Tuesday, 24 October 2017

माता-पिता के समान साधुओं के प्रति वत्सलता का भाव:साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा

प्रतिदिन सैकड़ों प्रवासी पहुँच रहें है साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी के दर्शनार्थ

गंगाशहर।   नैतिकता के शक्तिपीठ पर तेरापंथ कि महाश्रमणी  साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी ने प्रवचन में कहा कि भगवान महावीर ने विविध रूपों में सत्य का प्रतिपादन किया। उसके साथ-साथ मनुष्य के स्वभाव का भी विवेचन किया है। श्रावक या श्रमणोपासक विवेचन में भगवान महावीर ने 4 प्रकार के श्रावकों का विवरण किया है। माता-पिता के समान, भाई के समान, मित्र के समान,  सौत के समान। यह विवेचन वत्सलता एवं उग्रता के आधार पर हुआ है अत: प्रथम प्रकार के श्रावक जो माता-पिता के समान होते हैं उनमें जो श्रावक साधुओं के जीवनचर्या एवं तत्वज्ञान में वत्सलता का प्रयोग करते हैं वे श्रावक माता-पिता के समान होते हैं। माता-पिता दयालु होते हैं। बच्चों का ख्याल रखते हैं। वैसे ही श्रावक भी साधुओं का वत्सलता व मृदुभाव से जागरुक करते हैं। दूसरा भाई के समान में श्रावक जीवन निर्वाह की दिशा में वत्सलता का प्रयोग करते हैं पर ज्ञानाराधना के रूप में कठोरता का प्रयोग करते हैं। तीसरा मित्र के समान श्रावक में जब तक आपस में अनुकूलता रहती है तब तक सम्बन्ध अच्छे बने रहते हैं। प्रतिकूलता में विपरीत बन जाते हैं। चौथा श्रावक का प्रकार सौत के समान बताया है। इसमें श्रावक साधुओं के हर चर्या में, कार्य में बार-बार दोष देखते रहते हैं। अत: इन चार प्रकार के श्रावकों में माता-पितावत् में वत्सलता का भाव रहता है। मित्र के समान श्रावक में अनुकूल परिस्थिति में कोमलता व प्रतिकूल में कठोरता का भाव रहता है। सौत के समान श्रावक छिद्रान्वेषी होते हैं, कठोरता का वर्णन करते हैं। वस्तुत: श्रावकों का कर्तव्य है कि वे माता-पिता के समान साधुओं के प्रति वत्सलता का भाव रखकर साधना में योगभूत बनने का प्रयास करें।  साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी ने उपस्थित जनसमुदाय को मंगलपाठ सुनाया।  प्रतिदिन सैकड़ों प्रवासी  साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी के दर्शनार्थ गंगाशहर पहुँच रहें है .