Monday, 08 March 2021

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मन-मोहन हुआ!

सो लाजिमी बात है कि इस तरह की घटना से उन्हें दुख पहुंचेगा ही पहुंचेगा, लेकिन क्या ये बात सच है कि वामदलों के मुंह पर पहली बार छाई चुप्पी से उन्हें वाकई राहत महसूस हो रही है?

हमारे विश्वस्त सूत्र ने हमें बताया (धीमी आवाज में) - हर बार, हर मामले में अपनी बोलने वाले वामदलों की नंदीग्राम प्रकरण से बोलती बंद होने से मन-मोहन है। हालांकि सूत्र ने यह भी कहा कि नंदीग्राम जैसी घटना के घटित होने से वह काफी आहत हैं। इस घटना के शिकार हुए लोगों के साथ उनकी पूरी हमदर्दी है।
हमने कहा कि वह देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं, सो लाजिमी बात है कि इस तरह की घटना से उन्हें दुख पहुंचेगा ही पहुंचेगा, लेकिन क्या ये बात सच है कि वामदलों के मुंह पर पहली बार छाई चुप्पी से उन्हें वाकई राहत महसूस हो रही है?
सूत्र ने हां में सिर हिलाया।
मन-मोहन के लिए यह वाकई राहत की बात है। बेचारे किसी मामले में कदम आगे बढ़ाने की सोचते नहीं थे कि तभी उन्हें डर सताने लगता था कि वामदल उनके पैर पीछे खींचने की कोशिश करने लगेंगे। बाद में होता भी यही था। बिना पूछे कहां आगे बढ़ रहे थे, अरे बाबा पूछना चाहिए था आगे बढ़ू कि नाही, अब चलो पीछे आने का, कि तर्ज पर वामदल उनके पैर पीछे खींच रहे होते थे। तब उनके पास अपने सिर पर हाथ रखने के सिवाए कोई चारा न होता था। तभी तो इंटरनेट पर उनकी सामान्य की तुलना में सिर पकड़े तस्वीरें बहुत ज्यादा हैं। यकीन न हो, तो नेट पर जाकर देख लो। पहले पहल हमें भी यकीन नहीं हुआ था!
इस मामले में सूत्र ने खुलासा करते हुए बताया कि उन्हें वामफोबिया हो गया था। हमने कहा होना ही था। वह बेचारे कुछ कहते थे, उससे पहले ही वामदल अपने होठों पर उंगुली रख उन्हें चुप होने का आदेश-सा दे देते, उसके बाद वह कुछ न बोलते। ऐसे में वामफोबिया ही होना था। उनका वामफोबिया तो आपने भी महसूस किया होगा। किया कि नहीं!  कई बार उन्हें सार्वजनिक वामफोबिया जो हुआ था।
खैर, सूत्र ने बताया कि वामफोबिया के वह इस कदर शिकार थे कि कई मर्तबा, जब वह अपने निजी मामलों के फैसले ले रहे होते थे, तब भी उनके मुंह से बरबस ही निकल पड़ता था- इस मामले में वामदलों का क्या रुख होगा... ? फिर उन्हें बताया जाता था कि यह आपका निजी मामला है, आपके सिवाए किसी का इसमें हस्तक्षेप नहीं है।
हमने चुटकी लेते हुए कहा- अब तो उन पर से वामफोबिया की जकड़न ढ़ीली हो गई है!   
वह बोले- आप खुद ही देख लीजिए कि वह आजकल किस तरह फर्राटे से बोल रहे हैं। हर मामले में बोल रहे हैं और वह भी खुलकर।
खैर, यह तो हुई मन-मोहन की बात, लेकिन दिमाग में इस वक्त एक नया द्वंद्व फड़फड़ा रहा था, वह यही कि नंदीग्राम प्रकरण से काटों तो खून नहीं वाली स्थिति में पहुंचे वामदल इस वक्त क्या कर रहे हैं।
दिमाग में यही द्वंद्व चल रहा कि हमारे कदम अनायास ही वाम नुक्कड़ की ओर बढ़ गए। पहले पहल हमने खिड़की से झांक कर अंदर के माहौल को समझना ही बेहतर समझा। क्या पता वह गुस्से से अपने पारंपरिक रंग की तरह लाल न हो रहे हो और हमें भी उसी रंग से सराबोर न कर दें। अंदर झांकने पर देखा कि वहां कई-कई वामनेता बैठे हैं, लेकिन इसके बावजूद चारों ओर पसरी खामोशी ने हमें आश्चर्यचकित किया। ऐसा लग रहा था कि मानो सभी के होठ सिलें हों।
अबकी बार हमने अपनी आंखें मलते हुए ध्यान से देखा, तो हमें वामनेता आपस में बातें करते नजर आए। अरे नहीं बाबा!  जबान से नहीं, नजरों से।
एक की नजरें दूसरे की नजरों से बात कर रही थी, तो दूसरे की तीसरे से,  इसी तरह चौथे की नजरें पांचवां की नजरें पढ़ रही थीं, तो छठे की नजरें सातवें की। नजर-नजर से पूछ रही थी कि अब क्या होगा? लेकिन जबाव कोई नजर नहीं दे पा रही थी।
खैर,  कभी सड़कों पर उतर कर हंगामा करने वालों को इस तरह चुप्पी की चादर ओढ़े देख हमारा भी मन-मोहन हुआ।

ललित पांडे


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