Sunday, 25 June 2017

ऐसे मनाता रहा है राज परिवार बीकाणा का स्थापना दिवस

रियासतकाल में आखातीज पर धान, घी, गुड़, आमली व पताशा देने की परम्परा

ऐसे मनाता रहा है राज परिवार बीकाणा का स्थापना दिवस

बीकानेर,  पूरे देश भर मे आखाती को विशेष शुभ माना जाता है और ढेर सारी खरीददारियों, नये शुभारम्भ के साथ इस दिन को विवाह के लिये अबुज सावे के रूप में तथा किसान लोग अपने खेतों में हल चलाकर खेती का शुभारम्भ करते है।
आखातीज का यह त्यौहार बीकानेर में स्थापना दिवस के रूप में भी प्रतिष्ठित है। इस त्यौंहार को शहरवासीयों द्वारा पंतग उड़ाकर तथा खिचड़ा व आमली पीकर इस दिन को त्यौहार के रूप में मनाते है। 
रियासतकाल से आखाबीज व आखातीज दो दिन का अवकाश होता था और जिला कलेक्टर द्वारा आज भी आखाबीज को स्थापना दिवस के रूप में तथा आखातीज को पंतग उड़ाने के लिये अवकाश रखा जाता  है।  बीकाणा स्थापना  दिवस पर राज परिवार की और से विशेष चांदा उड़ा जाता है तथा मंदिरों, देवालयों, बीकाजी की टेकरी की छतरियों, कल्याण सागर तालाब की छतरियों के लिये धान, घी, गुड़, आमली व पताशा भेजने की परम्परा थी।

राज्य अभिलेखागार के निदेशक डाॅ महेन्द्र सिंह खड़गावत ने इस पर अधिक जानकारी देते हुए बताया कि अभिलेखागार में बीकानेर राज्य की आखातीज से सम्बन्धित रियासतकालीन बहियों में महाराजा रतनसिंह जी के समय आखातीज के शुभ अवसर पर सन् 1901 ई. में दरबार की ओर श्री लक्ष्मीनारायण जी मंदिर को 1.25 मन धान, 1.25 सेर घी,   1.25 सेर गुड़, 1.25 सेर आमली, 2 सेर आटा तथा 1 सेर पताशा व श्री मुरली मनोहर मंदिर को 5 मन धान, 1.25 सेर घी, 1.25 सेर गुड, 1.5 सेर आमली, 1.5 सेर आटा व 1 सेर पताशा दिया जाता था। इस प्रकार के सैकड़ो उदाहरण बहियों में दर्ज है।
    उक्त सामग्री बीकानेर के सभी देवालयों में भी भेजी जाती थी। जैसे नागनेची जी माताजी, ठाकुर जी श्री हरमन्दिर जी व समस्त देवालयों में। राजा-महाराजाओं की छतरियों जैसे राव बीकाजी की छतरी, राव लूणनकरण जी की छतरी राव जैतसिंह जी राजा रायसिंह की छतरी इत्यादि पर उक्त सामग्री दस्तूर के रूप में भेजी जाती थी। राज्य की ओर से स्थापित भोजनशाला में गरीब लोगों को खीचड़ा तथा विभिन्न जातियों के लोगों, साधू- सन्तों व राजकर्मचारियों को भी धान, घी, गुड़ पताशा व आमली इत्यादि सामग्री वितरित की जाती थी। बही आखातीज में इस अवसर पर 600 ब्राह्मणों को भोजन सामग्री वितरित करने का भी उल्लेख मिलता है। राज्य परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम से भी आखातीज के अवसर पर खाद्य सामग्री वितरित की जाती थी।
    उक्त परम्परा में खर्च हुई राशि का पूर्ण ब्यौरा दस्तावेजों में दर्ज है। जैसे देव स्थानों के लिये 39/- रू., 700 ब्राह्मणों के भोजन पर 154/- रू., साधू, सन्यासी व बैरागी इत्यादि पर 24/- रू., ब्राह्मण व गुसाई परिवार पर 138/- रू., धायमां व धाय भाईयों पर 24/- रू., कामदारांें पर 434/- रू., राज परिवार से सम्बन्धित सदस्यों व खालसा के व्यक्तियों पर 747/- रू. की राशि खर्च हुई थी। इस ब्यौरे से यह स्पष्ट है कि आखाबीज व आखातीज बहुत ही भव्य तरीके से राजदरबार व जनता दोनों मिलकर इस त्यौहार को मनाते थे।