Monday, 23 October 2017

हरे चारे के संरक्षण में वेटरनरी विश्वविद्यालय की नई पहल

साइलोपिट के स्थान पर किया साइलो बैग का प्रयोग

बीकानेर। वेटरनरी विश्वविद्यालय के पशु चारा संसाधन प्रबन्धन एवं तकनीकी केन्द्र द्वारा  बीछवाल ग्राम में प्रगतिशील पशुपालक नरेन्द्र सिंह के फार्म पर हरे चारे के संरक्षण के लिए साइलेज तकनीक प्रदर्शन शिविर का आयोजन किया गया। वेटरनरी विश्वविद्यालय में नवस्थापित इस केन्द्र द्वारा हरे चारे के संरक्षण के लिए साइलोपिट के स्थान पर साइलो बैग का उपयोग किया गया। इस अवसर पर  वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए.के. गहलोत ने कहा कि वर्तमान में पश्ुाओं के लिए चारे एवं खाद्य की कमी सबसे ज्वलंत समस्या है। यह स्थिति देश के शुष्क एवं अद्र्वशुष्क क्षेत्रों में क्षेत्रीय असंतुलन एवं कृषि जलवायु परिवर्तन के कारण और भी जटिल हो रही है। कुलपति प्रो. गहलोत ने बताया कि इस साल वर्षा अच्छी होने के कारण पशुओं के लिए हरे चारे व घास की भरपूरता है। इस उपलब्धता को भविष्य के लिए साइलेज बनाकर सुरक्षित व संरक्षित करने की आवश्यकता है।  कुलपति प्रो. गहलोत ने बताया कि साइलो बैग में साइलेज बनाने की पारम्परिक साइलो पिट या टावर पद्वति के मुकाबले कई फायदे है। इस विधि में साइलेज बनाने के लिए भूमि में गढढे खोदकर साइलो बनाने की आवश्यकता नही होती है एवं इससे भूमि का बचाव होता है तथा साइलो के लिए पक्के निर्माण की आवश्यकता नहीं होती। कम लागत में तैयार साइलों बैग को एक से पांच क्विंटल तक भरा जा सकता है तथा भरे हुए साइलो बैग को परिवहन करने में भी आसानी होती है। प्रो. राजेश कुमार धूडिय़ा, प्रमुख अन्वेषक ने बताया कि प्रदेश में वर्षा ऋतु में ज्वार, बाजरा, मक्का, घास तथा शरद् ऋतु में  बरसीम, जई आदि अधिक मात्रा में उपलब्ध रहती है परन्तु इसका समुचित उपयोग नहीं हो पाता है। जिससे इन चारा फसलों की गुणवत्ता में कमी होने लगती है फलस्वरूप अक्टूबर से दिसम्बर तथा अप्रैल से जून तक पशुओं को हरा चारा नही मिल पाता है जिसके कारण पशु उत्पादन को बनाए रखने के लिए अधिक मात्रा में दाना (बांटा) खिलाना पड़ता है इससे उत्पादन लागत काफी बढ़ जाती है। इन परिस्थितियों में किसान भाई संरक्षित चारे साइलेज का उपयोग कर जहां एक ओर पशुओं की उत्पादकता को बनाएं रख सकते है वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत को भी कम कर सकते है। प्रो. त्रिभुवन शर्मा, विभागाध्यक्ष, पशुपोषण विभाग ने बताया कि छोटे पशुपालक व किसानों के लिए यह बहुत लाभकारी तकनीक है तथा अभी जब हरे चारे की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता है उसे साइलेज विधि से संरक्षित कर आगामी समय में जब हरे चारे की उपलब्धता नही होती है तब उपयोग में लिया जा सकता है। 30-40 दिन में साइलेज खिलाने के लिए तैयार हो जाता है और इसे 3 से 6 माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। प्रो. बी.के. बेनीवाल, अधिष्ठाता, वेटरनरी कॉलेज, बीकानेर एवं श्री गोपाल उपाध्याय ने भी किसानों को सम्बोधित किया। इस अवसर पर साइलों बैग बनाने वाली कम्पनी के प्रतिनिधि डॉ. टी. गांगुली, श्री कर्मजीत चड्डा व श्री सोहम पॉल भी उपस्थित थे। इस अवसर पर हरे चारे को संरक्षित करने की विधि कृषकों के सामने प्रदर्शित की गई तथा पशुपालकों ने ज्वार के हरे चारे की कुट्टी काटकर साइलो बैग में भरकर साइलेज बनाने की प्रक्रिया जानी। 

Green fodder Protection