Friday, 20 October 2017

आत्मा की सत्ता में विश्वास कर्म में विश्वास :साध्वी प्रमुखा

गंगाशहर  आचार्य श्री तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान में विराजित साध्वी प्रमुखा श्री कनक प्रभाजी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि सम्यक्त्व की पहचान के लिए भगवान महावीर ने 5 लक्षण बताये हैं-1 शम 2.  संवेग 3. निर्वेद 4. अनुकंपा 5. आस्तिक्य।
शम  कि व्यख्या करते हुए उन्होंने कहा कि   कषायाद्यषमनं शमः    अर्थात् क्रोध मान माया लोभ ये प्रबल न हो, उपषान्त रहें। हर स्थिति में शांत रहना जानता हो वहां सम्यक्त्व का पहला लक्षण घटित होता है। वास्तव में सम्यक् दर्षन की उपलब्धि तो व्यवहार में प्रतिबिम्बित होनी चाहिए। स्वयं पहचान करें कि - कषाय कितना शांत हैं ?  परिवार, समाज, सभा, संस्था में यदि कोई बात के कारण मनभेद या मतभेद हो जाये तो जैन धर्म में विष्वास रखने वाला व्यक्ति परस्पर खमतखामणा करें। उसी दिन अथवा पक्खी को अवष्य करें यदि तब तक भी नही ंतो चातुर्मासिक पक्खी के दिन आत्मनिरिक्षण करें। यदि तब तक भी संभव न हो तो उत्कृष्ट अवधि संवत्सरी तक निष्चित रूप में करें। प्रमुखा श्री जी ने फरमाय कि आप सम्यक्त्वी है तो निष्चित रूप मंे संवत्सरी के दिन निःषल्य बनकर मन की गाठें खोले। पूरे 1 वर्ष का आत्म अवलोकन करें। यदि उस समय तक नहीं हो तो - सम्यक्त्व को खतरा है। सम्यक्त्व की सुरक्षा के लिए आवष्यक हैं - मनको निःषल्य बनाये। 
दूसरे लक्षण  संवेग  को स्पष्ट करते हुए साध्वी प्रमुखा श्री कहा कि संवेग- मन में यह भावना उत्पन्न होना कि हम अनन्तकाल से परिभ्रमण कर रहें हैं। हमारे जीवन में भी ऐसा दिन आये जब हम - राग द्वेष से मुक्त हो सके। मुक्तिश्री का वरण कर सके। इस प्रकार का चिन्तन, मोक्ष प्राप्त करने की कामना संवेगी के मन में उत्पन्न होती हैं। 
तीसरे लक्षण को बताते हुए साध्वी प्रमुखा जी ने कहा कि संसार के प्रति विरक्ति का भाव। संसार के सारे काम करते हुए भी उसमें अनाषक्ति का भाव कितना है, यह चिन्तन करें। जयाचार्य ने कहा कि सम्यक्त्वी जीव भी सारे काम करता है किन्तु भीतर से वह अलग होता हैं जैसे एक बच्चे का पालन मां स्वयं करती है उसमें कितनी ममता, आषक्ति व मूर्च्छा होती हैं वही धायमाता पालन करती हैं वहां सिर्फ कर्त्तव्यबुद्धि होती है। अतः श्रावक लोग भी कर्त्तव्यभाव को प्रमुखता दे। मोह में डूबे नहीं। चोथे लक्षण को बताते हुए कनक प्रभाजी न कहा कि प्राणिमात्र के प्रतिदया भाव। किसी को कष्ट न दे, सताये नहीं। गृहस्थ में रहते हुए हिंसा करनी पड़ती हैं किन्तु जान बुझकर न करें। संकल्पी हिंसा से बचने का प्रयास करें। इसके लिए आचार्य श्री महाश्रमण जी अहिंसा यात्रा का पूरा अभियान चला रहे हैं। पांचवे लक्षण को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि  कि आत्मा की सत्ता में विश्वास कर्म में विश्वास पूर्वजन्म व पुनर्जन्म में विश्वास रखना। कर्मो का आत्मा के बन्धन होता है। जिसे भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता। इस प्रकार विश्वास रखकर कर्मो के बन्धन को हल्का करने का प्रयास करता हैं वह सम्यक्त्वी होता हैं। अतः सभी श्रावकजन इस और ध्यान दें कि हमारा सम्यक्त्व रत्न निर्मल रह सकें। सम्यक्त्यव रत्न की निर्मलता में ही आत्मकल्याण अन्तनिर्हित है। प्रतिदिन सुबह सात बजे नैतिकता के शक्तिपीठ पर साध्वी प्रमुखा जी से बर्हद मंगलपाठ सुनने लिए सैकड़ो लोग पहुंचतें है।