Monday, 11 December 2017

सहन करने वाला ही सफल: कनक प्रभा

तेरापंथ धर्मसंघ नैतिकता के शक्तिपीठ पर प्रात:कालीन पाथेय

 बीकानेर, 'नैतिकता के शक्तिपीठÓ पर प्रात:कालीन पाथेय प्रदान करते हुए तेरापंथ धर्मसंघ की महानिदेशिका साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा ने कहा कि धार्मिक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने जीवन में सहनशीलता का विकास करे। उन्होंने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के कथन सहन बनो प्रखर बनो का उल्लेख करते हुए कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन में सहन करना जानता है, वही सफल हो सकता है और यह सिद्धांतिक अध्यात्म के क्षेत्र में जीतना लागू है, व्यवहार के क्षेत्र में भी उतना ही समीचीन है।

साध्वी प्रमुखा ने कहा कि व्यक्ति अपने परिवार में रहता है, किसी कंपनी में काम बरता है, किसी समूह के साथ जुड़कर रहता है, उसके लिए समय-समय पर सहन करना ही होता है और जो सहन करने को अपना धर्म मानता है, प्रसन्नता से सहन करता है वहीं आगे बढ़ पाता है। जो व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थिति को सहन नहीं कर सकता, वह पिछड़ जाता है, अपने लक्ष्य से भ्रमित हो सकता है। उन्होंने कहा कि जब सामान्य व्यवहार के लिए यह बात है तो धर्म के क्षेत्र में तो यह बहुत आवश्यक है। धार्मिक व्यक्ति को बहुत सहन करना चाहिए, अनुकूल प्रतिकूल सब स्थितियों में जो संतुलित रहता है, समभाव रख सकता है, जो शांति से सहन कर सकता है, वही व्यक्ति वास्तव में धार्मिक होता है। कनकप्रभा ने बताया कि मुक्ति का अर्थ निरलोभता है। क्रोध, मान, माया, लोभ, ये चारों व्यक्ति के साथ जुड़े हुए रहते हैं और हर सांसारिक प्राणी में एक सीमा तक इनकी सत्ता पाई जाती है, इसलिए यह अनुभव करने की बात है कि लोभ से व्यक्ति कभी सुखी होता है क्या? जितना अधिक लोभ होता है, व्यक्ति उतना ही अधिक बुरी प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाता है। लोभ के कारण वह अपने करणीय और अकरणीय काम के बोध को भी खो देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोभ व्यक्ति को अंधा बना देता है। लोभांध व्यक्ति अपने पराये की पहचान को भी खत्म कर देता है। वह अपने लोभ और अपने स्वार्थ के लिए किसी का भी अहित कर सकता है। धार्मिक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वह लोभ पर नियंत्रण, अंकुश करे। कनकप्रभा ने कहा कि जब तक व्यक्ति को लाभ मिलता है तो लोभ उतना ही बढ़ता जाता है। जहां रागो वहां लाभो की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि लोभ करने वाला कभी सुखी नहीं होता। अत: आवश्यक है कि व्यक्ति जीवन में निर्लोभता की साधना करे। अपने पास में जो कुछ है उसमें संतुष्ट रहना सीखे। जो व्यक्ति संतोष करना जानता है, उसके सुख को कोई छीन नहीं सकता। उन्होंने भगवान बुद्ध का एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब बुद्ध से उनकी प्रवचन सभा में पूछा गया कि आपकी सभा में सुखी कौन है? उस सभा में राजा, मंत्री, नगर सेठ सहित आमअवाम उपस्थित थे, परन्तु बुद्ध ने ऐसे व्यक्ति की तरफ संकेत किया, जो फटे हाल था। लोग समझ नहीं सके की यह व्यक्ति सुखी कैसे है? बुद्ध ने समाधान करते हुए वहां उपस्थित एक-एक व्यक्ति को पूछा - बोलो कि आप लोगों की क्या चाह है? राजा ने बताया कि मैं राज्य का विस्तार करना चाहता हूं, मंत्री ने भी अपना वैभव बढ़ाना चाहा, नगर सेठ ने व्यापार वृद्धि की बात कही, किसी ने कुछ मांग की तो किसी ने कुछ चाह बतायी। जब उस फटे हाल व्यक्ति से पूछा गया कि तुम्हे क्या जरुरत है, तो उसने कहा कि मुझे तो कुछ नहीं चाहिए। उसे दूसरी बार पूछा गया कि अगर कोई इच्छा हो तो बताओ। तो उस व्यक्ति का प्रत्युक्तर था कि मेरे मन में किसी तरह की चाह उत्पन्न ही नहीं हो, बस मैं यही चाहता हूं। ऐसे व्यक्ति को कौन दुखी कर सकता है।

साध्वी प्रमुखा ने कहा कि व्यक्ति को यदि धार्मिक बनना है तो अपने लोभ को नियंत्रित करना होगा। इसके अलावा उन्होंने व्यक्ति को आचरण में ऋजुता और मृदुता पर ध्यान देने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि यदि धर्म के क्षेत्र में आगे बढऩा है, धर्म की साधना करनी है, तो कोई तपस्या कर सके या ना कर सके, विशेष गहन ग्रंथों का अध्ययन कर सके या ना कर सके, लेकिन यदि मनुष्य जीवन में सहज रूप से सहनशीलता, निर्लोभता, सरलता और कोमलता का अभ्यास कर ले तो व्यक्ति धर्म के दरवाजे में प्रविष्ट हो जाता है और फिर उसे धर्म के क्षेत्र में आगे बढऩे से कोई रोक नहीं सकता। धर्म के दरवाजे में प्रवेश करके व्यक्ति अपने जीवन में निर्बाध रूप से आगे बढ़ सकता है। इस दृष्टि से हर धार्मिक व्यक्ति का दायित्व और कर्तव्य है कि वह अपने जीवन में भगवान महावीर के इन शब्दों को अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करें।

 

Acharay Tulsi   Terapanthi   Mahavir