Friday, 20 October 2017

संविधान के प्रति चेतना एवं प्रतिबद्धता विकसित हो: हर्ष

संविधान में चेतना एवं प्रतिबद्धता विषयक गोष्ठी का आयोजन

संविधान के प्रति चेतना एवं प्रतिबद्धता विकसित हो: हर्ष

बीकानेर, अजित फाउण्डेशन सभागार में भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्धता एवं चेतना विकास विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय प्रर्वतन करते हुए एडवोकेट एस. एल. हर्ष ने संविधान की प्रस्तावना में मूलभूत रूप से न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व विकास की व्याख्या करते हुए भारत की एकता और अखण्डता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए नागरिकों में संविधान के प्रति चेतना एवं प्रतिबद्धता विकसित करने पर बल दिया। 

इस विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में विचार व्यक्त करते हुए एडवोकेट विपिन गोयल ने संविधानिक जागरूकता से पूर्व मानविय संबंधों एवं मानव और प्रकृति के संबंधों को समझकर न्याय और समानता की व्याख्या पर बल दिया एवं उन्होंने संविधान निर्माण से पूर्व की सदियों पुरानी शासन व्यवस्था में मानवीय संबंधों एवं मनुष्य का प्रकृति से सामंजस्य होने और न होने की स्थिति में निकलने वाले परिणामों को रेखांकित किया। गोयल ने संविधान की प्रतिबद्धता और चेतना के विकास के लिए जन-जन में जाने और विद्यालयों तक जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया। 

डाॅ. अजय जोशी ने संवैधानिक शिक्षा को प्राथमिक कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता बताई। डाॅ. अशोक आचार्य ने संविधान में वर्णित मूल अधिकारों और दायित्वों का विस्तार से वर्णन किया और लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती हेतु कानून का राज होने को अनिवार्यता बताया। कानून के राज के लिए संवैधानिक शिक्षा को महत्वपूर्ण बताया। 

शिवनारायण नागल ने संविधान को समझने से पूर्व हमारी प्राथमिकताओं में राष्ट्रवाद है अथवा नहीं इसका स्वयं को उत्तर देना होगा। मुकुन्द नारायण हर्ष ने संविधान पर चर्चा करते हुए सभी भागिदारों से आग्रह किया कि हम सरकार को पत्र लिखें की संविधान शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा में भी महत्व दिया जाता है। राजस्थान के प्रथम कम्पनी सचिव लक्ष्मी नारायण पुरोहित संविधान की शिक्षा के लिए संविधान में श्रृद्धा पैदा करना आवश्यक है। संवैधानिक शिक्षा अपने परिवार से शुरू करे तो धीरे-धीरे सारे समाज में संविधान के प्रति चेतना होगी। सुरेन्द्र हर्ष ने इस अवसर पर बताया कि संविधान की शिक्षा केवल पाठ्यक्रम में शामिल करने और पढ़ने मात्र से चेतना विकसित नहीं होगी बल्कि उसको व्यवहार में प्रयोग में लाने की आदत विकसित करनी होगी। कार्यक्रम के अंत में संजय श्रीमाली ने सभी आगुन्तुकों का आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया।