Thursday, 23 November 2017
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शुरू हुआ मलयालम कहानियों का राजस्थानी में अनुवाद

त्रिवेंद्रम में अनुवाद कार्यशाला शुरू, छह दिन चलेगी

त्रिवेन्द्रम,  मलयालम कथा-साहित्य का राजस्थानी में अनुवाद करने के लिए छह राजस्थानी कथाकारों की कार्यशाला शुक्रवार से त्रिवेंद्रम में शुरू हुई। साहित्य अकादेमी, नईदिल्ली की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में डॉ.अर्जुनदेव चारण, मालचंद तिवाड़ी, मीठेश निर्मोही, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य 'आशावादीÓ और दुलाराम सहारण शामिल हुए। राजस्थानी-लेखकों का यह दल छह दिन की इस कार्यशाला में मलयालम की प्रसिद्ध लेखकों की कहानियों का राजस्थानी में अनुवाद करेगा। 
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.अर्जुनदेव चारण ने कहा कि भारतीय भाषाओं में मलयालम कथाओं का खास स्थान है। इसलिए इन कहानियों का राजस्थानी भाषा में आना एक बड़ा कार्य होगा। डॉ.चारण ने कहा कि मलयालय से राजस्थानी में अनुदित इन कहानियों का प्रकाशन भी साहित्य अकादमी कराएगी जिससे राजस्थानी के पाठकों को मलयालम कहानी के संबंध में जानकारी मिलेगी। यह अपनी तरह का अनूठा और पहला प्रयास है   
अनुवाद कार्यशाला में मलयालम-हिन्दी लेखिका डॉ. एस.तकमणि अम्मा संदर्भ व्यक्ति के रूप में शामिल हुईं। उन्होंने कहा कि ने यह मलयालम कहानी का सम्मान है। यहां की कहानियों का अंग्रेजी और हिन्दी भाषा में तो अनुवाद हुआ है पर राजस्थानी में नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि राजस्थानी लेखक केरल आकर यहां की संस्कृति और लोक-व्यवहार को को सीख समझकर अनुवाद कर रहे हैं, ऐसा पहली बार बड़े स्तर पर प्रयास हो रहा है। 
इस मौके पर मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि किसी भी भाषा से दूसरी भाषा में जब साहित्य का अनुवाद होता है तो वस्तुत: यह सास्कृतिक आदान-प्रदान होता है। मीठेश निर्मोही ने मलयालम कथा-साहित्य से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यहां का साहित्य यहां के जनजीवन का दस्तावेज है। बुलाकी शर्मा ने मलयालम भाषा में रचे साहित्य को दूसरी भारतीय भाषाओं में आने के इस प्रयास को एक बहुप्रतीक्षित उद्यम बताया। मधु आचार्य 'आशावादीÓ ने कहा कि बहुत सारी सतही विभिन्नताओं के बावजूद मलयालम साहित्यकारों का कथ्य और शिल्प दूसरी भारतीय भाषाओं से भिन्न नहीं है बल्कि संवेदना के स्तर पर कई बार बहुत आगे निकल जाता है। दुलाराम सहारण ने यहां के साहित्यकारों के मातृभाषा के प्रति अनुराग को वरेण्य बताते हुए कहा कि महात्मा गांधी को भी अपनी मातृभाषा से लगाव था। 

हरीश भादाणी को याद किया
त्रिवेंद्रम। 
त्रिवेंद्रम में चल रही साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की अनुवाद कार्यशाला के बाद राजस्थानी साहित्यकारों ने जनकवि हरीश भादाणी को श्रद्धांजलि अर्पित की। भादाणी की पुण्य तिथि उन्हें याद करते हुए अकादेमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक और एनएसडी के उपाध्यक्ष डॉ.अर्जुनदेव चारण ने कहा हरीशजी हिंदी के अच्छे कवि थे जो जन-जन तक पहुंचे। एक नाटककार के रूप में उनके नाटक 'तीडोरावÓ और 'घर बीती रामायणÓ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनका रंगमंच से भी गहरा जुड़ाव था। इस मौके पर मालचंद तिवाड़ी और मधु आचार्य 'आशावादीÓ ने उनकी कविताएं सुनाईं। दुलाराम सहारण ने एक जनकवि के रूप में उनकी रचना-प्रक्रिया पर बात की। मीठेश निर्मोही और बुलाकी शर्मा ने उनके नवगीतकार का स्वरूप रेखांकित किया।   

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