन किलों को कहा जाता है परंतु यह गढ़ 100 से 200 व्यक्तियों के गोल घेरे में पास-पास खड़े होकर बनाया जाता है। इस मानवीय गढ़ को दो अथवा तीन व्यक्तियों के कुछ समूह शत्रु बनकर विभिन्न दिशाओं में अलग-अलग आक्रमण कर तोड़़ने की कोशिश करते हैं। इस दौरान घेरे के बाहरी भाग में कुछ व्यक्ति धोती को लपेट कर बनाए गए विशेष चाबुकनुमा गोटे के वार से विरोधियों के आक्रमण को निष्प्रभावी करते हैं व अपने गढ़ की रक्षा करते हैं। विरोधी पक्ष के समूह यदि घेरे को तोड़कर आरपार निकलने में समर्थ हो जाता है तो गढ़ को टूटा हुआ समझा जाता है परंतु ऎसा यदाकदा ही होता है। यदि गढ़ नहीं टूटता है तो एक निश्चित अवधि के पश्चात दोनों पक्षों के लोग डांडिये खेलते हुए गढ़ न टूटने की खुशी की सामूहिक अभिव्यक्ति करते हैं।
वागड़ अंचल के कई गावों में  इस गढ़ भेदन के खेल का आयोजन  पृथक-पृथक तिथियों को किया जाता हैं। कहीं होली के दिन, कहीं द्वितीया को तो कहीं रंगपंचमी  को आयोजित होने वाले इस आयोजन में वागड़वासी सोत्साह भाग लेते हैंं और फागुनी मस्ती का अहसास करते हैं। बांसवाड़ा जिले  के सुरवानिया गांव का रंगपंचमी का गढ़ क्षेत्र भर का अनोखा आयोजन है वहीं बड़ोदिया, सुवाला, चोखला  कई आदि गांवों के गढ़-भेदन आयोजन भी ख्यातनाम हैं।

ओबरी की फूंथरा पंरपरा
डूंगरपुर जिलातर्गत सागवाड़ा परिक्षेत्र के ओबरी गांव में रंगपंचमी के दिन आयोजित होने वाली फूंथरा उतारने की परंपरा क्षेत्र का अनोखा आयोजन हैं। इस पंरपरा में गांव के मुख्य चौराहे के निकट खेतों में खजूर के एक ऊंचे वृक्ष पर सफेद रंग का वस्त्र जिसे फूंथरा कहा जाता हैं, बांधा जाता है जिसे स्थानीय युवाओं द्वारा संघर्षपूर्ण तरीके से उतारा जाता है।

इस पारंपरिक आयोजन में युवा दो दलों में विभक्त हो जाते है पश्चात हजारों लोगों की मौजूदगी में युवाओं का एक दल इस खजूर पर चढ़कर फूंथरा उतारने का प्रयत्न करता है जबकि दूसरा दल प्रथम दल के सदस्यों को नीचे की ओर खींचते हुए उनके प्रयास को असफल बनाने की कोशिश करता है। करीब घंटे भर की जद्दोजहद के बाद कोई बिरला व साहसी व्यक्ति इस फूंथरे को उतारने में कामयाब होता है तो गांव के पंचों की उपस्थिति में उस साहसी व्यक्ति का अभिनंदन किया जाता है। फूंथरा पंचमी के इस आयोजन दौरान आसपास के बीसियों गांवों के हजारों लोग एकत्र होते है और इस आयेाजन का आनंद उठाते हैं।

निश्चय ही वागड़ की रंगभीनी होली की इन अनूठी और रोचक परंपराओं में कहीं सामाजिक सद्भाव व सामंजस्य का अनुठा संदेश छिपा हुआ है तो कहीं संगठन में शक्ति जैसे मंत्रों की अनुगूंज व फागुनी मस्ती का अहसास इन पंरपराओं को सैकड़ों वर्षोँ के बावजूद अपने मूल रूप में आयोजित करने को आमजनों को बाध्य करता रहा है।

 


 


कमलेश शर्मा




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