Tuesday, 24 October 2017

भारत बनता जा रहा एंटीबायोटिक प्रतिरोधक - डा.पाठक

कहां से लाएंगे जीवन रक्षक के दूसरे विकल्प

बीकानेर, एंटीबायोटिक एटीवार्डशिप नेटवर्क इन इंडिया के प्रमुख अन्वेशक डा.आशीष पाठक ने कहा है कि एंटीबायोटिक की खोज 20वीं शताब्दी की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में से एक है, जिसने कि बेक्टीरिया के प्रभाव से होने वाली मौतों में कमी लाते हुए दुनिया भर में जीवन प्रत्याशा में वृद्धि की है। राज्य को एंटीबायेाटिक बनाने के लिए चीयर सोसायटी के साथ मिलकर अभियान का आगाज किया गया है।जिसके तहत मरीजों व चिकित्सकेां के साथ साथ आमजन को भी एंटीबायोटिक के प्रति जागरुक किया जायेगा।
डा.पाठक ने बताया कि बीकानेर संभाग के श्रीगंगानगर,हनुमानगढ़,चुरु व बीकानेर इत्यादि जिलो में बिना चिकित्सक की सलाह के भी आमजन मेडिकल स्टोर से दवांए आमतौर पर सीधे ही ले रहे है।लेकिन विभिन्न अध्ययनों व शोध में सामने आया है कि 80 प्रतिशत भारतीय चिकित्सक द्वारा दी गई दवाअेां का कोर्स भी पूरा नही लेते है,जिसके कारण उनका शरीर अपने आप एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बन जाता है।आने वाले समय में यही दवाएं शरीर पर बेअसर हो जाती है।इसलिए एंटरबायोटिक के गैर वाजिब उपयोग से बचना चाहिए।
उन्होने बताया कि एंटीबायोटिक एक दवा का प्रकार है जो बेक्टीरियाओं की वृद्धि को नष्ट कर देता है या कम कर देता है। हालांकि कुछ बेक्टीरिया अपने जेनेटिक सुधार करते हुए अपने आपको बचा लेते हैं और दवा प्रतिरोधक के रुप में खुद को तब्दील कर लेते हैं। कई बार ये बेक्टीरिया एक बार में कई प्रकार की एंटिबायोटिक्स के प्रतिरोधक बन कर एक प्रकार के सुपरबग बन जाते हैं। पिछले कुछ सालों में भारत में सुपरबग्स के प्रसार में एक नाटकीय वृद्धि हुई है, साथ ही बाजार में उपलब्ध एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री में भी समान रुप से वृद्धि हुई है।
उन्होने बताया कि आंकडों के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं की खुदरा बिक्री में वर्ष 2005 से 2010 के बीच प्रतिवर्ष 6-7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जिसमें  कुछ एंटीबायोटिक दवाओं  ( ब्मचींसवेचवतपद ) की बिक्री में गत 5 सालों में 60 प्रतिशत की वृद्धी हुई है जो कि बेहद चौंकाने वाला तथ्य है। जुकाम व दस्त जैसे मामलों से ग्रसित 45 से 80 प्रतिशत मरीजों को एंटीबायोटिक दिये जाते हैं,जबकि  ऐसे मामलों में एंटिबायोटिक अप्रभावशाली होते है यदि ये वायरल ग्रसित मामले हों तो।
 डा.पाठक ने बताया कि हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आंकडे के अनुसार भारत का चिकित्सा समुदाय दर्शाता है कि 70 प्रतिशत भारतीय एक से अधिक प्रकार की एंटिबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधक(Resistant to multiple, cutting-edge antibiotics) बन चुके हैं। देश में यह अनुमान है कि आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों में से 30 प्रतिशत की मृत्यु इसलिये हुई कि वे एंटिबायोटिक प्रतिरोधक बन चुके थे जिससे संक्रमण बढता गया। एंटीबायोटिक का गलत एवं अवांछित उपयोग इसकी प्रतिरोधकता का सबसे बडा कारण है।
