Sunday, 17 December 2017

पांच सूत्रों से जीवन व परिवार सुखी:साध्वी कनकप्रभा

 गंगाहर  नैतिकता के शक्तिपीठ में विराजित साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि जैन आगमों में तथा उत्तरवर्त्ती ग्रन्थों में समय-समय पर आचार्यों एवं विषिष्ट संतो के द्वारा अच्छे जीवन जीने के लिए कुछ सुत्रों का विवेचन किया गया हैं जिनको आधार बनाकर एक स्वस्थ जीवन जीया जा सकता हैं। प्रेक्षाध्यान षिविर में व्यक्ति को उपसम्पदा स्वीकार कराई जाती हैं उस उपसम्पदा में साधना के 5 मूलभूत सिद्धान्त या सूत्र है जिसको अपनाकर व्यक्ति रोजमर्रा के जीवन में आनन्द से जी सकता हैं। वे पांच हैं भावक्रिया, प्रतिक्रिया विरति, मैत्री का अभ्यास, मिताहार, मितभाषण।

प्रमुखा श्री जी ने पहले सिद्धान्त को बताते हुए कहा कि जिस समय जो काम कर रहे हैं मन उसी कार्य में लगा रहें उसका नाम है भावक्रिया। सामायिक करते वक्त मन यदि व्यापार या घर में लगा हुआ हैं तो असली आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती अतः जो भी कार्य करे पूरा मन से करें। साध्वी प्रमुखा जी  ने कहा कि व्यक्ति जिस  समय  जो क्रिया करे उसका ध्यान भी उसी क्रिया में ही रहें . चल रहा है तो चले , खाना  खा रहा है तो खाएं  , बोल रहा तो बोले। व्यापार कार्य में लग रहें हैं तो पूरे मन से व्यापार करे .
दूसरे सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य क्रिया करता हैं किन्तु क्रिया कम व प्रतिक्रिया ज्यादा करता हैं। किसी व्यक्ति ने हमारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया तो हम भी उसके साथ  टीट फोर टेट ( ज्पज थ्वत ज्ंज ) की नीति अपनाते हैं। इससे हम अपने करणीय लक्ष्य से हट जाते हैं अतः कोई भी कार्य कर्त्तव्य बुद्धि से करे किन्तु प्रतिक्रिया नहीं करें।
साध्वी प्रमुखा श्री जी ने तीसरे सिद्धान्त को विस्तार पूर्वक बताते हुए कहा कि जैन धर्म का महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं- “खामेमी सव्व जीवे सव्वे जीवा खमंतु में“ मै सब जीवो को क्षमा प्रदान करता हूँ सब जीव मुझे क्षमा प्रदान करंे। इस प्रकार इस सूत्र को प्रतिदिन यदि 2 मिनिट भी चिन्तन करंे तो व्यक्ति मैत्रीभाव से ओतप्रोत हो सकता हैं।
चौथे सिद्धान्त को बताते हुए प्रमुखा श्री जी ने फरमाया कि खाने का संयम करना। अतिसर्वत्र वर्जयेत्। थोडे़ - से में ही पेट भर सकता हैं तो अनावष्य द्रव्यों का उपभोग क्यों करे ? बाह्य आडम्बर एवं स्वास्थय पर असर पड़े ऐसी वस्तुओं से सदैव बचने का प्रयत्न करें।  साध्वी प्रमुखा जी  ने कहा कि स्नेह भोज में व्यंजन सीमा भी कई जगहों पर है परन्तु बावजूद इसके एक सौ से अधिक  खाद्य पदार्थ बनाये जातें हैं. जबकि पेट सात आयटम से भी भर सकता है. जैनियों को मीतभोजी होने के साथ साथ स्नेह भोज में व्यंजन भी कम बनाने चाहिये.साध्वी प्रमुखा जी  ने कहा कि मिताहार का अर्थ कम मात्र में व कम आयटम खाएं इससे उनोदरी होगी व निर्जरा  को भी जीवन में महत्व मिलेगा। उन्होंने कहा अधिक आयटम बनाने से अतिरेक हो जाता है। अधिक आयटम व्यक्ति खा ही नहीं सकता है। 
पांचवे सिद्धान्त में प्रमुखा श्री जी ने बताया कि साध्वी प्रमुखा जी  ने कहा कि व्यक्ति को  मितभाषी होना  चाहिए।  कब ,कहाँ  व क्या बोलना इसका विवेक रखा जाए. आचार्य महाश्रमण जी ने एक नई परिभाषा व्यक्त की है-अनावष्यक न बोलना भी मौन हैं। जहां बोलते हैं वहां भी कितने शब्दों का प्रयोग करना हैं इसका विवके रखें। इन पांच सूत्रों को जीवन विकास के सूत्र मानकर चले जिससे जीवन व परिवार सब सुखी हो सकता हैं।