Thursday, 19 October 2017

बाजरे के उत्पादन के लिए कार्यशाला आयोजित

कृषि विभाग के अधिकारियों, बीज विक्रेताओं व कृषि वैज्ञानिकों ने लिया भाग

बीकानेर,  स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय व इक्र्रीसेट (अन्तर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान अर्द्ध शुष्क क्षेत्राीय संस्थान) हैदराबाद के संयुक्त तत्वाधान में पश्चिमी राजस्थान में  ‘‘बाजरा उत्पादन व इसे लाभकारी बनाने’’  विषयक एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुई।कुलपति प्रोफेसर ए. के. दहामा ने मानव संसाधन विकास निदेशालय के सभागार में कार्यशाला का शुभारम्भ करते हुए कहा कि बाजरा उत्पादन के लिए प्रोसेसिंग इकाई को बढावा देना होगा। बाजरे का 50 प्रतिशत क्षेत्रा राजस्थान में ही है। उन्होंने कहा कि बाजरे से बनने वाले विभिन्न व्यजनों की आपूर्ति फूड सिक्योरिटी मिशन में की जानी चाहिए, ताकि बच्चो में कुपोषण को रोका जा सके। उन्होंने काश्तकारों को शंकर किश्म का बीज समय पर उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता जतायी।
अनुसंधान निदेशक डॉ. गोविन्द सिह ने कहा कि तेज तापमान व समय समय पर पडनें वाले अकाल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त फसल बाजरे कि है। उन्होंने बाजरा उत्पादन बढाने के लिए अनुसंधान की आवश्यकता जताई।
डॉ. एन. नागराज ( इक्र्रीसेट ) ने कहा कि बाजरा बीज उत्पादन के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को बढावा दिया जाए। उन्होंने खेती उपकरणों को सहकारिता आधार पर उपयोग में लिये जाने की सलाह दी। डॉ. हरिनारायण ( इक्र्रीसेट ) ने बाजरे के लिये सूखारोधी व जल्दी पकने वाली किश्मों की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. एस. के. गुप्ता ( इक्र्रीसेट ) ने कहा कि बाजरा उत्पादन के लिए एच. एच. बी. 67 व आर. एच. बी. 177 किश्में इस क्षेत्रा के हिसाब से ज्यादा उपयोगी है। उन्होंने कहा कि जिंक सल्फेड बीस किलो प्रति हैक्टयर क्षेत्रा में देने से उपज में अच्छी बढोतरी हो सकती है। प्रोफेसर प्रकाश सिह शेखावत ने इस मौके पर बताया कि कार्यशाला में प्रगतिशील किसानों , कृषि विभाग के अधिकारियों, बीज विक्रेताओं व कृषि वैज्ञानिकों ने भाग लिया। अर्थशास्त्राी डॉ. आई. पी. सिह ने भी विचार व्यक्त किए।
कार्यशाला में विभिन्न विभागों के डीन-डायरेक्टर माजूद थे।