एंटीबायोटिक्स इस समय सर्वाधिक उपयोग में ली जा रही हैं, साथ ही चिकित्सकों द्वारा भी नुस्खे में लिखी जा रही हैं। एंटिबायोटिक दवाओं का बेमतलब एवं गलत इस्तेमाल पूरी दुनिया में चिंता का विषय है। खासकर हमारे देश में आम सर्दी एवं दस्त की स्थितियों में भी इन एंटीबायोटिक्स का उपयोग हो रहा है, गौरतलब है कि इन वायरस जन्य बीमारियों में एंटिबायोटिक बेअसर रहती हैं। भारत में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के मामलों की वृद्धि के लिये विभिन्न अन्य संभावित कारण हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में रिसर्च करने वाले विक्रमसिंह राघव बतातें है कि भारत में संक्रामक रोगों की अधिकता, देश में माईक्रोबायोटिक जांच सुविधाओं की कमी एवं रोगियों में जांच प्रक्रिया से गुजरने की अनिच्छा। भारत में 53 प्रतिशत मरीज बिना किसी डाक्टरी सलाह के दवा लेते हैं जिसमें से 25 प्रतिशत मरीज अपनी निर्धारित दवाएं भी पूरी नही लेते।एंटिबायोटिक दवाओं के वितरण व बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में 50 प्रतिशत दवा की दुकानों बिना किसी पर्चे के एंटीबायोटिक दवाएं बेच रही हैं।
राघव ने बताया कि डाक्टरों द्वारा दवा पर्ची पर दवाई का ब्राण्ड लिखा जा रहा है जिससे इन नए एंटीबायोटिक्स की श्रंखला इन्हीं के हाथों में रहती है। देश की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करती है जो अनौपचारिक एवं गैर पंजीकृत ग्रामीण सेवा प्रदाताओं से इलाज करा रही है। अध्ययनों से पता चलता है कि ये लोग डायरिया एंव फलू की स्थिति में बिना जांचे परखे एंटिबायोटिक दे डालते हैं।देश में कम साक्षरता के परिणामस्वरुप ज्ञान एवं जागरुकता का अभाव है जिससे स्वतरू एंटीबायोटिक के गलत उपयोग में वृद्धि होती है।संपूर्ण स्वच्छता एवं संक्रमण नियन्त्रण की अपर्याप्त पालना।विशिष्ट जीव और विशिष्ट एंटीबायोटिक के उपयोग के प्रसार पर वास्तविक सूचना की कमी होना।
उन्होने बताया कि भारत में एंटीबायोटिक्स पर नई खोंजे व अध्ययन लगभग नही ंके बराबर है। खासकर तब जब कि देश में अंधाधुंध दुरुपयोग जारी है। गत दशको में एंटीबायोटिक के मात्र दो वर्गों की पहचान की गई है , जबकि आने वाले दशक में कोई नई खोज दिखाई नहीं देती हेै।हमें वर्तमान उपलब्ध एंटीबायोटिक्स को सुरक्षित रखना है।
देश में एंटीबायोटिक प्रतिरोधकता का मुददा बडे तौर पर अनजाना था क्योंकि देश में इस विषय पर बहुत ही कम अध्ययन एवं अनुसंधान हुए है। न्यू देहली मेटालो (एनडीएम-1) ने सबसे पहले इस पर रिपोर्ट दी जो कि प्रसिद्ध जनस्वास्थ्य अध्ययन संग्रह लांसेट में प्रकाशित हुई। इसे साल 2010 में देश की प्रमुख समचार पत्रों ने पहले पन्ने पर छापा। इन प्रकाशनों के बाद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार की नई राष्ट्रीय एंटी-माईक्रोबाइल नीती की घोषणा की जिसे श्श् नेशनल पोलिसी फोर कोन्टेनमेंट आफ एंटीबायोटिक  रेसिस्टेन्स- इण्डिया नाम दिया। इसमें एंटीबायोटिक के जानवरो पर उपयोग पर रोक विशेषकर जो मानव उपयोग से संबधित हैं, संक्रमण मुक्त इलाज , अस्पताल, दवाओं का वांछित उपयोग, निगरानी , अध्ययन आदि विषयों को शामिल किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एंटीबायोटिक को जीवन रक्षक बनाए रखने के लिये प्रमुख रुप से 3 क्षैत्रों पर कार्य करना जरुरी है। एंटिबायोटिक का तर्कसंगत उपयोग, स पूर्ण स्वच्छता के बेहतर उपायों एवं व्यवस्थाओं के माध्यम से संक्रमण में नियन्त्रण एवं एंटिबायोटिक अवशेषों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को भी रोकना।
इन्ही विषयों पर आरडी गार्गी मेडिकल कालेज, उज्जैन एवं कारोलिंस्का इन्स्टीटूट स्वीडन के संयुक्त तत्वाधान में सीडा के सहयोग से देश भर में एंटीबायोटिक स्टीवार्डशिप नेटवर्क इन इण्डिया अभियान चलाया जा रहा है। राजस्थान में जनस्वास्थ्य एवं विकास के मुददों पर कार्य कर रही संस्था चीयर सोसायटी (सेन्टर फार हैल्थ एज्यूकेशन एण्ड इन्टरप्रिन्योरशिप रिफोर्म) द्वारा इस मुहिम को आगे बढ़ाया जा रहा है।
चीयर के द्वारा 33 जिलों में चिकित्सकों व शिक्षण संस्थाओं के संपर्क कर जागरुकता के लिए अभियान चलाया जायेगा।जिसमें चिकित्सकेंा से एंटीबायोटिक न प्रयेाग करने के संकल्प पत्र भरवाए जा रहे है।

Dr Ashish Pathak   Antiboiotic Medicine   Cheer Sociaty   New Delhi Metalo